[राजेन्द्र रावत ' राजू' द्वारा लिखा गया यह लेख 15 से 31 अक्टूबर 1982 के नैनीताल समाचार में प्रकाशित हुआ था। उनके द्वारा लिखे गये अन्य लेख पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें ]
(शोलापुर चादरों के लिये विख्यात शहर है। परंतु पौड़ी के उन आदमियों के लिये जो जन्मांध श्रीनिवास नारायण करदास को जानते हैं, शोलापुर एक ऐसा शहर है जहाँ श्रीनिवास ने अपने परिवार को आँखें न होते हुए भी तबाह होते देखा है। श्रीनिवास को यह भी पता नहीं कि वह कब पैदा हुए और कब पिता व छोटे भाई की मौत हुई। बकौल उसके वह सन् 69 से पौड़ी में भिक्षावृत्ति के जरिये पेट पाल रहा है। 30 वर्षीय श्रीनिवास को पौड़ी की सड़कों पर ‘हरिओम’ व ‘जयशंकर’ कहकर माँगते हुए देखा जा सकता है। ‘छ्वीं बथ’ नितांत अनौपचारिक माहौल में कई बैठकों में हुई। फिर भी मैंने महसूस किया इन बैठकों के दौरान वह समझ गया कि में कागज कलम लेकर उसकी बातें नोट कर रहा हूँ।)
प्रश्न:- भाई श्रीनिवास ! शोलापुर से पौड़ी कैसे आ गये ?
उत्तर:- वहाँ पिताजी कपड़े की मिल में काम करते-करते एक छोटी फैक्ट्री के मालिक हो गये थे। पर दारू सब कुछ ले डूबी। फैक्ट्री और पिताजी को भी। तब छोटा भाई माँ के गर्भ में था। वहीं शोलापुर 8-9 महिने बड़े मामा के साथ रहे। रोजाना का घपला। बड़े मामा दारू पीकर माँ पर हाथ छोड़ बैठते थे। मैंने कहा- माँ चल। अब यहाँ नहीं रहना। माँ बीड़ी की फैक्ट्री में काम कर हमारा पेट पाल रही थी। फिर बालाजी, जगन्नाथ पुरी, भुवनेश्वर, अहमदाबाद, मथुरा, इलाहाबाद, काशी होते हुए पौड़ी आ गये। सारे रास्ते भीख माँग कर गुजारा किया। लोगों की गालियाँ भी खायी। भाई, भगवान ने मुझे अंधा तो बनाया पर गालियाँ क्यों खिलवाता है यह भगवान ?
प्रश्न:- शोलापुर में बचपन कैसा बीता तुम्हारा ?
उत्तर:- जब पाँच महीने का था तो पिताजी आँखों के इलाज के लिये कहाँ-कहाँ नहीं ले गये। दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई, मद्रास। पता नहीं कितनी जगह। तब से लेकर 3 साल की उम्र तक माँ का दूध नहीं पिया। मैं ब्लाइंड स्कूल (मराठी) पूना में भर्ती हो गया। फिर शोलापुर चला आया। तीसरे दर्जे तक पढ़ा हूँ। पढ़ लेता हूँ। हम भृगुवंशी पद्माशाली ब्राह्मण हैं। पेशे के नाम पर पुरोहित, साड़ी और चाँदी की जरियाँ बुनने का काम करते थे।
प्रश्न:- माँ जी शोलापुर में क्या कर रही हैं ?
उत्तर:- वही, बीड़ी बनाने का काम। बहिन को भी सिखाती हैं और दोनों साथ काम करती हैं। मालिक लोग एक किलो पत्ता देते हैं, जिससे 8-9 सौ बीड़ियाँ बनती हैं। हमारे यहाँ इस पेड़ को तुनक्का चिपान कहते हैं। माँ और बहिन मिल कर आठ रुपये रोज़ाना कमा लेते हैं। रहते बड़े मामा के पास ही हैं। कमरे का 25 रु. और खाना-कपड़ा अलग होता है। अभी जब मैं भाई की मौत पर शोलापुर गया था तो पाँच सौ रुपये का कर्जदार हो गया। अढ़ाई सौ आनन्द सिंह चौधरी को देने हैं। बड़ी मदद की उन्होंने। सौ रुपये राशन का कर्जा पहले था, ऊपर से जब में यहाँ से घर आ रहा था तो डेढ़ सौ रुपया और चौधरी जी से लिया। मैंने उनसे मजाक में कहा- चौधरी जी लौट कर नहीं आया तो क्या करोगे ? (श्रीनिवास दोनों हाथों से गाल बजा कर हँसता है।) वहाँ देखा माँ और बहिन की तबियत खराब है। दोनों के इलाज में 350 रुपये बर्बाद हो गये। किराया भी तो वहाँ से यहाँ तक कम नहीं है। कुछ पैसे हो जायें तो सोच रहा हूँ कि माँ और बहिन दोनों को यहीं ले आऊँगा। यहाँ कमरे का 45 रुपये देना पड़ता है।
प्रश्न:- भीख माँगना कैसा लगता है ? तुम्हारा ब्राह्मण होना इस पेशे में रोड़े तो नहीं अटकाता ?
उत्तर:- कैसे रोड़े ? मैं तो भगवान और पेट के नाम पर पैसा माँगता हूँ। मैं पहले कुर्सी बुन लेता था। अब थोड़ा भूल गया हूँ। चारपाई अभी भी बुन लेता हूँ। भीख माँगना किसे अच्छा लगेगा ?
प्रश्न:- श्रीनिवास भाई, आगे का क्या प्रोग्राम है ?
उत्तर:- शादी नहीं करूँगा। अपना पेट नहीं पलता, दूसरे पेट की आग कहाँ से बुझाऊँ। पहले तो बहन की शादी करनी है। 18-19 साल की हो गई है। तुमने देखा होगा माँ और बहन यहाँ साथ ही मजदूरी करती थीं। अब बहन की शादी हो जायेगी तो पौड़ी में एक कुटिया बनाकर माँ के साथ रहूँगा। इसलिये तो डी.एम. साहब के पास अर्जी दी है। आलोक चीना (सिन्हा) साब थे न ? उनके जमाने से लगा हूँ। अभी तक कुछ नहीं हुआ। कहते हैं अभी अर्जी ऊपर गयी है। यहाँ बड़ा प्यार मिला है लोगों का। (बहुत से लोगों का नाम गिनाता है श्रीनिवास, जो वक्त बेवक्त उसकी मदद करते हैं) इसलिये मैं इस जगह को छोड़ कर कहीं जा भी तो नहीं सकता। बद्री-केदार जा चुका हूँ। अबकी बार वैष्णो देवी जाऊँगा माँ के साथ।

























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