प्रस्तुति : निर्मला गहतोड़ी
सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए अपने पिताजी से मुझे प्रेरणा मिली। गाँव के सामूहिक कार्यों में, मैं भी लगातार उनके साथ रहती थी। ससुराल में भी उसी प्रकार का माहौल मिला और पति का पूरा सहयोग प्राप्त हुआ। चम्पावत के भीतर चले शराब आंदोलन आदि में भागीदारी से मुझे अपनी ताकत का एहसास हुआ। उन महिलाओं को देखकर काफी बुरा लगता था, जो शराब से पीड़ित थीं। मन में यह बेचैनी बनी रहती कि इस बीमारी को कैसे दूर किया जाये। तभी मेरा संपर्क निर्मल पंडित से हुआ और मैं शराब तथा राज्य आंदोलन से जुड़ी।
शराब आंदोलन के दौरान ही मेरा संपर्क राधा बहन तथा विजया ढौंढियाल से भी हुआ। उनकी प्रेरणा से मैंने खेतीखान की महिलाओं के साथ समूह बनाकर महिला सशक्तीकरण का कार्य किया। हमारा प्रयास था कि महिलायें शराब अपने घर से ही बंद करें। काफी हद तक हमारा यह प्रयास सफल भी रहा। मगर बाद में हमारे साथ के कुछ लोगों ने शराब आंदोलन को राजनैतिक रूप देना आरम्भ कर दिया, जो मुझे अच्छा नहीं लगा। तब मैंने इस आंदोलन से अपने हाथ पीछे खींच लिये।
स्कूल के दिनों से ही मैं नेतृत्व में रहती थी। शादी के बाद कुछ समय तक मैंने एक घरेलू महिला की तरह दिन काटे। कुछ समय तक महिलाओं के साथ सिलाई तथा कढ़ाई का कार्य भी किया। वर्ष 1994-95 में हमारे गाँव में प्रधान की सीट रिजर्व थी। परिवार तथा गाँव वालों की सहमति से मैं निर्विरोध गाँव की प्रधान चुनी गयी। शुरू में गाँव के सयाने व्यक्तियों ने मेरा साथ दिया। मगर जब मैंने बी.डी. सी. की एक बैठक में एक पुल के निर्माण में पैसों की हेराफेरी का मामला उठाया तो मेरा विरोध शुरू हो गया। उस दिन मेरी आँखें खुलीं और मेरा राजनीतिक जीवन सक्रिय होने लगा। फिर एक स्कूल के निर्माण का काम आया। कमीशनखोरी की प्रवृत्ति को एक चुनौती देते हुए मैंने यह तय किया कि अब मुझे किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपना कार्य स्वयं ही करूँगी।
तब से मुझे अपने काम में मजा आने लगा। 33 प्रतिशत आरक्षण होने के बाद भी महिलायें राजनीति में सक्रिय नहीं हो पा रही हैं। जब मैं ग्राम प्रधान बनी तब मेरे गाँव वाले मेरे पति को ही प्रधान कहते थे। कोई किसी कार्य के लिये घर आता तो मुझसे पूछता कि प्रधान जी कहाँ हैं। यह मुझे काफी चुभता था। फिर मैंने इस बात का विरोध किया और पति से कहा कि जब कोई आपसे प्रधान कहे तो आप उससे साफ-साफ कह देना कि प्रधान मैं नहीं बल्कि मेरी पत्नी है। पति ने पूरा सहयोग किया और मुझे ग्रामीणों की मानसिकता बदलने में सफलता मिली। महिलाओं को उचित मार्गदर्शन मिले तो वे भी सक्रिय और सशक्त हो सकती हैं। मगर आज भी राजनीति में महिलाओं को मजबूरी में ही स्वीकारा जाता है।