एम.सी. पांडे
देखी है आपने कभी उकाब की स्वच्छंद उड़ान? उससे अच्छा सर्वेक्षक नहीं है। मैं सौभाग्यशाली था कि मैं नैनीताल में जन्मा। मैंने देखी है उकाब की उड़ान चील चक्कर अति लुभावने सर्पिल मोड़ से, उड़ते हुए पर्वतों की ऊँची चोटियों से ऊपर। सात दशक पार करने के पश्चात अब मेरी दशा रामायण के ‘संपाति’ की तरह ही हो गई। उत्तराखंड को मैंने समय के अन्तराल में खींचे हुए चित्रों को याददाश्त की गहरी पर्तों में संजो रखा है। व्यक्तिगत और पारिवारिक दावानलों से बचने के लिये आवास से भाग कर पहाड़ की चोटियों में चढ़ जाता था। वहाँ से वनाच्छादित वातावरण में पहाड़ों, रौखड़ों, पुष्पाच्छादित क्षेत्रों में इन सबसे बातें करता था या अंधेरी रातों में माल रोड पर घूमते हुए चमकते सितारों से एवं चंदन चर्चित वसना में चाँद से परिसंवाद करता था। मुझे सुकून मिलता था।
मुझे नैनीताल के ताल से भी प्यार है। उसके वक्ष पर चपटे पत्थरों को सतह के समानान्तर फेंक कर काफी संख्या में गद्दे खिला कर हृदय अति प्रसन्न हो जाता था। नाचता था। इस तालाब की सतही सफाई से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता है आवासों, होटलों के बगल से गुजरने वाले नालों के कूड़े करकट को जगह-जगह पर रोक कर निरंतर सफाई। इसके लिये स्वयं नागरिकों को जागृत होना है। अगल-बगल में खाली स्थानों पर वृक्षारोपण सहायक होगा।
उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में फैला दिग्भ्रम, राजनैतिक नेताओं को कर्मठ होने में मदद नहीं कर रहा है। किसी प्रदेश के जन-समुदाय की अत्यधिक शालीनता भविष्य के विस्फोटक युद्धों को जन्म देगी। उत्तराखंड तो कमोबेश सुरक्षित है और देश के हर वर्ग, विशेषकर युवा वर्ग को और आने वाले युवा वर्ग को एकीकृत हो कर और संघर्ष करने को उद्यत करता है। सभी बालकों, युवाओं, युवतियों पुरुषों महिलाओं को अर्द्ध सैनिक शिक्षा आधुनिकतम शास्त्रास्त्रों एवं कम्यूनिकेशन के साधनों की ट्रेनिंग दी जानी होगी, ताकि यहाँ की पर्वत श्रृंखलायें उदासीन तथा कर्महीन जनशक्ति से न भरी रहे। यही वनों के दावानलों को शमित करेगी। पिरूल जैसे ज्वलनशील पदार्थों की लुगदी को पत्थर के कोयले के चूरे से मिश्रित कर अधिक दबाव देने वाले कम्प्रेशरों से ईंधन का साधन बनाया जा सकता है- ज्वलनशील ईंटों के जरिये। बरसाती पानी से होने वाले विनाश को रोकने हेतु ड्रेनेजेज द्वारा उद्गम स्थल से ही कचड़ा साफ करते हुए अभिसिंचित जलाशयों में डाला जा सकता है। इस दौरान हुए वृक्षों के पतन की क्षतिपूर्ति नये पौंधे लगा कर की जानी चाहिए।
मैं प्रसन्न हूँ कि कई बुद्धिमान लोग पिरूल के और सार्थक उपयोग की भी सोच रहे है, जिससे कि बायोगैसीय विद्युत ऊर्जा बन सके। विकल्प और भी हैं- पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा को विद्युतीय ऊर्जा में प्रयोग करना। शायद शासन विदेशी सहयोग से ऐसा करे। मगर किसी से इनको बनवाने से स्वयं बना कर रख-रखाव करना बेहतर है। सौर लालटेन (चार्जेबल), सौर-फसल ड्रायर, सौर वातानुकूलन डिवाइसेज ऐसी चीजें हैं जो बनाई जा सकती हैं। आवश्यकता है कि बाल्यावस्था में मॉडलों और खिलौनों द्वारा इस हेतु पर्याप्त ज्ञान तरुण पीढ़ी के अवचेतन मन में बस जाये ताकि भविष्य में अतिरिक्त मानवीय ऊर्जा को एक सृजनात्मक प्रवृत्ति के अन्तर्गत राष्ट्र को स्व-समृद्ध बनाने की अभीष्ट इच्छा जागे। इसका डेमो प्रशिक्षण संस्थान पर्वतीय क्षेत्र में ही बने। राजधानी का प्रश्न सोचने लायक है। यदि दावानलों और प्राकृतिक आपदाओं से संघर्षरत होना है तो हैवी ट्रांसपोर्ट करने वाले हैलीकॉप्टर दूरस्थ स्थलों तक आसानी से पहुँच सकें। गैरसैंण को राजधानी न बना कर एक इस प्रकार का स्थल बनाया जा सके कि यह दुर्गम स्थलों तक अग्निशमन सामग्री एवं राशन में दक्ष जनशक्ति को त्वरित गति से पहुँचा सके। इसी प्रकार हैलीकॉप्टरों का उपयोग पर्वतीय क्षेत्रों के अनूठे उत्पादों को मंडियों तक ले जाने में सहायक हो सकता है। युद्धकालीन परिस्थितियों में भी इस प्रकार का नैटवर्क सहायक हो सकता है। इस उड़न व्यवस्था से पर्यटकों को भी तीव्र गति से दुर्गम दर्शनीय स्थलों तक ले जाया जा सकता है। हर वाहन सड़क पर अवांछित कम्पन पैदा करता है। इस व्यवस्था से सड़कों पर भारी वाहनों का बोझ कम किया जा सकता है। तात्कालिक आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था के लिये भी इसका उपयोग किया जा सकता है।
राजभाषा को लेकर मेरा विचार है इसके लिये एक ‘राष्ट्रीय भाषा विज्ञान संस्थान’ बनाया जाना चाहिये। कालागढ़, गैरसैंण, हल्द्वानी जहाँ भी समुचित मात्रा में जमीन उपलब्ध हो, इसे बनाया जाना चाहिये। प्रथमतः इसमें उत्तराखंड में प्रचलित कुमाउनी और गढ़वाली बोलियों में हिन्दी के उभयनिष्ठ शब्दावली की एक तालिका बनानी चाहिये। उसी प्रकार एक दूसरी बोली में एक से किन्तु केवल उच्चारण में भिन्न शब्दों को हिन्दी के शब्दों से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिये। इस प्रकार कुमाउनी एवं गढ़वाली का विलयन कर हिन्दी के निकटस्थ लाना चाहिये। इस प्रकार का एक मानक शब्दकोष बनाया जाना चाहिये, जिसका प्रयोग प्रशासनिक कार्यों हेतु स्वीकार्य कर लिया जाना चाहिये। किसी भी भाषा को सर्वांगीण दृष्टि से समृद्ध होना चाहिये। अतएव हिन्दी एवं अन्य स्वदेशी-विदेशी भाषाओं में उपलब्ध हर प्रकार की सहित्यिक कृतियों को अनूदित किया जाना चाहिये। उपरकथित मानक शब्दकोष की शब्दावली को पूर्णरूपेण उपयोग करते हुए आम बोलचाल में उपयोग में आने वाली आंग्लभाषीय शब्दों को जस का तस बनाये रखना चाहिये। विशेषकर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली को जस का तस हिन्दीकृत करके शब्दकोश में समावेश कर लिया जाना चाहिये। इस प्रकार की सरलीकृत भाषा उत्तराखंड को एक ओजस्वी प्रदेश बना सकेगी। उत्तराखंड के विभिन्न भागों की बोलियों में समेकता, जिसका स्वरूप हिन्दी के निकट हो और अन्य विदेशी भाषाओं के शब्दों का दैनन्दिन प्रयोग हो रहा हो, जैसे आंग्ल भाषा के शब्द रूटीन, डबिंग, फोकस, वेवलेंथ को जस का तस अपना लेना श्रेयस्कर होगा। पिछले वर्ष मैं मुम्बई में था। शिवसेना की मराठीकरण की नीति पर सोच रहा था तो वह खोखली राजनैतिक टैक्टिक थी जिसका आशय था क्षुद्र राजनैतिक लाभ प्राप्त होना। तब मुझे विचार आ रहा था कि क्यों न मूक एवं बधिरों की भाषा को राष्ट्रीय भाषा बना दी जाये। फिर तुरन्त मस्तिष्क में कौंधा कि लड़ने के लिये तो इतना ही काफी होगा कि दूसरे ने गलत इशारा किया है। वैसे भी जिस तरह हामी भरने के लिये हम अपनी मुण्डी हिलाते हैं ठीक उसके विपरीत महाराष्ट्र में यह ना के लिये प्रयोग होता है।
जब तक जनता के लिये समेकित सुगम भाषा, जो हर दृष्टि से समृद्ध, विकसित न हो, हमें उत्तराखंड के लिये किसी भी राजभाषा का विचार त्याग देना चाहिये। रहा पर्वतीय संस्कृति का प्रश्न तो वैश्वीकरण के कारण समस्त पर्वतीय क्षेत्र भी दिग्भ्रमित हो गया है। जब से पर्वतवासियों को घड़ी मिलने लगी हाथ पर, मोबाइल आ गया हर कान पर कुछ मायनों में विदेश ही हो गया है। तब से किसी निश्चित पहनावे की, किसी निश्चित रीति-रिवाज की उपादेयता क्षीण हो गयी है। अतएव जो भी आधुनिक युग में अच्छी ग्राह्य बातें हैं उनको हम अपना लें और बाकी को तज दें। छोटी सी उम्र में चरस-गांजा, शराब, अतर आदि का प्रयोग न करें। दैनंदिन जीवन में तन, मन जिह्वा की स्वच्छता पर ध्यान दें। आलस से उद्यमिता की तरफ बढ़ें तो हम स्वयं ही अपने को सुसंस्कृत पायेंगे। रीति-रिवाजों के अभिन्न अंग के स्वरूप त्यौहारों को सादगी एवं सौहार्द से मनाना प्रारम्भ करें।