राजधानी चयन आयोग रूपी सफेद हाथी को प्रदेश की भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने 8 साल तक पाला – पोसा। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जब आयोग ने प्रदेश सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो वह उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का चयन किये जाने के नाम पर ‘चार सौ बीसी’ के अलावा और कुछ नहीं निकला। आयोग ने कथित रिपोर्ट के नाम पर दिल्ली के किसी ‘योजना और वास्तुकला विद्यालय’ नाम के स्कूल की एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रदेश सरकार को सौंप दी, जिसमें राजधानी चयन आयोग का कहीं नाम नहीं था। उस रिपोर्ट का भी एक ही भाग प्रदेश सरकार को सौंपा गया। दूसरा भाग कहाँ गया, कोई नहीं जानता। यह भी नहीं मालूम कि वह दूसरा भाग प्रदेश सरकार को सौंपा भी जाएगा या नहीं। इस बारे में भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। इस आयोग ने राज्य की जनता का 70 लाख से अधिक रुपया यूँ ही पानी की तरह बहा दिया।
अब ऐसा ही कुछ काँग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल के दौरान मार्च 2002 से फरवरी 2007 तक हुए घोटालों की जाँच के लिए बनाए गए आयोग के नाम पर होने वाला है। भारतीय जनता पार्टी ने फरवरी 2007 के विधानसभा चुनाव में तिवारी सरकार के समय हुए घोटालों को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था और घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर वह इनकी जाँच करायेगी और दोषी व्यक्तियों को जेल भेजेगी। भाजपा ने 56 घोटालों की सूची भी चुनाव प्रचार के दौरान जारी की थी। जिस आक्रामक अंदाज में चुनावी सभाओं में भाजपा नेता जाँच की बात कहते थे, उससे जनता को लगता था कि शायद भाजपा नई राजनैतिक संस्कृति राज्य में लाना चाहती है। इसी भरोसे में उसने भाजपा को सत्ता सौंपी। 8 मार्च 2007 को भुवन चन्द्र खण्डूरी मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद घोटालों की जाँच के वायदे की अनदेखी करते रहे। लेकिन जब इस बारे में मीडिया में सवाल उठने लगे और स्वयं कांग्रेस ने भी जाँच कराने की राजनैतिक चुनौती भाजपा सरकार को दी तो खण्डूरी ने 5 सितम्बर 2007 को वर्मा जाँच आयोग का गठन कर दिया।
एक सदस्यीय ए.एन. वर्मा जाँच आयोग को सभी 56 घोटालों की जाँच के लिये एक साल का समय दिया गया था। आयोग के अध्यक्ष वर्मा इलाहाबाद के रहने वाले थे। वर्मा आयोग दो-एक बार देहरादून आया और जाँच के नाम पर बैठक की खानापूर्ति करके वापस चला गया। एक साल का कार्यकाल समाप्त होने से ठीक चार दिन पहले वर्मा आयोग ने यह कहते हुए प्रदेश सरकार को त्यागपत्र दे दिया कि वह कार्य करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि उनका स्वास्थ्य खराब है और देहरादून की दूरी इलाहाबाद से बहुत ज्यादा है। अपने एक साल के कार्यकाल में वर्मा आयोग ने एक पेज की रिपोर्ट भी प्रदेश सरकार को नहीं सौंपी। प्रदेश सरकार ने भी वर्मा आयोग से इस बारे में कोई जवाब-तलब नहीं किया और 6 सितम्बर 2008 को मुख्यमंत्री खण्डूरी ने आर.ए. शर्मा की अध्यक्षता में नया आयोग गठित कर दिया। शर्मा आयोग को भी एक साल का समय जाँच रिपोर्ट के लिये दिया गया।
शर्मा आयोग के गठन के समय ही यह सवाल उठाया जाने लगा था कि क्या यह आयोग अपनी तय समय सीमा में रिपोर्ट सौंप भी पायेगा ? जैसा हर आयोग के साथ होता है, वैसा शर्मा आयोग के साथ भी हुआ। तय समय के अंदर उसने सिर्फ एक ही घोटाले की जाँच रिपोर्ट प्रदेश सरकार को सौंपी। इसके साथ ही उसने कार्यकाल बढ़ाने का अनुरोध भी किया। मुख्यमंत्री निशंक ने शर्मा आयोग का कार्यकाल एक साल के लिये बढ़ा दिया। इस बीच शर्मा आयोग ने उद्यान विभाग से संबंधित कथित तीन और घोटालों की जाँच रिपोर्ट सरकार को सौंपी। वह अपनी जाँच को आगे बढ़ाते, उससे पहले ही आयोग के अध्यक्ष आर. ए. शर्मा का फरवरी 2010 में निधन हो गया, जिससे जाँच का कार्य अधर में लटक गया।
बाकी घोटालों के लिये प्रदेश सरकार ने 13 मई 2010 को पुलिस शिकायत प्राधिकरण के अध्यक्ष शंभूनाथ श्रीवास्तव को जाँच आयोग का अध्यक्ष बना दिया। सरकार ने स्पष्ट किया कि श्रीवास्तव आयोग उन चार घोटालों की जाँच नहीं करेगा, जिनकी रिपोर्ट शर्मा से मिल चुकी है और 52 घोटालों की जाँच नये सिरे से ही करेगा। अर्थात् अन्य घोटालों के बारे में शर्मा आयोग ने अब तक जो भी कार्य किया था, वह सब रद्दी की टोकरी में गया।
जाँच के नाम पर पूर्ववर्ती दो आयोगों ने लगभग ढाई साल में जो कुछ किया वह सबके सामने है। ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि श्रीवास्तव आयोग भी एक साल में अपनी जाँच पूरी तो क्या आधी भी नहीं कर पायेगा और शर्मा आयोग की तरह ही एक-आध रिपोर्ट सरकार को देकर अपना कार्यकाल बढ़वा लेगा। ऐसे में यह पूरी तरह साफ है कि 2012 के विधानसभा चुनाव तक तो जाँच पूरी होनी नहीं है। हाँ, प्रदेश सरकार कांग्रेस के ज्यादा हो हल्ला मचाने पर उसे जाँच रिपोर्ट का भय दिखा सकती है। ऐसा वह पूर्व में एक-दो बार कर चुकी है। वैसे काँग्रेस भी सत्ता के चरित्र को अच्छी तरह से जानती है। सो वह भी भाजपा सरकार को रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की चुनौती देती रही है। एक तरह से ऐसे राजनैतिक जाँच आयोगों की रिपोर्ट पर क्या कार्यवाही की जाती है ? यह प्रदेश सरकार भी अच्छी तरह से जानती है, सो वह भी कार्यवाही के नाम पर खानापूर्ति ज्यादा करती है। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जाँच आयोग की रिपोर्ट पर जब कोई कार्यवाही होनी ही नहीं है तो फिर आयोग का सफेद हाथी क्यों जबरन जनता की छाती पर पाला जा रहा है ?



























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