मनुष्य की प्रगति में सूचना व ज्ञान का अहम योगदान रहा है और इसकी स्रोत रही हैं किताबें। पुस्तकालय एक जमाने में ज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र माने जाते थे। मगर समय बदला, ऑनलाईन का युग आया, पुस्तकों से लेकर पत्र-पत्रिकाएँ, जानकारियाँ सब कम्प्यूटर के अंदर समा गये तो सूचना व ज्ञान के ये केन्द्र उपेक्षा के शिकार होते गए। अब पुस्तकालयों की ओर लोगों के कदम बहुत कम बढ़ते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी पुस्तकों के महत्व को कम नहीं आँका जा सकता।
उत्तराखंड के पुस्तकालयों की स्थिति पर नजर डालें तो यहाँ पर कुल 50 पुस्तकालय हैं। इनमें 8 राजकीय पुस्तकालय, 16 जिला शाखा पुस्तकालय व 26 निजी मान्यता प्राप्त पुस्तकालय हैं। इनमें से अल्मोड़ा में 8, बागेश्वर में 2, चमोली में 5, चम्पावत में 1, देहरादून में 7, हरिद्वार में 1, नैनीताल में 6, पौड़ी में 4, पिथौरागढ़ में 3, रुद्रप्रयाग में 3, टिहरी में 3, उधमसिंहनगर में 3 और उत्तरकाशी में 4 पुस्तकालय हैं। बागेश्वर, चम्पावत, हरिद्वार, रुद्रप्रयाग और उधमसिंहनगर में कोई भी राजकीय पुस्तकालय नहीं है।
निदेशक विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखंड देहरादून द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक राज्य में स्थापित राजकीय जिला पुस्तकालयों में अल्मोड़ा में 80,000, नैनीताल में 17,595, पिथौरागढ़ में 38,000, पौड़ी में 15,017, टिहरी में 18,895, देहरादून में 17,000, चमोली में 55,578 और उत्तरकाशी में 51,415 पुस्तकें है। राजकीय जिला शाखा पुस्तकालय हल्द्वानी में 3,500, लोहाघाट में 8,500, काशीपुर में 5,087, मुनस्यारी में 8,000, बाड़ेछीना में 4,598, रानीखेत में 4,105, द्वाराहाट में 5,200, अगस्तमुनि में 8,100, चम्बा में 5,186, जोशीमठ में 10,553, कर्णप्रयाग में 9,863, पोखरी में 9,156, बड़कोट में 2,443, चिन्यालीसौड़ में 2,443, भटवाड़ी में 2,443 पुस्तकें हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि रखरखाव के अभाव में इन पुस्तकालयों की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है।