मुख्यमंत्री जी आए हैं। जनता दरबार लगाये हैं। आये हैं राजन। एक-एक को बुलाये हैं। फरियादियों से भरा है आंगन, समस्याओं से भरे जन के मन। आधुनिक राजा से मुखातिब है जनता। आशाओं से लबालब है- के पत्त अब के हो ही जायेगा मामला आरपार। मिलेगा शुभ समाचार। वैसे, हर बार होती है जनता हताश, फिर उसकी आशाओं का होता है गर्भपात, फिर वह कुछ समय बाद आशा से गाभिन होती है। गाय जो हुई…। लेकिन सुना है कि मुख्यमंत्री जी दबंग हैं, आनन-फानन में निर्णय लेते हैं। चलो यह भी देख लें…सा भाव। चकाचक सब सजा है। हर कोई मुस्तैद दिख रहा है। मित्र पुलिस तैनात है। हर फूल आबाद है। पंडाल बड़ा सजा है। नौकरशाह ताजा दिखा है। कुछ होगा हो अबके!
कोई बीमार, कोई अपाहिज, कोई सरकार का मारा, कोई समस्या का। हर एक की एप्लिकेशन गेट से बाहर जमा होती है और कार्ड मिलता है। एक-एक करके सबका नंबर आयेगा। मैं भी फरियादी नंबर 1/8 सुबह नौ बजे से आया हूं। कुर्सी पर जमा हूं आगे। पहली बार भी जब जनरल साहब आए थे, तब भी था। ऐसी रेलमपेल हुई कि जनरल साहब से मिलना मुश्किल था। किसी दबंग ने मुझे घसीटते हुए जनरल के सामने खड़ा कर ही दिया था। उनका स्टाइल था कि हर कोई उनके सामने से मेटल डिटेक्टर सा गुजरता था। एक सेकंड में फैसला ऐसे सुनाते थे, जैसे डॉक्टर बीमारी की गाथा गाने से पहिले ही पर्ची में दवाई लिख देता है। यहाँ सुना दूसरा सिस्टम है। सब की सुनवाई होगी, हर एक सीट पर बैठा रहेगा। नाम पुकारा जायेगा। फरियादी को कॉर्डलेस माइक दिया जायेगा और फिर दूर से वह अपनी समस्या कहेगा।
मेरी बगल वाला पीड़ित बोयल से पैदल चल कर आया है। उसका नंबर 1 है। वह गर्व से मुझे अपना रजिस्ट्रेशन दिखलाता है। दूसरा बगल वाला मुस्कराकर कहता है एक नंबरिया ? सब हंसते हैं। तनाव के इन क्षणों में जनता हल्के-फुल्के मजाक कर ही लेती है।
तभी हूटर बजाते मंत्री जी आते हैं, पूरे खादी से लकदक। साथ में मंत्रीगण, एमएलए, पार्टी अध्यक्ष भी। वीआईपीज की भरमार है। जिस एसडीएम-डीएम से मिलना भारी पड़ता है, वह काले सूट में घूम रहे हैं। इस समय वे कुछ लग ही नहीं रहे हैं। लोकतंत्र का कमाल ? एक जनप्रतिनिधि आइएएस-आइपीएस से बहुत भारी है। बस चुनाव जीतने का गुरुमंत्र आना चाहिए। निशंक आते हैं पूरी तेजी से। फास्ट चलना नेता के दम को दिखाता है। जवाहरलाल तेज चलते थे। माओत्से तुंग अस्सी साल में पूरा तालाब तैरते दिखाए जाते थे। नेता को ऊर्जा से भरा दिखना चाहिए। मुख्यमंत्री जी पूरे अभिनय से विराजमान हैं। उन पर भाजपा को तारने का बड़ा भार है, जिसे जनरल साहब ने बिठा दिया था। गांव वाले जनरल साहब के लिए कहते थे- वां लै जुंगे जुंग रैग्यान। नये निशंक जी से जनता कुछ आश्वस्त दिखती है।
शिकायतों का पिटारा खुलता है। एक माइक फरियादी के पास होता है और एक अधिकारी के पास। आमने-सामने फैसला होता है। निशंक जी एक घायल को तुरंत बीस हजार स्वीकृत करते हैं। तालियाँ…. लगता है राजा दमदार है। फिर एक महिला आती है। उसे विधवा पेंशन नहीं मिली है। क्यों नहीं मिली ? अफसर से जवाब-तलब। फिर एक शिकायत उसके गाँव में पाँच साल से बिजली गायब है। अफसर से कहा जाता है क्यों नहीं ? वह तकनीकी प्रॉब्लम बतलाते हैं। निशंक जी कहते हैं- इनके वहां बिजली कब आयेगी ? इंजीनियर कहते हैं तीन महीने में। मंत्री जी कहते हैं- नोट करें आप तीन महीने कहते हैं, मैं आपको पाँच दिन और देता हूँ ठीक है…? स्टाइल बढ़िया है। वह युवापन से ही जन नब्ज और मीडिया को समझते हैं। फरियादी चिल्लाता है- नहीं, यह बाद में कह देंगे बर्फ पड़ गयी, अब नहीं होगा। इस पर मंत्री हँसकर ग्लोबल वार्मिंग की याद दिलाकर कहते हैं- अरे, अब बर्फ कहाँ पड़ती है ? फरियादी भी मुस्कराकर कहता है- नहीं, वहाँ पड़ती है। तभी पानी का मामला आया कि बारह लाख रुपये की योजना थी। योजना पूरी हुई पर पानी नहीं आया। प्रधान कह रहा है। मंत्री जी कह रहे हैं आप प्रधान हैं या प्रधानपति। आदमी हंस कर कहता है -प्रधानपति… उनके इस हास्य पर सब हँसते हैं। मंत्री जी भी हँसते हैं। फिर मंत्री जी फैसले के बाद कहते हैं कि हमारा प्रधान मैडम को नमस्कार कहना, कभी-कभी उनको भी ले आया करो यार….। तभी एक ब्लॉक प्रमुख की समस्या आती है। मुख्यमंत्री जी कहते हैं आप ब्लॉकप्रमुख हैं ? वह कहता है ‘नहीं, ब्लाकप्रमुख पति’ …फिर हँसी। लोगों को मुख्यमंत्री जी की अनुमान कर लेने की शक्ति से आश्चर्य होता है।
फिर एक दल आता है। वह बंदरों-सुअरों से परेशान है। पहाड़ में खेती का कोई मतलब नहीं रह गया, इन सब के कारण। सब खा जाते हैं, बस अदरक छोड़ कर। फिर हँसी आती है- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद. …! एक-एक फैसले में लंबा समय निकल रहा है । मंत्री जी की कड़कदार आवाज अब सिमटने लगी है। इधर, प्रतीक्षातुर जनता घबरा रही है। उसे लगता है नंबर अब गड्डी हो गया है। जिनका नंबर पहले था वे गायब हैं। जिनका ताजा नम्बर है, वे सामने हैं। प्रार्थना पत्र अब हाथोंहाथ भी लिये जा रहे हैं। अफसर इन्हें पहुँचा रहे हैं। एक युवा कहते हैं कि हमें छोलिया महोत्सव का दस लाख नहीं मिला…. हम संस्कृति बचा रहे हैं। सब पार्टी के ही युवा लग रहे हैं। मुख्यमंत्री जी ने बधाई दी कि वह भारतीय संस्कृति को दस लाख में बचा लेंगे। दर्दमंद मुख्यमंत्री के लिए फिर तालियाँ। फिर पानी, सड़क, शिक्षा का उच्चीकरण आदि समस्यायें आती हैं। एक युवा रज्जु मार्ग की मांग करता है। वह कहता है कि वह पार्टी कार्यकर्ता है और वह यह भी चाहता है कि रज्जु मार्ग का उद्घाटन भी माननीय करें। मुख्यमंत्री जी कहते हैं- अरे यार तुम बहुत होशियार हो। एक ही झटके में सारे काम करना चाहते हो ? सब हँसते हैं। राजा न्याय करता दिखता है, और तालियाँ बटोर लेता है। दो बच्चे तालाब में डूब गये हैं, उसके लिए भी राशि की घोषणा हुई। तालियों का स्वर फिर गूँजा। कैंसर पीड़ित एक महिला को भी धनराशि मिली।
तभी एक नमकीन उद्योग वाली महिला आती हैं। वह ढेर सारे नमकीन के पैकेट उपहार देती हैं। तालियाँ बजती है। मंत्री जी हास्य करते हैं- नमकीन का डिपार्टमेंट किसका है ? फिर खुद जवाब देते हैं कि यह तो सबका है। नमकीन तो सब ही खाते हैं। बात ही बात में कहते हैं- इसके अधिकारी कहाँ हैं ? उद्योग विभाग… अफसर कहाँ है ? वह नहीं हैं; मुख्यमंत्री जी तुरंत डीएम से कहते हैं – सस्पेंड… तत्काल प्रभाव से। सस्पेंड करने के मामले में उनकी चर्चा खूब है। जनता कहती है- यह है न्याय. …तालियाँ….। मुख्यमंत्री महोदय खूब तालियां बटोरते हैं। जनता वैसे भी भावुक होती है। बड़े आदमी की ऐसी अदा उसे गद्गद् कर देती है। और भी समस्याओं का बहुत समझदारी से मुख्यमंत्री हल निकालते हैं। एक स्थायी फरियादी महिला भी आती है। उसे फीलपांव है, जिसका इलाज नहीं है। वह कई बार इस तरह के आयोजनों में आती रहती है। लोग कहते हैं उसे अब तक एक लाख रुपया मिल चुका है। अब वह आंख भी नहीं देखती है। वह भिड़ भी जाती है। उससे सब डरते हैं… बस डरते भर हैं। वह कहती है- कहाँ है मंत्री, उसके पास मुझे ले चलो। यह सब ठगते हैं कुछ नहीं करते…। सब उसके कथन पर हँसते हैं। कुछ पुलिस वाले उसे समझाते दिखते हैं और कुछ उसे जाने देते हैं।
जनता अब सावधान हो चुकी है। फिर भी वह शालीनता से पुलिस प्रशासन के घेरे में चुप है। हर मामले को मुख्यमंत्री जी इतने डिटेल में ले रहे हैं कि जनता को शक होने लगा है कि उनकी बात सुन ही ली जायेगी। अचानक मुख्यमंत्री उठते हैं और माइक में कहते हैं सारी एप्लिकेशन रजिस्टर्ड हो चुकी हैं। चिंता न करें, सब का निर्णय होगा। वह मंच से उठ जाते हैं। सब उनकी तरफ बढ़ते हैं। कमांडो, पुलिस उन्हें घेरे में लेती है। जनता को धकियाते हुए पुलिस मुख्यमंत्री को सुरक्षित विश्राम गृह के अंदर के गर्भ गृह में ले जाती है। सुबह से तपस्या करते या दो दिन पहले से मीलों चल कर आये लोग निराश होकर हल्ला मचाते हैं। मंत्री जी ने छांट-छांट कर कुछ लोगों को सुना, बाकी भुस्स ? सुनना नहीं था तो दरबार लगाकर हमें ठगा क्यों ? अधिकारी आश्वासन दे रहे हैं कि अभी माननीय जी विश्राम कर रहे हैं। सबकी सुनी जायेगी। अभी पार्टी की मीटिंग हो रही है। कुछ पुराने भुक्तभोगी समझ जाते हैं यह बोतियाया जा रहा है। राजा जहाज में फुर्र होने वाला है। भीड़ में, मैं भी चिल्लाता हूं न्याय न्याय… पुलिस वाले मीडिया असंतुष्टों की ओर बढ़ते हैं। उन्हें समझाते हैं। मेरे चिल्लाने को भी मीडिया अपनी बाइट बनाती है। फिर मुझे लगता है फीलपांव वाली महिला की तरह मुझे भी पचा दिया गया है। वह कह रहे हैं- अभी आपको मिलवा देंगे आपका काम करवा देंगे…।
पुलिस वाले समझा रहे हैं कि अभी आयेंगे माननीय धैर्य… मित्र पुलिस अब टैक्ट समझ गई है। वह मधुरवाणी से समझाती है….। उन्होंने नैनी सैनी हवाई पट्टी का विरोध करती महिलाओं को रोका। महिलायें कह रही थीं- हमें ठगा गया। कहा था तुम्हारी जमीन लेंगे तो परिवार से एक को नौकरी देंगे। एक बौद्धिक बोले – दरबार करना है तो एक दिन रुको, टाईम दो। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से सीखो, बाकायदा सबको कोड नंबर दें… ये क्या कि आप स्पॉट में ही छाँट रहे हैं ऐप्लिकेशन।
माननीय जी निकले। हूटर बजा। जनता ने कारें गिनीं…. एक दो तीन…. तीस। एक कह रहे हैं- और अबके भी पिथौरागढ़ को मिला ठेंगा। एक कह रहा है- पिथौरागढ़ वाले आखिर डोटियाल ही हुए, अल्मोड़ा को देखो। वहाँ जब लेने का मामला होता है, तो क्रांग्रेस भाजपा एक हो जाते हैं (यह सोरवालों का खास डॉयलाग है जिसे वह निराशा में समय-समय पर उच्चारित करते हैं)। एक कहते हैं- अब हवाईजहाज उतरेगा नैनीसैनी में, 75 सीटर। चीन बार्डर होगा सुरक्षित। निशंक जी भी निकल लिये, जनरल की तरह. ..। एक पूछता है यह पिठौरागढ़ के लिए निशंक हैं या सशंक !
यहां कुछ भी नहीं दे गये। सामने लगा बैनर- ’माननीय निशंक जी का पिठौरागढ़ की जनता स्वागत करती है’ झूल गया है सशंकित होकर। लोकतंत्र हवा हो गया है। सब अधिकारी कर्मचारी चैन की सांस ले रहे हैं। काली पोशाक में जमते प्रशासनिक अधिकारी अपना रंग छिपाते गाड़ियों में अपने निवास को निकल चुके हैं। बोयल वाला वह गरीब लंगड़ाते-लंगड़ाते किसी सस्ते होटल की तलाश में है। देबसिंह फील्ड के मंच से आ रहे फिल्मी गानों और लोकगीतों के मिले जुले स्वर…. बबली तेरो मोबाइल … जुबाँ पर लागा नमक तेरे इश्क का… !

























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