बदरीनाथ धाम में बढ़ती यात्रियों की संख्या तथा विशेष अतिथि (वी.आई.पी) को बिना लाइन में लगे दर्शन कराने पर यात्रियों तथा पुलिस दल के बीच 10 जून को मारपीट हो गई, जिसमें एक महिला को काफी चोट आई. इसके प्रतिरोध में धाम में एक दिन की हड़ताल हो गई।
मंदिर में प्रवेश का एक द्वार है और निकासी का एक। कुछ कर्मचारी विशेष अतिथियों को निकासी के द्वार से प्रवेश करा कर जल्दी से दर्शन करा देते हैं। इसका एक महिला यात्री जो उस दिन चार घंटे से लाइन में लगी थी, ने विरोध कर लाइन तोड़ परिसर में प्रवेश का प्रयास किया। इस पर होम गार्ड (कुछ समय के लिए लगाए गए पुलिस कर्मचारी) ने उसे पीट कर घायल कर दिया। मंदिर के पूर्व अधिकारी मनोहरकांत ध्यानी, उस समय वहाँ उपस्थित थे। वे झगड़ा शांत कराने आए और तब तक मारपीट की खबर सुन शहर के व्यापारी लोग भी वहाँ पहुँच गए। अधिकारियों तथा जनता के बीच कुछ अभद्र बोलचाल हो गई, जिसके फलस्वरूप बाजार बंद हो गया।
परिसर के पिछले मार्ग से खास यात्रियों के प्रवेश पर प्रति वर्ष मंदिर में समस्याएं और झगड़े होते रहते हैं। वी.आई.पी. लोगों को उस मार्ग से ले जाने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, नहीं तो आम यात्री जिसे कभी दस घंटे तक दर्शन के लिए लाइन में खड़ा रहना पड़ता है हमेशा कुछ लोगों को पीछे के रास्ते जल्दी से दर्शन कराने पर आपत्ति उठाते रहेंगे और लड़ने को तैयार रहेंगे।
देहरादून शहर के अंदर की सवारी ढोने वाली ‘सिटी सर्विस’ बसें आजकल यात्रियों को बदरीनाथ ले जा रही हैं। उनमें से किसी के पटल पर लिखा है: ‘सीमा द्वार से राजपुर रोड’। लेकिन बस जा रही है बदरीनाथ! सेना के नौवें स्वतंत्र ब्रिगेड के जवान यात्रियों की भीड़ को जोशीमठ में टैंकरों से पानी पिला रहे हैं। नल सूखे पडे़ हैं। दस किलोमीटर नीचे, जहाँ एक जल विद्युत बनाने वाली कंपनी की सुरंग से 600 लिटर प्रति सेकिंड बहने वाला पानी का नाला फूट निकला है, जो एक छोटी नदी बनाता हुआ अलकनंदा में समा रहा है। उसके कारण ऊपर के सब पानी के गधेरे तथा स्रोत सूख गए हैं। जोशीमठ शहर में सरकारी नलों से लाया गया पानी दिन में केवल एक घंटे मिलता है, जो नगर की प्यास बुझाने के लिये अपर्याप्त है। तभी ब्रिगेडियर बडोला को प्यासे तीर्थयात्रियों को पानी पिलाने अपने जवान लगाने पड़े। उत्तराखंड परिवहन निगम ने अपने बड़े बेड़े की सबसे बुरी हालत वाली बसें यहाँ यात्रा मार्गों में लगाई हैं। वातानुकूलित तथा आरामदेह कुर्सियों वाली बसें देहरादून से दिल्ली, मेरठ तथा अन्य बड़े नगरों की सवारियों के लिए लगाई गई होती हैं। तीर्थ यात्रियों की संख्या इतनी बढ़ गई है और बसों तथा गाड़ियों की इतनी कमी हो गई है कि दो-तीन दिनों तक हरिद्वार से पहाड़ के किसी भी नगर, गाँव या बदरीनाथ, केदारनाथ आने के लिए उनमें जगह नहीं मिलती। प्राइवेट टैक्सियों के किराए आसमान छूने लगे हैं। रास्ते के शहरों, जैसे देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग से सवारियों को बसों-टैक्सियों में स्थान पाना असंभव है। एक सूमो में आठ की जगह अब 15 या अधिक लोग भरे होते हैं।
इस साल यात्रा में भीड़ बहुत अधिक हो गई है। बदरीनाथ में एक दिन में 24,000 तक यात्री पहुँचने लगे हैं। वहाँ इतने लोगों के रहने की व्य्ावस्था नहीं है। कई यात्री बसों में ही रात बिताते हैं और कुछ कड़कती ठंड में आसमान के नीचे। पिछले साल यात्रियों की अधिकतर संख्या एक दिन में दस हज़ार के लगभग थी। प्रति वर्ष यह संख्या बढ़ती जा रही है। यह क्यों हो रहा है, स्पष्ट नहीं है। बदरीनाथ देश का प्रमुख तीर्थ अवश्य है, जहाँ अधिक से अधिक हिन्दू आना चाहते हैं। यह तीर्थ सुंदरता में भी अद्वितीय है और मैदानों की भीषण गर्मी से निजात दिलाने वाला भी। उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों में वही अकेला है, जहाँ मोटर से जाना संभव हो पाता है। अन्य धामों में पहुँचने के लिये कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। दूसरा कारण है कि देश में निजी गाड़ियों की संख्या बहुत बढ़ गई है। गर्मियों में मैदानों में स्कूलों की छुट्टी हो जाती है। जिनके पास गाड़ियाँ हैं, वे देश के कई भागों से परिवारों के साथ बदरीनाथ के दर्शन तथा गर्मी से कुछ दिन निजात पाने आ जाते हैं। देश में आमदनी कुछ बढ़ी है और जिसकी इच्छा होती है, वह साल भर में कुछ पैसा जमा कर बदरीनाथ आने का किराया तथा खाने-पीने का खर्चा जोड़ने में लग जाता है। हिन्दुओं में तीर्थाटन का पुरातन संस्कार है। तपती गर्मी में पहाड़ आना एक सुखद अनुभव है। दो-चार दिन ही सही, लोग पहाड़ की शांति तथा शीतलता का अनुभव करना चाहते हैं। ऐसा नहीं कि देश में अचानक श्रद्धा का उबाल आ गया है। आस्था उतनी ही है जितनी पहले थी। लेकिन संसाधन अधिक हो गए हैं। कुछ साधु अभी भी 300 किमी यात्रा पैदल ही करते हैं, किन्तु उनकी संख्या नाममात्र की है। जैन धर्मानुयायी ही पैदल आते हैं। उनके लिए गाड़ियों में चलना वर्जित है।
मंदिर जो शाम के सात-आठ बजे बंद हो जाया करता था, अब आधी रात तक खुला रहता है, जब तक दर्शनार्थियों की कई किमी. लंबी लाइन दर्शन नहीं कर लेती। मंदिर का गर्भगृह छोटा है, जिसमें एक समय में 150 से अधिक यात्री खड़े नहीं रह सकते। मंदिर के कर्मचारी उस भीड़ को निरन्तर चलाते रहते हैं। बदरीनाथजी के सामने प्रणाम करने किसी को आधा मिनट का समय भी नहीं मिल पाता। कर्मचारी चिल्लाते रहते है: ‘‘चलो! चलो’’ और यात्रियों को दूसरे द्वार से बाहर निकालने के लिये जुटे रहते हैं। केवल वही यात्री, जिन्होंने विशेष पूजा के लिए पर्ची कटवाई हो, भगवान के सामने पाँच मिनट रुक सकते हैं, जब तक दोनों ओर बैठे वेदपाठी स्तुति के कुछ श्लोक नहीं बोल लेते और प्रत्येक मूर्ति का नाम नहीं बता देते।
यात्रियों की संख्या इसी तरह अनियंत्रित ढंग से बढ़ती रही तो बदरीनाथ में उनकी व्यवस्था करना असंभव हो जाएगा। जून के बाद यात्रियों की संख्या घटने लगती है। आरंभ का उभार एक महीने से से भी कम समय चलता है। जुलाई में वर्षा शुरू होने पर सड़कें टूटने लगती हैं, यातायात कम हो जाता है और यात्रियों की संख्या में कमी आ जाती है। अगस्त-सितंबर में बदरीनाथ खाली सा लगता है। अक्टूबर के नवरात्र में यात्रियों की संख्या फिर कुछ बढ़ जाती है, लेकिन उतनी नहीं जितनी जून के आरंभ में।
जब देश-प्रदेश की सरकारें तक जुगाड़ पर चल रही हैं तो मंदिर में भगवान के दर्शन पर आपको आपत्ति क्यों है?