पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। कुमाऊँ विश्वविद्यालय को पतन की अथाह गहराइयों में ले जाने वाले मौजूदा कुलपति प्रो. सी. पी. बर्थ्वाल पर यह कहावत अक्षरशः सत्य साबित होती है। 7 अगस्त 2006 को पदभार ग्रहण करने के बाद डी.एस.बी. परिसर नैनीताल के भौतिकी विभाग के सेमिनार कक्ष में अध्यापकों से अपने पहले सम्बोधन में उन्होंने घोषणा की थी, ‘‘अब मुझे कभी पद छोड़ कर जाना भी पड़े तो कोई अफसोस नहीं होगा, क्योंकि मेरे नाम के आगे भूतपूर्व कुलपति तो लगा ही होगा।’’ इसी भाषण में उन्होंने अध्यापकों को यह राय भी दी कि किसी पुस्तक या शोध प्रबन्ध को आद्योपान्त पढ़ना जरूरी नहीं होता। शुरू और अन्त के दो-चार पेजों को पढ़ लेना पर्याप्त है। इस शानदार प्रारम्भिक उद्बोधन के साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालय की जड़ों में सुनियोजित ढंग से मट्ठा डालने का कार्य करना शुरू कर दिया। तीन साल के बाद अब हालत यह है कि परीक्षायें अवरुद्ध हो जाने से हजारों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है, आर्थिक दृष्टि से दीवालिया हो रहा विश्वविद्यालय अपने फिक्स्ड डिपॉजिट नकद करवा कर तनख्वाहें बाँट रहा है और दर्जनों शातिर और निकम्मे लोग आगामी बीस-पच्चीस साल तक विश्वविद्यालय की दुर्गत करने के लिये जहाँ-तहाँ नियुक्त हो गये हैं। बीस से पचास हजार रुपया मासिक वेतन लेने वाले अध्यापकों का एक बड़ा हिस्सा हरामखोर हो गया है और जिनकी अन्तरात्मा उनकी अकर्मण्यता के लिये उन्हें कचोटती है, वे अवसाद में घिरे सिर्फ बिसूरते रहते हैं। विश्वविद्यालय कार्य परिषद अपंग हो चुकी है। मगर चिन्ताजनक बात यह है कि सात-आठ वर्ष पूर्व उस समय के भ्रष्ट और नकलची कुलपति प्रो. बी.एस. राजपूत के खिलाफ जिस तरह छात्रों, अध्यापकों, अभिभावकों और नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा गोलबंद हो गया था, आज वैसा प्रतिरोध कहीं दिखाई नहीं पड़ता।
अपनी शामें एक मुँहलगे प्रोफेसर और अपने निजी सहायक के साथ नैनीताल की मालरोड और बोट हाऊस क्लब में बिताने को अपने पद दायित्व से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मानने वाले प्रो. बर्थ्वाल अकादमिक संगोष्ठियों में उद्घाटन वक्तव्य देते हुए प्रतिभागियों को भी यही उपदेश देते हैं कि ‘खरीददारी के लिये भोटिया मार्केट अवश्य जायें’ तो अपने विश्वविद्यालय के सहकर्मियों को समझाते हैं कि ‘सेमिनार तो खाने-पीने के लिये होते हैं। किसी भी एजेन्सी से पैसे लाओ और मौज करो।’ क्लब में अत्यन्त आपत्तिजनक स्थिति में देख कर एक बार निवर्तमान सांसद डॉ. महेन्द्र सिंह पाल ने उन्हें झिड़का तो बदला लेते हुए उन्होंने डॉ. पाल के करीबी समझे जाने वाले एक अध्यापक की प्रोन्नति ही रोक दी।![]()
जब नैनीताल से बाहर जाते ही अपनी निजी गाड़ी में ‘लालबत्ती’ लगा लेने वाला प्रो. बर्थ्वाल का मुँहलगा प्रोफेसर उनको कुलपति बनवाने के लिये आठ लाख रुपये की गड्डी लेकर घूम रहा था और कांग्रेसी नेताओं का एक गुट इस तर्क के साथ उनकी पैरवी कर रहा था कि ‘गढ़वाल विश्वविद्यालय का कुलपति एक कुमांऊँनी (प्रो. एस.पी. सिंह) बन गया है तो कुमाऊँ विश्वविद्यालय का कुलपति कोई गढ़वाली ही होना चाहिये’ तो ये सभी लोग इस सच्चाई से आँख मूँद रहे थे कि लखनऊ विश्वविद्यालय में ये सज्जन एच.आर. डी., पब्लिक रिलेशन और पब्लिक एडमिनिस्ट्रिेशन के अनेक फर्जी कोर्स चलाने के लिये और अनुसूचित जाति- जनजाति के लिये चलाये जाने वाले कोर्सों में तथा कम्प्यूटर सेंटर के लिये खरीद के घोटाले में विवादग्रस्त होकर जाँच के दायरे में आ चुके थे। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त होने से पूर्व 22-03-2006 को प्रो. बर्थ्वाल लखनऊ में अपने विभाग के एक कनिष्ठ सहयोगी डॉ. नन्दलाल भारती को छात्रों से पिटवा कर अस्पताल भिजवाने के लिये चर्चित हो चुके थे। लेकिन कुलपति पद ग्रहण करने से पूर्व दिये गये शपथ-पत्र में प्रो. बर्थ्वाल ने इन सारे तथ्यों को छिपा लिया। फिर तो वे लगातार यही कहते रहे कि ‘विश्वविद्यालय के अध्यापक क्या पढ़ाने के लिये होते हैं ?’ या ’जिस विश्वविद्यालय में तोड़फोड़ और तालाबन्दी ही न हुई, वह विश्वविद्यालय कैसा? अगस्त 2008 में जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के हुड़दंगी छात्रों ने सचमुच में विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन में तोड़फोड़ कर तालाबन्दी करवा दी तो भाजपा सरकार को खुश करने के लिये प्रो. बर्थ्वाल शर्मनाक ढंग से विद्यार्थी परिषद् को उत्तम चरित्र का प्रमाण पत्र देने में जुट गये।
अब तो विश्वविद्यालय में ऐसी अविश्वसनीय और चमत्कारिक घटनायें भी हो जाती हैं कि किसी साक्षात्कार के विशेषज्ञों के नाम पहले ही उजागर हो सकते हैं, शिक्षक के किसी पद पर हुए साक्षात्कार के नतीजे के लिफाफे कार्य परिषद में लाये जाने से पहले बदल दिये जा सकते हैं या फिर दस वर्ष पूर्व अनुत्तीर्ण हुआ कोई छात्र ‘बैक पेपर’ दे कर स्नातक की डिग्री प्राप्त कर सकता है। कुलपति के एक विश्वासपात्र तो नियुक्तियों में रुपयों के लेनदेन की बात भी स्वीकारते हैं।
प्रो. बर्थ्वाल ने एक नयी बात यह साबित की कि अकादमिक दृष्टि से मूर्ख और जबान से मुँहफट व्यक्ति भी अन्दर से बहुत कुटिल और दुष्ट हो सकता है। सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि ऐसा व्यक्ति ‘भोला’ होता है। दरअसल विश्वविद्यालय की दिशा तो तब जाकर स्पष्ट हुई, जब अपने मुँहलगे प्रोफेसर को प्रो. बर्थ्वाल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अन्तर्गत आने वाले एक संस्थान का निदेशक बनवा दिया और अपने ही जैसे एक मूढ़मति प्रोफेसर को गांधी अध्ययन केन्द्र का। उसके बाद से एकेडमिक स्टाफ कॉलेज षड़यंत्रों का एक केन्द्र बन गया और वहाँ लिये जाने वाले फैसले कुलपति पर बाध्यकारी होने लगे। फिर कुछ एक चर्चित अध्यापक और एक-दो अधिष्ठाता (डीन) कुलपति की चांडाल चौकड़ी के सदस्य बन कर विश्वविद्यालय का सत्यानाश करने लगे। शिक्षणेतर कर्मचारियों के नेताओं में से एक-दो को चुन कर और जब-तब देहरादून जाने के लिये मोटी रकम देकर कुलपति ने अपना विश्वासपात्र बना लिया और उनके माध्यम से कर्मचारियों में भी अपनी पैंठ बना ली।
अगस्त 2008 से विश्वविद्यालय परिसरों में शैक्षणिक गतिविधियाँ पूरी तरह ठप्प हैं। अध्यापक तब से कुमाऊँ विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की माँग को लेकर आन्दोलन कर रहे थे। वह तो बननी नहीं थी, क्योंकि गढ़वाल में बन गई थी। वहाँ के कुलपति प्रो. एस.पी. सिंह ने कोशिश की और राजनेताओं को भी सक्रिय किया। इधर कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति मौज-मस्ती में मुब्तिला रहे। इतने लम्बे समय तक शैक्षणिक और शिक्षणेतर कामकाज ठप्प होने से परीक्षाओं की तैयारी प्रभावित होनी ही थी। इसीलिये जब कुछ छात्र परीक्षा स्थगन की माँग को लेकर कुलपति से मिलने गये तो उन्होंने तत्काल उसे मान लिया। इस बीच लोकसभा के चुनाव सिर पर आ गये। परीक्षायें और आगे खिसक गईं। कुमाऊँ विश्वविद्यालय सम्भवतः देश का अकेला विश्वविद्यालय होगा, जहाँ लोकसभा चुनावों ने परीक्षाओं को चौपट किया। कारण ? जिला प्रशासन को चुनाव के लिये हल्द्वानी के एम.बी. महाविद्यालय की जरूरत थी और कुलपति ने कभी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया कि शासन-प्रशासन को जाकर समझायें कि एम. बी. कॉलेज के बदले कोई अन्य स्थान चुन लें। हजारों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करें। सच्चाई तो यह थी कि कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन की तो मुँह माँगी मुराद पूरी हो गई, क्योंकि इस बहाने उन्हें अपने नाकारापन को छुपाने का मौका मिल गया। जब सारे विश्वविद्यालयों में परीक्षायें लगभग निपट चुकीं और जैसे-तैसे 20 मई से कुमाऊँ विश्वविद्यालय में परीक्षायें शुरू हुईं तो कुछ ही समय के बाद शिक्षक और शिक्षणेतर कर्मचारी छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने की माँग को लेकर हड़ताल पर चले गये। हजारों छात्रों, जिनमें से अनेक को आगे अन्य शिक्षा संस्थानों में प्रवेश लेना था, का भविष्य अनिश्चय में झूलने लगा। उनके और उनके अभिभावक विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारियों को हरामखोर और समाजद्रोही कह कर गालियाँ देने लगे। इस कोलाहल में प्रो. बर्थ्वाल एक किनारे हो कर तमाशबीन बन गये। जिस समय शासन के आदेश से आयुक्त कुमाऊँ मंडल पी.सी.एस. अधिकारियों, इंटर कॉलेजों के अध्यापकों, सरकारी कर्मचारियों, पटवारियों, जूनियर इंजीनियरों आदि की मदद से परीक्षायें करवाने के लिये माथापच्ची कर रहे थे, प्रो. बर्थ्वाल अपने मुँहलगे प्रोफेसर के साथ रुहेलखंड विश्वविद्यालय में ‘वाइवा’ (मौखिक परीक्षा) ले रहे थे! नीरो वंशी ऐसे ही बजाता होगा।
परीक्षाफल अब अगस्त अन्त से पहले आने सम्भव नहीं हैं। बहुत से होनहार विद्यार्थी आगे पढ़ने से वंचित हो जायेंगे। विश्वविद्यालय का शिक्षा सत्र जुलाई के बदले अक्टूबर में शुरू होगा। सामान्यतः तब तक नैनीताल और अल्मोड़ा परिसरों में कक्षायें लगनी वैसे ही बन्द हो जाती हैं। फिर सत्र को नियमित करने के लिये शायद किसी वर्ष ‘जीरो’ सेशन करना पड़े। हजारों छात्रों का एक साल बर्बाद हो जायेगा। प्रो. बर्थ्वाल अगस्त में सेवानिवृत्त होकर किसी अन्य संस्थान को तबाह करने में मशगूल होंगे और वे अभिभावक जो आर्थिक कारणों से अपने बच्चों को कुमाऊँ विश्वविद्यालय में ही पढ़ाने को विवश हैं, सिर पीट रहे होंगे। कुमाऊँ विश्वविद्यालय तो अब अगले एक दशक तक पटरी पर नहीं आ सकता, क्योंकि इसे लेकर कोई चिन्ता तो समाज में कहीं है ही नहीं। और जब अगले कुलपति के पद के लिये अखबारों में ‘टेंडर’ निकाले जाने की अनहोनी शुरू हो गई है तो उम्मीद जगे भी कहाँ से ?























Virodh islie nahi hota kyonki aap ki mitra mandali ke log bhi bahati ganga me hath dhone men lage rahte hain.
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