प्रस्तुति : हरीश चन्द्र फुलारा
उत्तराखंड के 10 पर्वतीय जिलों की जनता का बहुत बड़ा कर्ज भारतवर्ष पर है। यहाँ के अधिकांश परिवारों की माताओं ने अपने कम से कम एक सपूत को सीमाओं की रक्षा एवं आन्तरिक सुरक्षा के लिए देश को समर्पित किया है तो परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा अपनी जान को जोखिम में डाल कर 70 प्रतिशत भूभाग में जंगलों की रक्षा कर पर्यावरण को बचाये रखा है, जिससे देश के महानगरों को शुद्ध हवा और पीने एवं सिंचाई के लिए पानी मिल रहा है। यदि मैदानी क्षेत्रों की भाँति यहाँ भी जंगल काट कर कंक्रीट के जंगल बना दिये गये होते, तब वातानुकूलित कमरों में बैठे देश के कर्णधारों को पता चलता कि पहाड़ के पानी एवं जवानी का इस देश में कितना योगदान है।
अब तक उत्तराखंड सरकार एवं केन्द्र सरकार के सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण प्रतीत होते थे। परन्तु जब से भुवन चन्द्र खंडूरी की जगह रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की सरकार आयी और केन्द्र में संप्रग सरकार दुबारा सत्ता में आयी, तब से आपस में तलवारें खिंच गई हैं। केन्द्र सरकार के मंत्री और सांसद राज्य सरकार पर आरोप लगाते हैं कि विकास कार्यों के लिए केन्द्र से आया धन खर्च नहीं हो पा रहा है तो राज्य सरकार और भाजपा के पदाधिकारी आरोप लगाते हैं कि केन्द्र सरकार राज्य के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है और विकास कार्यों के लिये पैसा नहीं दे रही है। सच क्या है, यह तो देर सबेर पता चल ही जायेगा, पर फिलहाल इस खींचतान का खामियाजा उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों को भुगतना पड़ रहा है। अंग्रेजों की गुलामी से आजादी के बाद भी विकास अवरुद्ध ही रहा तो पृथक उत्तराखंड राज्य की माँग उठी और अनेक जुल्म सहकर जनता ने राज्य हासिल भी कर लिया। परन्तु आज भी उत्तर प्रदेश के समय की नीतियों के तहत अफसरशाही हमारे ऊपर राज कर रही है। योजनाओं के लिये नाम पहाड़ी जिलों का लिया जाता है परन्तु खर्चा तीन मैदानी जिलों में किया जा रहा है। राज्य सरकार कहती है कि केन्द्र सरकार द्वारा औद्यौगिक पैकेज वर्ष 2013 से घटा कर 2010 कर देने से उद्योग नहीं लग पायेंगे, राज्य में पूँजी निवेश एवं विकास रुक जायेगा और लाखों लोग रोजगार से वंचित हो जायेंगे।
सरकार यह तो बताये कि पूर्व में दिये गये औद्यौगिक पैकेज से 10 सालों में 10 पहाड़ी जिलों में कितने उद्योग लगे और उनमें कितने लोगों को रोजगार मिला। इस अवधि में हरिद्वार, उधमसिंहनगर एवं देहरादून में लगे उद्योग भी क्या पूरी क्षमता के साथ कार्य कर रहे है ? ऐसा तो नहीं कि वे सस्ती दरों पर भूमि प्राप्त कर और कलपुर्जों को एसेम्बल कर विभिन्न करों एवं सबसिडी का लाभ उठा रहे हों ? इन उद्योगों में रोजगार के नाम पर ठेके में मजदूर रखे जा रहे हैं। यदि सरकार अथवा औद्यौगिक घराने ईमानदार होते तो इन 10 सालों में आई.टी.आई. के माध्यम से कुशल कारीगर यहीं पर तैयार कर सकती थी। इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर, जिस तरह से भाजपा के छोटे से कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष तक को नीद में भी औद्यौगिक पैकेज ही नजर आ रहा है, उससे प्रतीत होता है कि इनके अपने लोग अब उद्योग लगाने लायक हो गये हैं। उधर जब से केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कोपेनहेगेन से लौटे हैं, लगता है कि जैसे उन्हें पूरी दुनिया के पर्यावरण को बचाने का ठेका मिल गया है और उसके लिए उन्होंने उत्तराखंड को अपनी कर्मभूमि चुना है।
विकास के लिये सुगम यातायात एवं ऊर्जा का विशेष महत्व है। उत्तराखंड में विद्युत उत्पादन की अपार सम्भावनायें है। यदि जनता के हित एवं पर्यावरण को ध्यान में रख कर छोटी परियोजनाओं से बिजली का उत्पादन किया जाये तो उससे यहाँ की अर्थव्यवस्था काफी सुदृढ़ हो सकती है। परन्तु नीति निर्माताओं को तो अपने चहेतों की चिन्ता है। बड़े-बड़े बाँधों की परिकल्पनायें की जाती हैं, मोटे कमीशन पर उनकी डी.पी.आर. बनती है, उनमें काम आरम्भ होता है और बाद में अधूरे में उन्हें बन्द कर दिया जाता है। पहाड़ी जिलों में उद्योग न लग पाने का एक कारण सड़कों का अभाव भी है। भारत सरकार द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में 250 तक की आबादी वाले प्रत्येक गाँव को मोटर मार्ग से जोड़ने का कार्यक्रम प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से चलाया जा रहा है। अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों के आर्थिक, सामाजिक उत्थान एवं उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए 40 प्रतिशत तक की आबादी वाले अनुसूचित जाति एवं जनजाति बहुल गाँवों को मोटर मार्ग से जोड़ने का कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। ये दोनों योजनायें पूर्ण रूप से केन्द्र पोषित हैं। राज्य सरकार को सिर्फ इनके लिए भूमि की व्यवस्था करनी है। यहाँ बता दें कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में किसानों की नाप भूमि के अलावा समस्त प्रकार की भूमि को वन अधिनियम 1980 के दायरे में लिया गया है, जिसमें बिना भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के कोई भी गैरवानिकी कार्य नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार द्वारा उक्त दोनों योजनाओं के अन्तर्गत कई मोटर मार्गों के निर्माण हेतु वन भूमि प्रस्ताव गठित कर भारत सरकार के क्षेत्रीय कार्यालय लखनऊ को स्वीकृति हेतु भेजे गये, परन्तु वहाँ पर वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारियों द्वारा हर प्रकार से पूर्ण होने के उपरान्त भी इन प्रस्तावों को या तो निरस्त कर दिया जाता है या संशोधन हेतु वापस भेज दिया जाता है। यह स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है।
Nice Article regarding the development of the Uttrakhand state. It is totally a politician trap to make corruption. Till than khanduri ji was CM there was something that opposition party also support that thing . but that is also demoralised by the other member of the party because they know that there is no way to make money till khanduri ji is CM. and now Ramesh is doing what khanduri ji had not done.