उत्तराखण्ड राज्य के सपने के विपरीत 12 वर्षों के भीतर उत्तराखण्ड पूरी तरह माफिया नियंत्रित राज्य बन गया है। ये माफिया कानून की कोई परवाह नहीं करते और सरकार व प्रशासन इनके राजनीतिक संरक्षण के कारण मौन बने रहते हैं।
उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक राजधानी और राजनैतिक रूप से अत्यन्त सचेत माना जाने वाला अल्मोड़ा शहर भी राज्य बनने के बाद चेतनाशून्य हो गया है। इसका एक बड़ा उदाहरण तब मिला, जब वन संरक्षक ने संरक्षित प्रजाति के बहुमूल्य पेड़ काट दिये और यहाँ के प्रबुद्ध लोगों की जुबान पर ताला पड़ा रहा। आये दिन शहर में देवदार के पेड़ खुल्लमखुल्ला कट रहे हैं और लोग तमाशा देख रहे हैं।
इधर एक नई प्रवृत्ति शुरू हुई है। सही या गलत तरीकों से आठ-दस वर्षों के भीतर ही करोड़पति बन गये लोग अपने भवनों का निर्माण करने के लिये शहर के भीतर धड़ल्ले से जेसीबी व पोकलैंड जैसी भारी भरकम मशीनों का उपयोग कर रहे हैं। अभी-अभी धारानौला स्टेशन के पास शराब व्यवसायी आनन्द सिंह बिष्ट ने अपना आलीशान भवन बनाने के लिये इन मशीनों का जम कर उपयोग किया, जिससे 27 जून को 6 मकान धराशायी हो गये तथा अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मुख्य मोटर सड़क में 50 मीटर तक जबर्दस्त दरार आने से यह एक फिट नीचे धँस गई। मगर आम आदमी को छोटी-छोटी बात पर नोटिस देकर परेशान करते रहते वाले जिला प्रशासन, नगर पालिका व सार्वजनिक निर्माण विभाग चुप्पी साधे बैठे रहे। मीडिया में भी मकान ढहने तथा सड़क धँसने के वास्तविक कारणों को छिपाने की कोशिश की गई। अभी बरसात की शुरूआत है। 2010 की जैसी तेज वर्षा की पुनरावृत्ति हुई तो धारानौला क्षेत्र में बड़ी दुर्घटना की सम्भावना बन जायेगी। तब शायद जान-माल की क्षति को मानवकृत अपराध न मान कर प्राकृतिक आपदा बता दिया जायेगा और दोषियों को बचा लिया जायेगा। पीडि़तों को कुछ खैरात बाँट दी जायेगी और आपदा राहत के नाम पर आने वाली भारी भरकम धनराशि की लूट शुरू हो जायेगी।
18 सितम्बर 2010 की भयंकर वर्षा में इसी शहर के पास 23 लोग काल कवलित हुए थे। कुमाऊँ की लाइफलाईन के रूप में जाना जाने वाला भवाली-खैरना मार्ग में तो आज तक कामचलाऊ ढंग से यातायात चल रहा है। लेकिन सरकार ने इन हादसों से सीख नहीं ली। आज हर बड़ा ठेकेदार जेसीबी, पोकलैंड और बुलडोजर जैसी बड़ी मशीनें ले आ रहा हैं। इन मशीनों के उपयोग से मजदूरी के रूप में दी जाने वाली काफी राशि बचती है और कई गुना आर्थिक लाभ होता है। परन्तु इनसे पहाड़ खोखले हो जाते हैं। जैसे कुछ वर्ष पूर्व तक डाइनामाईट पहाड़ों के काल बने हुए थे, अब ये मशीनें बन गई हैं। जब से इन मशीनों का प्रयोग बढ़ा है, तब से हादसे ही बढ़े हैं और आये दिन सड़कें बंद होने के समाचार मिलते हैं। इन मशीनों को चलाने के क्या नियम हैं और उनका पालन भी होता है अथवा नहीं, इस पर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। मगर यदि इन मशीनों का प्रयोग अनियंत्रित रूप से होता रहा तो ये पहाड़ को मलबे के ढेर में परिवर्तित कर देंगे, इसमें सन्देह नहीं।
याद रहे 18 अगस्त 2010 में बागेश्वर जनपद के सुमगड़ में 18 बच्चे स्कूल में दफन हो गये थे। उस दुर्घटना का कारण पास में बन रही जल विद्युत परियोजना की सुरंग थी। नैनीताल जनपद में पहाड़पानी के पास एक सम्पन्न व्यक्ति द्वारा अपने भवन बनाने के लिए जेसीबी चलवाई, जिससे बगल का मकान ढह गया और एक दलित परिवार के 5 लोग दफन हो गये थे। इस दुर्घटना में प्रयुक्त जेसीबी अब तक नहीं पकड़ी गई है और न किसी अपराधी को सजा हुई है। माफिया इस प्रदेश में इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि न्याय की उम्मीद करना ही व्यर्थ है।
jcb machino se he to hamara kaam aasan hota hi nahi to 1 sadak banane me 50 saal lag jate hi
bikash ke liye adhunik machine he istemal karna chahie.