नहीं, मैंने कुछ नहीं कहा….. सच्ची इस बार कुच्छ नहीं कहा…
झगड़ा पुलिस और वकीलों का था। हम क्यों बीच में पड़ते ? पुलिस तो पुलिस होती है। गाली देने, मारपीट करने, अपराधियों को गले लगाने और भले आदमी को जरायमपेशा बना देने, माहवारी वसूलने आदि की उसे स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। तो 21 जून की उस रात यदि वह ज्योलीकोट की चौकी पर शराब के साथ बकरे का गोश्त खाकर गाड़ियों की चैकिंग कर रही थी तो इसमें ताज्जुब कैसा ? यह संयोग ही रहा होगा कि उस रात उसके हत्थे हल्द्वानी से शादी की दावत खाकर लौट रहे हाईकोर्ट के कुछ वकील चढ़ गये। वैसे वकीलों और पुलिस में बड़ी अच्छी दोस्ती होती है, खासकर क्रिमिनल के वकीलों में। लेकिन यारी-दोस्ती में भी तो कभी-कभी तकरार हो ही जाती है।
यह तो अखबारों में छपी खबरों से मालूम पड़ा कि पुलिस वालों ने वकीलों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। फिर अगले दिन वकीलों ने हाईकोर्ट के पास जाम लगा दिया। ड्यूटी करने जा रहे एका पुलिस वाले को थपड़ियाया। जाम में फँसे पर्यटकों की किरकिरी हुई। ज्योलीकोट की पुलिस चौकी के सभी, पाँचों पुलिस कर्मियों पर 307 (हत्या का प्रयास) और एस.सी./एस.टी. एक्ट की धारायें लगा कर उन्हें जेल भिजवाया। इतने से तसल्ली नहीं हुई तो उन्होंने अगले दिन, यानी 23 जून को पूरे प्रदेश में हड़ताल कर दी कि नैनीताल के एस.एस.पी. का भी तबादला किया जाये।
तो हम चुप थे कि इन लफड़ों में कौन पड़े ? निर्द्वन्द्व सांड और पुलिस से बच कर रहने की नसीहत तो हिन्दुस्तान में बचपन से दी जाती है। और हाईकोर्ट के वकीलों से हम उस दिन से सहम गये हैं, जब मुजफ्फरनगर कांड के आरोपी अनन्त कुमार सिंह को दोषमुक्त कर दिये जाने के फैसले के खिलाफ 1 सितम्बर 2003 को हमने मोर्चा निकाला था तो वकीलों ने हमारे खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पारित कर दिया।
हमने कसम खा ली कि इस झगड़े में कुछ नहीं बोंलेंगे। झूठ तो क्या, सच भी नहीं बोलेंगे…… जुबान खोलेंगे ही नहीं!
दो दिन बाद एक परिचित तमतमाते हुए आ गये, ‘‘ये हाईकोर्ट आपने यहाँ क्यों बनवाई ?’’ हमने उन्हें याद दिलाया कि हम तो शुरू से गैरसैंण के पैरोकार रहे हैं, चाहे राजधानी हो चाहे हाईकोर्ट। अब हमें पूछता कौन है? किसी के मन में आ गयी होगी, बनवा दिया। ‘‘आखिर इस हाईकोर्ट ने किया क्या है नैनीताल के लिये ?’’ वे फिर दहाड़े। ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है। यहाँ के पहले चीफ जस्टिस ए. के. देसाई ने अखबार में छपी एक खबर का संज्ञान लेकर स्वयं एक जनहित याचिका बनवाई और डाँठ पर बसों की संख्या को नियंत्रित करने से लेकर धर्मशालाओं को कब्जामुक्त कराने तक कितने तो उन्होंने काम किये।’’ हमने सोचा कि तर्क से वे परास्त हो गये तो आगे बेवजह बहस नहीं करेंगे। शान्त हो जायेंगे।
लेकिन उनका गुस्सा था कि थमने का नाम नही ले रहा था, ‘‘उससे क्या हुआ ? क्या नैनीताल का चेहरा-मोहरा कुछ ठीक हुआ ? शहर की सारी सरकारी सम्पत्ति को इन्होंने धीरे-धीरे कब्जा लिया है। पहले आसपास की जमीनें तलाशीं, उद्यान विभाग का पार्क हथिया लिया, फिर पाइन्स में घुसे और अब भवाली सैनिटोरियम में दाँत लगा दिये हैं। मालरोड की ट्रैफिक व्यवस्था इनकी मनमर्जी पर चलती है। शाम को मालरोड में टहलने में अड़चन आयी तो रिक्शे भी रुकवा दिये। सारी दुनिया के लिये ‘नो पार्किंग’ हो, लेकिन मल्लीताल फव्वारे के पास सिर्फ इनकी गाड़ियाँ खड़ी रहती हैं। स्नोव्यू के नीचे खतरनाक इलाके में भी मोटर सड़क बनावा दी इन्होंने। जनता के सारे तबकों में सिर्फ यहाँ के वकील ही हैं, जो मालरोड पर टॉल टैक्स भी नहीं देते। देख लेना, धीरे-धीरे सारे शहर पर इनका कब्जा हो जायेगा। गलत कह रहा हूँ तो बताइये।’’ उन्होंने हमें चुनौती दी।
मगर हम सावधान थे कि जरा भी उत्तेजित हुए तो उनके जाल में फँस जायेंगे। चुपचाप होंठ सिये रहे।
वे थोड़ी देर तक हमें गुस्से से घूरते रहे और फिर चालू हो गये, ‘‘और ये वकील ? पता नहीं इनमें से कितने हैं जो गंभीरता से वकालत करते हैं। मैं तो ज्यादातर को काला कोट-काला चोंगा पहने इधर-उधर चक्कर ही लगाते देखता हूँ। कितने तो ऐसे हैं, जो मकान मालिकों की नाक में दम किये बैठे हैं। अगर मालिक बेसहारा औरत, बूढ़ा या गरीब हो तो उसे धमका कर आधे-पौने पर उससे खरीद लेंगे। ग्रीन बैल्ट में जमीन खरीदेंगे और प्राधिकरण को धता बताते हुए जबर्दस्ती मकान बना लेंगे। और इस बार पुलिस के साथ मारपीट के इस मामले से तो ऐसा लग रहा है, जैसे अब प्रशासक, राजनीतिज्ञों की कोई जरूरत ही नहीं रही। सरकार-प्रशासन भी यही लोग चलायेंगे। अरे, मैं कहता हूँ कि ज्योलीकोट से सैकड़ों गाड़ियाँ निकलती हैं आजकल रात के वक्त। आखिर इन्हीं की क्यों पिटाई लगाई पुलिस वालों ने ? किसी टूरिस्ट को क्यों नहीं लूटा ? हनक दिखाई होगी अपने हाइकोर्ट का वकील होने की। आखिर मल्लीताल के ढाबों में शराब पीकर मारपीट, दादागिरी, पैसा न देना आदि नहीं करते ये लोग ? महात्मा गांधी ने खाली जो क्या कही थीं वकीलों और अदालतों के बारे में इतनी कठोर बातें। आखिर तो वे राष्ट्रपिता थे हमारे……’’
उनका हमला जारी रहा। मैं किसी तरह अपने को जब्त किये रहा। सामने से रुड़की के एक वकील साहब आते दिखाई दिये तो उन्हें इशारे से बुला लिया कि उनका काला कोट देख कर शायद इनकी जबान पर रोक लगे।
यह कोशिश कामयाब भी हुई। उन्होंने वकील साहब को घूरा, थोड़ी देर तक और बड़बड़ाते रहे और फिर चले गये। वकील साहब, जो बड़ी असहायता से उनका गुस्सा देख रहे थे, उनके जाने के बाद मासूमियत से बोले, ‘‘भाई साहब, ये पुलिस इतनी बदनाम है। लेकिन जब भी पुलिस और वकीलों में लड़ाई होती है, सारी जनता पुलिस के पक्ष में खड़ी हो जाती है। मैंने सब जगह ऐसा ही देखा है, यू.पी. में भी।
ऐसा क्यों?’’ हम चुपचाप मुस्कराते रहे। बोले कुछ नहीं। क्यों बोलते ?
मैं कसम खाकर कह रहा हूँ कि हम कुछ नहीं बोले…सच्ची!
kya baat hai sir!…….. bol to liye sab kuch..