उर्मिल कुमार थपलियाल
अब क्या जो कहूँ। कवि कहाँ रह जाते हैं। रह जाता है उनका कहा लिखा। तुम तो खैर हमारी वाचिक परम्परा के थे। लिखे से ज्यादा कहा और बोला हुआ रह जाता है स्मृति में। तुम तो वैसे भी हिंदी के पहाड़ी और पहाड़ी के हिन्दी-उर्दू कवि हुए। इतने सहज, सरल स्वाभाविक कि तुम स्मृतियों में रह जाने वाले हुए। इतिहास तो सूखा प्रोज है। गिरीश, अब जहाँ भी हो वहाँ अपनी स्वाभाविक मौज में होगे। पिछली सदी के साठवें दशक के अंतिम वर्षों की याद तो होगी ही। कंधे में सुरीले धनुष की तरह हुड़का डाले तुम्हारी त्रिभंगी मुद्रा मुझे नहीं भूलती। अब पता चला कि तुम्हारे भीतर के नगाड़े खामोश तो तब भी नहीं थे। अजीब खदबद रहती थी तुम्हारे भीतर। हल्की धमक देता हुड़का तुम्हारे ही खुरदुरे व्यक्तित्व का विकास था। दाढ़ी-हाढ़ी नहीं थी काली मूँछें थीं- पान से रंगीन तुम्हारे लम्बे दाँतों को आड़ देती हुई।
याद है लखनऊ के तत्कालीन बरलिंगटन होटल के एक कोने का वो छोटा सा हॉल ? बंशीधर पाठक जिज्ञासु जी व कुछ और लोगों द्वारा स्थापित ‘शिखर संगठन’ की बैठकी होती थी। मैं उन्हीं दिनों आकाशवाणी लखनऊ की नौकरी में आया था। मेरे साथ मोहन उप्रेती, जीतसिंह नेगी, नईमा खान, गीता जोशी, केशव अनुरागी और दीवान सिंह कुमैय्या की संगत भी आई थी। हम-तुम दोनों कई बार इस संगत को शेयर करते-करते चुस्की-हुस्की में लगे रहते। मुझसे मेरी तत्कालीन नम्बर टेन सिगरेट छुड़वा कर मुझे बीड़ी का चस्का तुम्हीं ने तो लगाया था यार। जब तुम मौज में होते, आँखें बाहर आ जाती थीं तुम्हारी। चेहरे पर क्रांति की तपन मगर होठों पर रूमानी गीतों की शबनम। कड़े़ हुड़के पर पानी तुम्हें सुहाता था। (साहिर ने कहा था- चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों। मैंने जवाब दिया था- चलो एक बार फिर उस नदिए-रंगी में खो जाएँ)। तुम्हारा मूड जो क्या था ? कभी रोमांटिक प्रोग्रेसिव जैसा तो कभी ‘तिलगा तेरी लम्बी लटी’ पर बड़ा बारीक हो जाता। मुझे तुम कभी समझ में नहीं आए। आज भी नहीं। तुम्हारे मिजाज की लय पकड़ पाना किसी ताल शास्त्र में नहीं। तुम शास्त्रीय थे ही नहीं। अपनी मुक्ति में बँधी हुई पहाड़ी बंदिश थे तुम। राग पीलू से गुजरते यमन जैसे। तुम लय में न होते तो प्रलय हो जाते। लय के प्रंभजन संगीत नहीं, शब्द में भी तो होते हैं। तुम्हीं ने तो साबित किया ये। तुमने तो गजब कर दिया गिरीश। आपाधापी करते रहे महानगरों और सरकारी नौकरियों में, मगर अंत में अपनी भूमि से नहीं भागे। अपनी जड़ नहीं काटी औरों की तरह। अलबत्ता दूसरे प्रभावों से हवा-पानी लेते रहे। पहाड़ की बाकी प्रतिभाएँ तो राजधानियों में बस कर पहाड़ के लिए छाती पीटती रहीं। वे सब तन, मन, धन के कवि हो गये। तुम्हारा जनकवि होना तो प्रारब्ध को बदा था। मुँहजोर भी कम नहीं थे तुम। कभी कहते- तुम इतनी घनचक्करी कैसे कर लेते हो ददा ? माने खबर बाँचना अलग। पहाड़ी (मछम अलग, नाटक नौटंकी अलग, कविता कहानी अलग। मैं क्या जो कहता- भांजी मार दी कि- ये लड़ाई है दिए की और तूफान की। वो हँसा……यह बजा रहे हो ददा। उस दिन उसने मुझे फैज सुनाया, मैंने उसे प्रह्लाद नाटक के गीत। जब-जब मैंने उससे उसके प्रेम के बाबत पूछा, वो चुप। अपनी-अपनी जवानी में हमारा साथ शुरूआती रहा। लगभग बोहेमियन जैसा माने- ‘बीड़ियों के बंडल है। होटलों की चाय हैं। उलझी-उलझी बहसें हैं। हम उदास लोगों का कितना बेअसर यारों/मौसमें जवानी था।’
साठ के उस दशक में गिरीश लगता है भविष्य के लोकनायक के रूप में अपनी जमीन तैयार कर रहा था। हमारे साथ कभी-कभी बी.एम. शाह आ जाते। ढेर सारा बोर करते हम तो बला के चुगनी देने वाले ठहरे। शाहज्यू के थैले में कच्च-कच्च करती बोतल का आर्तनाद सुन लेते। ‘सरग तारा’ गाते-गाते हमारी भृकुटियों के विलास से आसपास की सारी सृष्टि लय हो जाती। खित-खित हँसने वालों में होते-कैलाश जोशी, लक्ष्मी डंडरियाल, बीना तिवारी, मोहिनी जोशी, प्रदुमन सिंह…
अब क्या जो कहूँ। तुम बिना कहे, बिना मिले चले गए। मुझे गर्व है कि तुम्हारा ‘ददा’ रहा। बस कुछ बरस। ‘गिर्दा’ होने के पहले के गिरीश को याद करना भी उस जुझारू को सम्मान देना ही है। ईश्वर द्वारा दिए दुःख को धैर्य से बर्दाश्त करना भी उसकी उपासना का एक रूप है।