वह एक अजीब दृश्य था। चैनल उसे सनसनीखेज बनाना चाहते थे और वह लगातार हास्यास्पद होता चला जा रहा था। एंकर चिल्ला-चिल्ला कर वाहियात सवाल पूछ रहे थे और मौके पर मौजूद रिपोर्टर उनसे भी ज्यादा चिल्लाकर जवाब दे रहे थे। कुल मिला कर चिन्ता नहीं पैदा होती थी, बल्कि हँसी से लोटपोट होने का मन कर रहा था….
वाकया जौली ग्रांट (देहरादून) के हिमालयन अस्पताल में स्वामी रामदेव द्वारा अनशन तोड़ने का था। सारे मीडिया की निगाहें रामदेव पर थीं और थोड़ी ही दूरी पर उसी अस्पताल के एक और कमरे में एक युवा संन्यासी गंगा में खनन बंद करने की माँग को लेकर तिल-तिल कर अपने प्राण त्याग रहा था। उस पर किसी मीडियाकर्मी ने ध्यान नहीं दिया। किसी ने ध्यान दिया भी होगा तो महत्व नहीं दिया। अन्ततः 67 दिन तक आमरण अनशन करने और 48 दिन अस्पताल में कोमा में रहने के बाद 13 जून को 34 वर्षीय निगमानन्द के देहान्त की खबर किसी तरह शाया हो ही गयी तो एक नये तरह का हास्यास्पद युद्ध शुरू हो गया।
दरअसल भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे को बाबा रामदेव ने जिस तरह उठाया, वह बंदर के हाथ में उस्तरा दे देने जैसा बन गया। अपनी अतिशय महत्वाकांक्षा और अण्णा हजारे से पहल छीनने की आपाधापी में रामलीला ग्राउण्ड में अनशन शुरू करते समय स्वामी जी यह भूल गये कि सत्ता कितनी क्रूर और कमीनी होती है। दमन करने के लिये सरकारें किसी भी हद तक जा सकती हैं। एक बार केन्द्र सरकार समझ गई कि रामदेव के बहाने भाजपा अपना खेल खेल रही है, उसका दमन शुरू हो गया। सबसे पहले आधी रात को भोले-भाले योग प्रशिक्षुओं पर सत्ता का कहर टूटा और फिर मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए रामदेव की घेराबंदी शुरू हो गई। घेरने के लिये उसके पास कई तरीके
थे। हजारों तो इस देश में कानून हैं….आय कर, व्यापार कर, नगरपालिकाओं के नियम, स्वास्थ्य विभाग के कानून, पुलिस के कानून, श्रम कानून, सैम्पलिंग के कानून, बिजली वालों के नियम….जो लागू ही नहीं होते। जिम्मेदार विभागों को इनकी जानकारी ही नहीं होती। होती भी हो तो ऊपरी आमदनी और मान-पान जैसे कारणों से उन्हें लागू करने में रुचि नहीं होती। यदि ईमानदारी से ये कानून लागू होने लगें तो एक छोटी सी दुकान भी न चल सके। परचून की दुकान से दो रोटियों का जुगाड़ करने के लिये ही हजार तरह के समझौते करने पड़ते हैं। कई कानून तोड़ने पड़ते हैं और दर्जनों अधिकारियों को संतुष्ट रखना पड़ता है। ऐसे में सिर्फ आठ-दस साल के भीतर करोड़ों का साम्राज्य बना कर स्वामी रामदेव यह दावा करें कि उनकी इस व्यावसायिक यात्रा में काला धन कहीं नहीं है, तो कौन विश्वास
करेगा? एक पल को विश्वास कर लें कि उनका हिसाब-किताब दुरुस्त है, लेकिन उन्हें जिन स्रोतों से पैसा मिला क्या उनमें कालिख नहीं लगी होगी ? टैक्स बचाने की जद्दोजहद में लगे व्यवसायी की जेब से इक्यावन रुपया चन्दा निकालना तक तो रेत से तेल निकालने जैसा हो जाता है! वे करोड़ों रुपये…. यहाँ तक कि स्कॉटलैंड में टापू भेंट कर देने वाले लोग कौन होंगे? तो अब स्वामी जी पर चौतरफा हमले होने लगे हैं। पहली चोट उनके साथी बालकृष्ण के पासपोर्ट को लेकर पड़ ही गई है।
अपने साथ स्वामी रामदेव ने भाजपा की भी किरकिरी करा दी। उत्तराखंड में वर्ष 2002 से 2007 तक काबिज रही कांग्रेस की नारायणदत्त तिवारी सरकार ने स्वामी रामदेव को किस तरह आसमान तक चढ़ाया, इस तथ्य को छुपा कर स्वामी निगमानन्द की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के बहाने कांग्रेस ने भाजपा पर हमले तीखे कर दिये। उसके नेता निगमानन्द की मृत्यु की सी.बी.आई. जाँच और गंगा में खनन बन्द कराने की माँग को लेकर बयानबाजी ही नही, धरना और अनशन तक करने लगे। भाजपा को बच निकलने के लिये एक पतली सी गली तब मिली, जब केन्द्रीय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने गंगा में खनन के मामले पर कुछ कठोर बयान दे दिये।
उनका दृष्टिकोण निश्चित रूप से एक कांग्रेसी का ज्यादा रहा होगा, पर्यावरण को लेकर चिन्तित मंत्री का कम, मगर इसके साथ ही भाजपा की ओर से जयराम रमेश को उत्तराखंड और विकास विरोधी बता कर उनके पुतले जलाने का सिलसिला शुरू हो गया।
राजनीति के मैदान में गत्ते की तलवारें भाँजने का एक और प्रहसन शुरू हो गया है, जहाँ एक पार्टी दूसरी से कह रही है कि मैं तो तुम से कम चोर हूँ…..तुम तो पूरे लुटेरे हो!
प्रहसन इसलिये कि भाजपा, कांग्रेस ही नहीं, सपा-बसपा यहाँ तक कि उत्तराखंड क्रांति दल भी माफियाओं से मुक्त नहीं हैं। देश का कोई भी राजनैतिक नहीं हो सकता। राजनीति चलती ही इन्हीं के द्वारा, इन्हीं के लिये है। खनन का माफिया हो, लीसा-लकड़ी का माफिया हो, शराब का माफिया हो, भूमि को खुर्द-बुर्द करने का माफिया हो, विकास कार्यों की ठेकेदारी का माफिया हो…..इन राजनैतिक दलों के चप्पे-चप्पे पर छाये हैं…..गाँव और ब्लॉक स्तर तक। रेता-बोल्डर खनन की ही बात करें तो उत्तराखंड में शायद ही कोई जगह हो, जहाँ कोई नदी लगभग समतल में बहती हो और वहाँ खनन न होता हो। इसमें कितना वैध है और कितना अवैध, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। ज्यादातर अवैध ही होता है। आये दिन इस अवैध खनन की शिकायतें मिलती हैं या अखबारों में छपी होती हैं, लेकिन कोई कारवाई होने की सूचना नहीं होती। हालाँकि इसी खनन से बरसात में बाढ़ें आती हैं। इन माफियाओं के हौसले इतने बुलन्द होते
हैं कि कहीं मोटर सड़क पर ऊपर से कोई बोल्डर लुढ़क कर आया या बजरी आयी, कुछ ही घण्टों में ट्रक लगा कर साफ कर लिये जाते हैं। ये माफिया स्वयं किसी राजनीतिक दल का बोर्ड लगा कर अभयदान प्राप्त किये रहते हैं और उस राजनैतिक दल को भी पालते-पोसते हैं। उत्तराखंड के दूसरे सबसे बड़े शहर हल्द्वानी का संदर्भ ग्रहण करें तो वहाँ खनन माफिया का एकछत्र साम्राज्य है।
कभी पर्यावरण के नाम पर गौला नदी से रेता-बजरी निकालने पर रोक-टोक हुई तो राजनैतिक दलों के नेता ही नहीं, अखबार भी गला फाड़ कर चिल्लाते हैं। वहाँ किसी भी छोटे-बड़े नेता की कुण्डली बाँच लीजिये, या तो उसके तार खनन माफिया से जुड़े होंगे या फिर भूमाफिया से। अभी कुछ समय पहले तक वहाँ आपस में गैंगवार भी चला। कुछ अपराधियों ने वहाँ से निकल कर देश के स्तर पर ख्याति प्राप्त की। …..तो गंगा के खनन के नाम पर कैसे किसी राजनैतिक दल को बोलने का हक मिल सकता है ?
यह टिप्पणी लिखते समय ही 26 जून को ‘केदारघाटी बचाओ संघर्ष समिति’ से जुड़े रुद्रप्रयाग के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष गंगाधर नौटियाल को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनका अपराध यह है कि वे अपना अस्तित्व बचाने के लिये लड़ रही क्षेत्रीय जनता के साथ मंदाकिनी नदी पर ‘सिंगरौली भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना’ बनाने वाली लार्सन एंड ट्यूबरो कम्पनी की दादागिरी के खिलाफ खड़े हैं। इसी अपराध को लेकर सुशीला भंडारी और जगमोहन झिंक्वाण पिछले दिनों एक माह की जेल काट आये हैं। मंदाकिनी घाटी में हो रहे इस दमन की चिन्ता न तो भाजपा, कांग्रेस, बी.एस.पी. या उत्तराखंड क्रांति दल को होगी और न ही बाबा रामदेव या अण्णा हजारे को। निगमानन्द को, अगर वे जिन्दा होते, तो शायद होती!
….लौट फिर कर बात रामदेव और उस्तरे वाले बन्दर की। रामदेव खुद तो गये अण्णा साहब के लिये भी डगर कठिन कर गये। रामदेव को पटखनी देकर केन्द्र सरकार इस आत्मविश्वास में आ गई होगी कि अब अण्णा हजारे को ठिकाने लगाने के लिये भी ऐसा ही कोई तरीका ढूँढ लिया जाये। कपिल सिब्बल के सिविल सोसाइटी से अब आगे कोई बात न करने वाले बयान ऐसा ही संकेत करते हैं। अड़चन यह है कि अण्णा का दमन अपेक्षाकृत कठिन होगा। इस जद्दोजहद में 36 साल पहले लगाये गये आपातकाल की पुनरावृत्ति करीब आती दिखाई देती है। अन्ततः कॉरपोरेटों का नमक खा रही सरकार करे तो क्या करे ?