बसंत पंचमी आ गयी थी। इस उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन के बाद बौद्धिकों ने आर्थिक मंदी, ग्लोबल वार्मिग का मोर्चा खोल दिया था। एक कविता पर अच्छी चर्चा हुई थी, जिसमें कहा गया था कि चेहरे पीले हो गये हैं, रुमाल पीले हों न हों। एक किसान कवि कह रहे थे, अरे साहब कैसा बसंत, कैसी फसल सब सूख गया है। देश ही सूख गया है। एक लड़का दिल्ली में अच्छी नौकरी में था, निकाल दिया गया है। क्या करें, कहाँ जायें ? इस बार तो होली बैठकों में भी जाने को मन नहीं कर रहा…।
फिर वैलेण्टाईन डे की बात आयी तो अश्लीलता और संस्कृति पर भी चर्चा हुई। वैलेण्टाईन डे को तो मीडिया से ले कर हिन्दूवादियों तक, सबने भुनाया। किसी ने कहा भी हमारे वहाँ बसंत तो वैसे ही वैलेण्टाईन डे हुआ। बसंत में तो बूढ़े भी बौलिया जाते हैं। इस मौसम में तो नया खून बनने वाला ठैरा। होलियाँ भी रागरंग वाली यहीं से शुरू हो जाती हैं। गढ़वाल में तो प्यौली फूली तो बस फिर रागरंग की बातें होने लगती हैं। वैसे ही रागरंग पर पहिले ही पहरे हुए बल। अंदर ही अंदर राग रंग खूब होने वाले हुए, बाहर खूब पहरा। हर छत से चाँद जो दिखने वाला ठैरा। ये अश्लीलता की बात, नैतिकता की बात तो धर्म के ठेकेदार कहते हैं। अब संस्कृति भी तो शक्ति प्रदर्शन करती है। कट्टरतावाद और अतिवाद दोनों अपने तरीके से तानाशाही को जन्म देते है। नाजी, अमेरिका और रूस उदाहरण हुए। पहिले जमाने में राजा रिलीजियस कल्ट के नाम पर युवतियों के स्तन पर ऊपर कलश से दूध गिरा कर अंजुरी से उसे पीते थे। मुस्लिम शासकों को भी राग रंग वाली होली पसंद आती थी। सूफी मत ने इस्लाम की कट्टरता को कम किया। संयम और भूत्योली, दोनों का रेचन जरूरी है। अब वेलेण्टाइन डे से संस्कृति को खतरा कैसे हो गया ? ये समाज में सामंतवाद की जो घोर अनैतिकता छायी है उसके खिलाफ क्यों नही लड़ते ? औरतें नंगी दौड़ायी जाती हैं तो कोई क्यों नहीं आता ?
किसी ने बताया कि वैलेण्टाइन डे में भी होली की तरह रंग धीरे धीरे चढ़ता है। पहिला दिन रोज डे, दूसरे दिन प्रपोज डे, फिर स्लैप डे, फिर हग डे….. मैंने कहा आखिरी दिन बजरंग डे ! वैसे मनोवैज्ञानिक रूप से यौन कुंठाओं से पीड़ित रहने वाले ही पब आदि का विरोध करते हैं। वैसे पब भी वासना का व्यापार हैं। पर यह विचारों का हरामीपन तालिबानी धंधा ही है। मैं तो बचपन से ही देखता आ रहा हूँ। स्कूल में भगवान के नाम पर देवी देवताओं के नाम पर उल्टे सुल्टे यौन विकृत दोहे प्रचलित थे। इन दोहों ने मेरे अवचतेन पर इतना प्रभाव डाला कि इस उम्र में आने तक मैं अपने अवचेतन में तथाकथित अनैतिक हो गया। बचपन में जब स्कूल पढ़ता था तो कोई सहपाठी कहता कि कोई बुला रहा है। पूछता कौन तो वह एक अश्लील सा इशारा करता और सब लोग हँसने लगते। फिर सब नारा लगाते- होली है। मेरी समझ में नहीं आती यह अश्लीलता। फिर भौचक्का तब हुआ, जब क्रेगलैंड हास्टिल में, जिसमें पिताजी वार्डन थे, लड़कों का जलूस अश्लील गाने गाते, अश्लील नारे लगाते आया और फिर पिताजी से गले मिलने लगा। मैं बहुत उत्साह से गुजिया की थाल लेकर गया तो नशे में धुत एक तगड़े से लड़के ने उस पर हाथ मारा, एक गाली मुझे दी और सारी सामग्री नीचे गिर गयी। मुझे बहुत गुस्सा आया। यह गुस्सा और भय अभी भी मेरे अंदर है। होली मुझे खास कर छरड़ी कतई अच्छी नहीं लगी। यह डर का पर्याय बन गयी। हालाँकि अपने हास्टल जीवन में मैंने भी, सकुचा-सकुचा कर ही सही अश्लील होली गीतों में भाग लिया। छलड़ी के पहिले के गीतों के शब्द बदल कर उन्हें अश्लील बना कर लौंडेमौंडे खूब गाते थे। उन गीतों को न लिखना ही बेहतर है। वरना पहाड़ी तालिबान मेरे नाम का फतवा जारी कर देंगे। यह ज्ञान नयी पीढ़ी को हस्तान्तरित नहीं हुआ। अब तो टी.वी., मोबाइल, वैलेनटाइन, सी.डी., ब्लू फिल्म वह कर डालते हैं साल भर तो होली का यौन रेचन क्या बेचता है ? सैक्स या सैक्सी अब आम शब्द हो गया है। बच्चे के पैदा होने पर यह कहा जा सकता है- बधाई हो बच्चा बड़ा सैक्सी पैदा हुआ है।
होली के त्यौहार मैं मुझे रागदारी ही ठीक लगी। काफी, पीलू जैसे राग तो साल भर अच्छे लगते थे। पर होली के बहाने आने वाला विचार मुझे डराता था। उसका हुल्लड़ मुझे शिवजी की बारात सा और शोहदों के बदतमीजी करने का मौका ज्यादा लगता था। पहिले ये राग भी समझ में ही नहीं आता था कि एक ही मुखड़े को सभी गाते हुए अहसास दिला रहे हैं कि हम बाथरूम सिंगर नहीं है। एक महफिल में गा रहे थे – नथुली में उलझेंगे बाल, बाँके सिपहिया काहे जुल्फें बढ़ायी … सभी ने दुहराते-दुहराते घंटों गुजार दिये पर समस्या का समाधान न हुआ। राजनीतिज्ञों की तरह पहिले समस्या क्रिएट की फिर उसे सुलझाने में लगे। यानी पहिले पर्यावरण खराब करो, ग्लोबल वार्मिग करो फिर सेमीनार का हल्ला। अब जुल्फों और नथुली का क्या सम्बन्ध है, हम उस समय नहीं समझे। समस्या घंटों चली। फिर आलू के गुटकों के साथ समापन हुआ।
उत्तरकाशी के रवाई, जहाँ खुशदिल रौनकीन लोग बसते हैं, में होली होती नहीं थी। वहाँ मछली मारने का त्योहार मौण में लेचूआ कह कर ऐसे ही होली के अश्लील नारे लगते थे। चमोली में आज से 30 साल पहिले होली गायन नहीं छरोली के दिन आग जलती थी फिर उसकी राख को सभी एक दूसरे पर लगाते थे। कभी जूते भी एक दूसरे को मारते थे।
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