प्रस्तुति : अनिल जोशी
वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं गांधीवादी जयदत्त वैला का 4 जनवरी 2010 को रानीखेत में स्वर्गवास हो गया। अगले दिने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अन्त्येष्टि की गयी। 93 वर्षीय श्री वैला गत छः माह से अस्वस्थ थे।
1917 में रानीखेत के रिखाड़ गाँव में जन्मे जयदत्त वैला की प्रारम्भिक शिक्षा पाली के स्कूल में हुई। नैनीताल के चेतराम साह स्कूल से मैट्रिक कर के वे बनारस चले गये, जहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. कर अर्थशास्त्र में एम.ए. करने लगे। इसी बीच वे राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आये तथा छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। उनकी सरकार विरोधी गतिविधियों के चलते उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। कालान्तर में उन्होंने बरेली कॉलेज से वकालत की डिग्री ली।
1939 में जयदत्त रानीखेत लौट आये तथा ताड़ीखेत स्थित प्रेम विद्यालय में अध्यापक बन गये, जहाँ उन्हें हरगोविन्द पन्त तथा देवकीनन्दन पाण्डे सरीखे संग्रामियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। प्रेम विद्यालय गांधीवादी विचारों से ओतप्रोत एक ऐसी संस्था थी, जहाँ विद्यार्थियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण के अतिरिक्त देशप्रेम की दीक्षा दी जाती थी। यहाँ वे कौमी सेवा दल के सदस्य रहे तथा नायक प्रथा उन्मूलन सम्बन्धी आन्दोलन में भी सक्रिय योगदान दिया। 29 से 30 अक्टूबर 1939 को रानीखेत-द्वाराहाट मार्ग पर स्थित कफड़ा के उभ्याड़ी मैदान पर कांग्रेस का एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें देश के नामचीन नेताओं ने भाग लिया। पूरा मैदान तम्बुओं के एक शहर में तब्दील हो गया, जिसका नाम चंद वंश के राजा आनन्द सिंह की पत्नी विमलेन्दु कुमारी के नाम पर विमलानगर रखा गया। इस पूरे आयोजन की कमान युवा जयदत्त वैला तथा रामसिंह बिष्ट ने सम्भाली। द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर जयदत्त को बागेश्वर भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने प्रेम विद्यालय की एक शाखा खोली। इसमें जनता को उनके व्यापार से सम्बन्धित उद्योग जैसे कताई, रंगाई व बुनाई के प्रशिक्षण के साथ गुप्त रूप से देशप्रेम का पाठ भी पढ़ाया जाता था।
ऐसे में ब्रिटिश प्रशासन की वक्र दृष्टि पड़ना स्वाभाविक था। 1940 में डी.आई.आर. के अन्तर्गत जयदत्त को राजद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में चक्की चलाने से इन्कार करने पर बदायूँ जेल स्थानांतरित कर दिया गया। यहाँ भी उनका विरोध जारी रहा, जिसके फलस्वरूप कुछ दिन ‘तनहाई’ में रखने के बाद चुनार की कैम्प जेल में रखा गया। जेल की यातनाओं से मुक्त होकर वे वापस प्रेम विद्यालय आ गये। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ होने पर ताड़ीखेत स्थित गोलज्यू के मंदिर में एक विशाल सभा हुई और अगले ही दिन क्षेत्र के सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार हो गये। उनकी अनुपस्थिति में आन्दोलन की कमान जयदत्त के हाथ में रही। धरना, प्रदर्शन, शराब भट्टी की पिेकेटिंग कर पहले अल्मोड़ा फिर बरेली जेल भेज दिया गया। तीन साल तक कारावास की यातना के बाद 1945 में उन्हें मुक्ति मिली।
स्वाधीनता के उपरान्त जयदत्त वैला ने कुछ समय नैनीताल तथा बाद में रानीखेत में वकालत प्रारम्भ कर दी। साथ ही इलाके के तमाम राजनैतिक व सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे। वे सच्चे अर्थों में गांधीवादी थे। शांत, मृदुभाषी, सदैव खद्दर धारण करने वाले, झूठ व लालच से कोसों दूर। उन्हीं के अनुसार दीवानी मुकदमों में वे सदैव गरीबों की ही पैरवी करते रहे। कभी किसी पद व सम्मान के मोहताज नहीं रहे। शायद इसीलिये कभी उनको पद्मश्री या उत्तराखंड रत्न जैसी उपाधियों के लायक नहीं समझा गया। आधी शताब्दी से भी अधिक समय तक क्षेत्र के अग्रणी वकील होने के बावजूद अपने लिये एक मकान तक नहीं बना पाये और आजीवन किराये के एक जीर्ण-क्षीण मकान में रहे। पत्नी व ज्येष्ठ पुत्र की असामयिक मृत्यु को भी उन्होंने साहस व धीरता के साथ झेल लिया। पिछले साल तक वे तिमुर की लाठी लिये सदर बाजार में देखे जा सकते थे। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि राजनीति के वर्तमान परिदृश्य, विशेषकर कांग्रेस की संस्कृति में गिरावट से वह कितना खिन्न व निराश थे। उनका निधन एक अपूरणीय क्षति है।
नैनीताल समाचार परिवार की श्रद्धांजलि।

























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