वर्ष 2011-12 के केन्द्रीय बजट में सबसे ज्यादा निराशजनक तथ्य है, केन्द्र सरकार का रसोई गैस और मिट्टी तेल से सब्सिडी पूरी तरह खत्म करने का फैसला। पहले से ही दैनिक उपभोग की वस्तुओं में लगी महंगाई की आग के बीच रसोई-ईंधन के दामों में बढ़ोतरी करने के बाद आम जन को चूल्हा जलाना मुश्किल हो जायेगा। पर्वतीय क्षेत्र में तो ईंधन का कोई सर्वसुलभ विकल्प न होने से इस निर्णय के घातक परिणाम सामने आयेंगे।
पर्वतीय क्षेत्रों में बीते दो दशक पूर्व में ही रसोई गैस की आपूर्ति व्यवस्था हो सकी है। पहाड़ के जंगलों पर ईंधन के लिये बढ़ते दबाव के मद्देनजर एल.पी.जी. गैस को विकल्प स्वरूप प्रस्तुत किया गया। दुर्गम गाँवों में रसोई गैस की पहुँच ग्रामीण जनता के खर्च और साहस पर ही संभव हो सकी है। कोई बीस वर्ष पूर्व जब पहाड़ में रसोई गैस की सुविधा शुरू हुई, तब एक सिलेण्डर की कीमत 56 रुपया हुआ करती थी जो अब 350 रुपये है। इसके ऊपर भी उपभोक्ता को रुपया 10 से 200 तक सिलेण्डर के ढुलान में खर्च करने पड़ते हैं।
पहले से ही गैस वितरण अव्यवस्था, मूल्य वृद्धि, बढ़ी हुई मजदूरी के खर्च के बोझ से दबी पर्वतीय जनता के लिए केन्द्रीय बजट में 700 रुपया प्रति रिफिल सिलेण्डर और 33 रुपये लीटर मिट्टी तेल की कीमत किये जाने की घोषणा ने कोढ़ में खाज पैदा की है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस कोटे से केन्द्र में मंत्री बने सांसद हरीश रावत का मानना है कि गैस और मिट्टी तेल की कालाबाजारी रोकने के लिये मूल्य वृद्धि के कदम उठाये गये हैं। लगता है कि रावत की नजरों में सरकार के उस तन्त्र की कोई अहमियत नहीं है जिसे कालाबाजारी रोकने का काम दिया गया है और जिसे प्रशासन कहते हैं। रावत की मानें तो रसोई गैस व मिट्टी तेल के चन्द कालाबाजारियों के कारनामों का खामियाजा सब भुगतें और वह भी अपनी गाढ़ी कमाई की कीमत पर। समय रहते इन परिस्थितियों को नहीं समझा गया तो पहाड़ में चूल्हा जलाने के लिये यहाँ के बाशिन्दों को जबर्दस्त संघर्ष की स्थितियों से जूझना पड़ सकता है। रसोई गैस व मिट्टी तेल की इतनी बढ़ी हुई कीमतों को झेलने के लिये उपभोक्ता कतई तैयार नहीं है। इस फैसले का सीधा असर फिर से जंगलों पर पड़ने जा रहा है। पहले से ही वन कानून इतने कड़े हैं कि आम आदमी इनका सामना नहीं कर सकता। अलग बात है कि शासन-प्रशासन की मिलीभगत से तस्करों के लिये वन कानून कोई मायने नहीं रखते। पहाड़ के जंगल आँकड़ों में जरूर हैं पर जंगलों की वास्तविक तन्दुरस्ती दुरुस्त नहीं है। आश्चर्य है कि इन्हीं आँकड़ों के दम पर राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ केन्द्र से ग्रीन बोनस की माँग कर रहे हैं।