भगवती प्रसाद नौटियाल
देहरादून में बैठे-बैठे मेरे मन में दिल्ली के चाँदनी चौक का लगभग सत्तर वर्ष पुराना वह वैश्य समाज घूम रहा है, जो दिल्ली की आन-बान और शान हुआ करता था….
सन् 1938-42 के दौरान उन होलियों में, मैं अपने कुमाउनी बंधुओं के साथ बिना रंग के भी रंगकर नाचा करता था। मेरे पिताजी हिन्दू कॉलेज दिल्ली में कार्यरत थे। तब हिन्दू कॉलेज, सेंट स्टफेंस कॉलेज, रामजस कॉलेज, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके होस्टलों (जुबली हॉल व गौयर हॉल) में चौखुटिया, गिवाड़ और भिक्यासैंण आदि के रहने वाले लगभग 150-60 कर्मचारी कार्य करते थे। हमारी पाकशाला के मुखिया पं खिमानन्द पंत इन लोगों के भी मुखिया थे। उन्होंने माँ की भांति मुझे सन् 1938-1953 तक खाना खिलाया था। मुझ से बहुत स्नेह करते थे और हर उत्सव में साथ रखते थे। अवकाश के क्षणों में अधिकांश पहाड़ी हिन्दू कॉलेज के होस्टलों में ही एकत्र हो जाते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के क्रिकेट के फाइनल में सदैव हिन्दू कॉलेज और सेंट स्टीफन्स की टीमें ही आमने-सामने होती थीं। इसी तर्ज पर सर्दियों में होस्टल कर्मचारी भी हिन्दू कॉलेज और सेंट स्टीफन्स कॉलेज की टीमें बन कर कश्मीरी गेट के मैदान में फुटबॉल खेला करते थे। हारने वाली टीम कभी गौयर हाल और कभी हिन्दू कॉलेज के होस्टल में बड़ी दावत दिया करती थी। इन लम्हों में, मैं हमेशा साथ होता था। क्योंकि मैं अपने पिताजी के साथ रहता था। अधिकतर उत्तराखंडी अपनी पत्नियों को साथ नहीं रखते थे। अकेला बालक होने के नाते मैं उन सब कर्मचारियों का चहेता था।
मेरे दिल्ली आने के पहले वर्ष वसंत पंचमी के बाद एक रात पच्चीस-तीस कुमाउनी हिन्दू कॉलेज हॉस्टल के प्रांगण में एक-साथ हाथ में हाथ डाले झूमते हुए ‘हे दरी…ताछम ताछम दरी…’ जैसा कुछ गा रहे थे। गीत और नाच का सिलसिला एक-डेढ़ घंटे चला होगा। जो भी आगन्तुक आता, उसे पिठाई लगाई जाती थी। मुझे भी लगाई गयी और इस कार्यक्रम के बाद खाने को मिला लाला मिट्ठन हलुवाई का नुख्ती का लड्डू। इस लड्डू से बढ़ा आकर्षण और क्या हो सकता था? अतः अगले दिन से मैं कुमैयाँ भाईयों के साथ स्थायी होलार बन गया था। कुछ दिनों के बाद मुझे उस गीत के बोल भी कुछ समझ में आने लगे और एक दिन शेरूदा ने मुझे वह लिखा दिया तो उसकी एक दो कड़ी मुझे याद हो गई –
दरी हे पराण, दरी ताछम-ताछम दरी
गौं पूछा पदान, दरी ताछम-ताछम
मेरी दरी को पता लगी,
दरी ताछम-ताछम दरी
पदानो वोबरी दरी, ताछम-ताछम
होली के दिन रात को कश्मीरी गेट के चौराहे पर गेट के बड़े-बड़े लालाओं व अंत में कई लोगों ने बहुत सारी एकत्रित लकडि़यों, झाड़-झंखाड़, गोसे (उपले) आदि पर आग लगा दी। मेरे लिये यह सब नया था। गाँव में खेतों में आड़ा जलाना तो देखा था पर बीच चौराहे पर लकडि़यों और झाड़ झंखाड़ पर आग लगा कर उसके चारों ओर नाचते-गाते घूमना पहली बार देखा था।
छरोली (होली) के दिन सुबह नौ दस बजे के करीब 30-40 कुमैया सफेद कुर्ता-पैजामा और टोपी पहन कर हिन्दू कॉलेज हॉस्टल के प्रांगण में इकट्ठा होकर एक-दूसरे के मुँह पर रंग मलते हुए नाच-गा रहे थे। कुछ देर बाद मेरे पिताजी मुझे लेकर उस टोली में शामिल हो गये। सभी ने पिताजी के चरण छुए और हम दोनों को हरा-लाल रंग लगाया। अब पिताजी की अगवानी में होल्यारों का यह दल, जिसमें और लोग भी जुड़ते गये, चाँदनी चौक की ओर चलने लगा। उस रोज जो होली यह दल गाता हुआ चल रहा था, उसके कुछ बोल आज भी मुझे याद हैं-
झनकारो झनकारो झनकारो, गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो।
तुम हो ब्रज की सुन्दर गोरी, मैं मथुरा को मतवारो।।
कश्मीरी गेट से रेलवे स्टेशन के ऊपर के काठ के पुल……जी हाँ, तब वह पुल आधा लकड़ी का था और आधा लोहे का और उसे कौडि़या पुल कहा जाता था। कौडि़या नाम इस लिये पड़ा कि उस पुल पर भिखारियों की बड़ी संख्या बैठी रहती थी और चाँदनी चौक के वैश्य परिवार के लोग जो यमुना में स्नान के लिये जाते थे, उन भिखारियों को कौड़ी दिया करते थे। उस युग में कौड़ी भी विनिमय का साधन थी।
कौडि़या पुल को पार कर हमारा दल कम्पनी बाग, जो चाँदनी चौक के पिछवाड़े और रेलवे स्टेशन के मध्य में स्थित था, तो चाँदनी चौक के वैश्यों का एक दल हमारे स्वागत के लिये आगे आया। फूल मालाओं से हमारा स्वागत किया गया और फिर हमें बाग के बीचों-बीच बने रंग के कई कुण्डों के पास ले गये जहाँ कि लाल-नीले और गुलाबी रंग के बड़े-बड़े कुण्ड बने हुए हुए थे। लोग पिचकारियों से एक दूसरे पर रंग डालते जा रहे थे। दोपहर तक यह गाना-बजाना चलता रहा। उसके बाद सभी उस कम्पनी बाग में लगी हुई मिठाई, चाट-पकौड़ी आदि की दुकानों की ओर बढ़ गये। औरतें, मर्द और बच्चे सभी एक परिवार की तरह मिठाई, चाट-पकौड़ी का स्वाद ले रहे थे। मुझे खिलाने वालों की कमी नहीं थी। मैंने पेट भरकर मिठाई और आलू कचालू की चाट खाई।
तब के बाद मैं कुमाउनी होली को ज्यादा समझा हूँ। हमारे पास खड़ी होली है, बैठी होली है। फागुन की एकादशी से ही गाँवों में पुरुषों की खड़ी होली और स्त्रियों की बैठी होली की रंगत ही कुछ और होती है। होली का विशेष अर्थ न जानते हुए भी हमें उन जुनैली रातों में एक अपूर्व अनुभूति प्राप्त होती थी जब ढोल पर थाप पड़ते ही मधुर कंठ से गीत के बोल फूटते थे-
मेरी नथ गढ़ दे छैला सुनार
मेरी नथ गढि़ दे छैला सुनार
नथुली गढ़ै की क्या देली यार
मेरी नथ गढि़ दे छैला बे
और दूसरी ओर से कानों में स्वर गुंजित होते थे-
हरा पंख, मुख लाल सुवा
बोलिये झन बोलै बागा में।
कहाँ से आई बादल रेखा
कहाँ भयो घनघोर सुवा-
बौलियै झन बोलै बागा में…
छलड़ी के दिन माहौल और भी रंगीला हो जाता।
पर अब यह सब भी नहीं रहा। समय कुछ इस प्रकार करवट ले रहा है कि अब होलियारों में बुराँस फूलों की सुगंधी के स्थान पर दारू की बू आती है।
बहुत ही रोचक वर्णन किया है आपने उत्तराखंडी समाज की होली का दिल्ली विश्वविद्यालय में और खासकर छात्रावासों में … मै भी वर्तमान में यहाँ के एक अन्य छात्रावास मानसरोवर हॉस्टल में रहता हूँ … और हमारे विश्वविद्यालय में उत्तरखंडी कर्मचाररियों की संख्या पहले से बढ़ी ही है … खासकर होस्त्ल्स की मैस कर्मचारी तो बहुसंख्यक कुमाऊँ के साल्ट से हैं …. पर अफसोस कि अब वह एकता की भावना नहीं रही …. होली तो क्या किसी भी त्योहार में कोई सामुदायिक मिलन समारोह आदि जैसी कोई प्रथा नहीं रही है ….
लोगों की बढ़ती आमदनी के साथ उनके घरों की दीवारें भी ऊँची होती जा रही हैं ….