श्रावण मास के चलते इन दिनों जागेश्वर घाम में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा है। दूरदराज से हर रोज सैकड़ों लोग परिवार सहित यहाँ आकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
जागेश्वर धाम चंद राजाओं की राजधानी रहे अल्मोड़ा शहर से उत्तर पूर्व में, समुद्र तल से 1,525 मीटर की ऊँचाई पर देवदार, बाँज-बुराँश के सघन वनों के बीच स्थित है। इसका कण-कण प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। यहाँ से हिमालय की हिमाच्छादित हिमशिखरों की एक लम्बी कतार का नयनाभिराम दृश्य दिखाई देता है। मध्ययुग के लवलीश शैवमत का केन्द्र जागेश्वर, देश के पवित्र तीर्थों में से एक माना जाता है। स्थानीय विश्वास यह है कि जागेश्वर या यागेश्वर के नाम से यहाँ जिस लिंग की पूजा होती है, वह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस मंदिर समूह का निर्माण तीन कालों में विभाजित किया जाता है, पूर्व कत्यूरी काल जो ईसा की आठवीं से दसवीं सदी तक रहा, उत्तर कत्यूरी काल जो ईसा की ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी तक तथा चन्द काल जो लगभग पन्द्रहवीं से अठारहवीं सदी तक माना जाता है।
इस विशाल मंदिर समूह में मृत्युंजय का मंदिर सबसे प्राचीन माना जाता है। इसके अलावा जागेश्वर, नवदुर्गा, कालिका, पुष्टिदेवी और बालेश्वर के मंदिरों के साथ कई छोटे मंदिर हैं। ये मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। जागेश्वर का माहात्म्य मानने के कई कारण बताये गए हैं। एक किंवदन्ती है कि शिव शंकर जब जागेश्वर में तपस्या कर रहे थे, तब इसी पहाड़ में निवास करने वाले ऋषियों की पत्नियाँ कुश बीनने यहाँ पहुँचीं। शिव को नग्न रूप में देख कर वे बेहोश हो गयीं। अपनी पत्नियों को लौट कर न आता देख ऋषि उस स्थल पर पहुँचे तो उन्हें शिव पर सन्देह हो गया और उन्होंने शिव को श्राप दे डाला कि उनका लिंग गिर जाये। इस श्राप के बाद जगत में हाहाकार मच गया। बाद में सप्तर्षियों ने शिव की तपस्या की, उससे शिव लिंग यहाँ स्थापित हो गया। दूसरी कथा है कि द्वापर में पांडव जब इस स्थान पर निवास कर रहे थे, तो दुर्योधन के नवीनतम षडयंत्र की जानकारी भगवान शंकर ने यहीं पर पांडवों को जगाकर दी।
पाषाण शैली के विशाल देवालयों को वर्तमान भव्य रूप कत्यूरी व चंद राजाओं ने दिया। 14वीं शताब्दी में यह क्षेत्र मंदिरों का एक समूह था। इस स्थान पर 500 से अधिक ऐतिहासिक मंदिर थे और उन्हें आपस में लोहे की पत्तियों से जोड़ा गया। मुख्य देवालय में गर्भगृह, मंडप एवं छतें लम्बे पत्थरों को तराशकर बनाये गये। इनमें देवी-देवता व पशुओं को बड़ी सुन्दरता से उकेरा गया है। यहाँ जागनाथ, महामृत्युंजय, कुबेर, पुष्टदेवी, नवदुर्गा, कालिका व दंडेश्वर मंदिर स्थित हैं। यहाँ के देवालयों की देख-रेख एवं व्यवस्था चंद राजाओं ने की। आज यह व्यवस्था मंदिर कमेटी करती है। वर्तमान में इसके अध्यक्ष जिलाधिकारी होते हैं। पूजा व्यवस्था का कार्य चंद राजाओं ने भट्ट ब्राह्मणों को सौंपा था, जो आज भी जारी है। कहते हैं कि यहाँ मन माँगी मुराद पूरी होती है। यहाँ भक्त मिट्टी, गोबर आदि के छोटे-छोटे लिंग बनाकर पूजा करते हैं। यह भी मान्यता है कि निःसंतान महिलाओं को यहाँ शिव की पूजा करने पर सन्तान की प्राप्ति होती है। ये महिलायें उत्तर अलकनंदा नदी तथा जटायु नदी के संगम पर स्नान कर सावन माह में प्रत्येक सोमवार को एक हाथ में जलता दीपक लिये, एक पैर पर खड़ी होकर मनोकामना पूरी करती हैं।