उत्तराखंड के राज्य बनने के नौ वर्षों में यहाँ की बहुप्रचारित संपदा जल, जंगल,जमीन को लूटा-खसोटा ही गया है। पूरे देश में लोकतंत्र का यदि सबसे भद्दा स्वरूप देखना हो तो उसके लिए उत्तराखंड उपयुक्त रहेगा। लोकतंत्र के चारों स्तम्भों ने यहाँ अनूठी नजीर प्रस्तुत की है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को चैतन्य और समाज का दिक्दर्शक माना जाता रहा है। परन्तु यहाँ इस मीडिया ने इस राज्य की आबरू ही उतार फेंकी है। ‘जोश ! सच का‘, ‘पत्र ही नहीं मित्र भी‘ जैसी लोकलुभावन पंच लाइनों के साथ यह मीडिया जो कुछ परोस रहा है, उसे स्वीकार करना उत्तराखंडवासियों की विवशता है।
अभी-अभी एक अखबार ने नव वर्ष के दूसरे दिन, शनिवार को अपने नियमित अंक के साथ 16 पेज की एक मैगजीन ‘शख्सियत‘ नाम से बागेश्वर जनपद में बाँटी है (ये अखबार बागेश्वर में जो पढ़ाते हैं, वह अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ या अन्य जिलों में नहीं होता)। 16 पेज के इस प्रचार पत्र में धन कमाने के लिये अनचाही सामग्री पाठकों को परोसी गयी है। मैगजीन के मुखपृष्ठ पर योग, सिनेमा और खेल जगत के चार राष्ट्रीय- अर्न्तराष्ट्रीय शख्सियतों के चित्र साया हैं तो अंदर के पृष्ठों में पैसे लेकर बागेश्वर जनपद के 19 लोगों को सचित्र-वृतान्त के साथ मील का पत्थर (माइल स्टोन्स) घोषित किया है, यह जानते हुए भी कि इन लोगों के कोई कृत्य ऐसे नहीं हैं, जिनसे इनकी विशिष्टता झलकती हो। ये लोग खुद भी शर्मिन्दगी महसूस कर रहे होंगे कि हमें इतना महिमामंडित कर दिया गया है। (‘मील का पत्थर’ घोषित होने वाले एक साहब हैरत में थे कि यह सब क्या है ? एक पत्रकार को फोन कर उन्होंने बताया कि मुझसे तो मेरी शिक्षा, जन्म स्थान आदि के बारे में विस्तार से पूछा तो मैंने बता दिया और अब ये लोग तो कह रहे हैं कि ये तो विज्ञापन है, पैसा लाओ….!!)
काले-पीले धंधों की बदौलत राजनैतिक तिकड़म भिड़ाकर अपने को समाज में सम्माननीय बना बैठे इन लोगों से बेहतर बागेश्वर के सामाजिक जनजीवन में उल्लेखनीय स्थान रखने वाले लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है। ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अल्प साधनों और विपरीत परिस्थितियों में न केवल खुद को स्थापित किया, अपितु बुनियादी शिक्षा, कृषि, बागवानी, परम्परागत रीति रिवाजों, स्थानीय कौशल के विकास और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कर्म किया है। परन्तु ये वास्तविक मील के पत्थर इन अखबारों में इसलिए स्थान नहीं पाते कि इनके पास विज्ञापन रूपी चढ़ावा नहीं होता।
बागेश्वर के चैतन्य मीडिया में पसरी मुर्दानगी के चलते यहाँ जनसरोकारों की फिलवक्त कोई चर्चा होती नहीं नजर आती। अन्यथा खड़िया खोदने वाले माफिया और देशी-विदेशी अनुदान लेने वाले एन.जी.ओ. इस तरह के ‘शॉर्ट कट’ से समाज के सम्मानीय नहीं बन पाते। मगर यह भी सच है कि वैध-अवैध तरीके से जोड़ी गयी अकूत संपदा समाज में झूठा मान तो दे सकती है, पर अपनी ही आने वाली पीढ़ियों को संस्कार नहीं….। इन कुसंस्कारों को पालने का काम हमारा मीडिया कर रहा है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।