बाईस साल तक अग्निपरीक्षा से गुजरने के बाद अन्ततः अल्मोड़ा के पत्रकार प्रकाश चन्द्र पंत कंचन की मानिन्द निखर कर सामने आये। मई 1988 में उन्होंने अपने समाचार पत्र ‘अल्मोड़ा टाइम्स’ में ‘एक रहस्य जानें सभी’ तथा ‘हे ईश्वर तूने तो देखा होगा’ शीर्षक से दो रपटें प्रकाशित कीं। ये रपटें राजकीय बालिका निकेतन अल्मोड़ा में एक नाबालिग संवासिनी माया की अवैध बच्ची पैदा होने के बारे में थीं। इस प्रकाशन के बाद जिला विकास कार्यालय की लिपिक आनन्दी पांडे ने उन पर फौजदारी का मानहानि का मुकदमा कर दिया। 18 मई 1995 को दिये गये मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अल्मोड़ा के निर्णय, जिसे अपील में जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने भी बरकरार रखा, में प्रकाश चन्द्र पंत को एक वर्ष की साधारण कैद तथा पचास रुपया जुर्माने की सजा सुनाई गई। पन्त अपील में वर्ष 1998 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गये। अन्ततः 28 अप्रेल 2010 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चन्द्र पंत की एकल पीठ ने उन्हें दोषमुक्त किया।
प्रकाश चन्द्र पंत पर पत्रकारिता को लेकर चले मुकदमों का यह पहला उदाहरण नहीं है। इसके अतिरिक्त भी ‘अल्मोड़ा टाइम्स’ पर अब तक 7 ऐसे मुकदमे चल चुके हैं। दरअसल छोटे अखबारों को हड़का ले जाना निहित स्वार्थो के लिये आसान होता है। ‘ताकि सच जिन्दा रहे’ का उद्घोष करने वाले दैनिक ऐसी भंडाफोड़ करने वाली खबरों से प्रायः परहेज करते हैं, क्योंकि इससे उनके विज्ञापन के व्यापार, जो उनकी प्राणवायु है, पर असर पड़ता है। ऐसा भी नहीं कि सारे छोटे अखबार दूध के धुले होते हैं। बहुत सारे अखबार तो सिर्फ ब्लैकमेलिंग के लिये ही प्रकाशित होते हैं। राज्य बनने के बाद देहरादून से कुछ ऐसी चमक-दमक वाली पत्रिकायें प्रकाशित होने लगी हैं, जिनका काम पहले आक्रामक अंदाज में भंडाफोड़ करना और फिर आतंकित हुए भ्रष्ट अधिकारियों को दुहना मात्र है। देहरादून-हरिद्वार से ढेर सारे ऐसे ‘मत्थाबदल’ अखबार प्रकाशित होने लगे हैं, जिनका काम सूचना विभाग से मिलीभगत से सिर्फ विज्ञापन खाना होता है। ऐसे अखबारों पर रोक लगाने का कोई तरीका सूचना निदेशालय के अधिकारी अब तक नहीं ढूँढ पाये हैं। मगर प्रकाश चन्द्र पंत ऐसे पत्रकार हैं, जो गलत आचरण करने पर अपने हमपेशा पत्रकारों पर वार करने से भी नहीं चूकते।
इस खबर को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा| आशा है की कुछ लोग इस खबर से सिख लेंगे | सच हमेशा जिन्दा रहता है और झूठ के पांव नहीं होते है |
इतनी लम्बी न्याय प्रक्रिया फिर भी डरा ही देती है।