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त्तराखंड राज्य के गठन से पूर्व ही सितंबर 1997 में बागेश्वर जिले की स्थापना हो गई थी। तब से जिले का विकास मंथर गति तथा अनियोजित रूप से हो रहा है। राज्य बनने के बाद आशा की एक किरण दिखाई दी थी, लेकिन सत्ता का सुख भोग रहे नेताओं ने जिले की सुध नहीं ली। वैसे धन की कोई कमी भी नहीं रही। विकास कार्यों के पीछे कोई वैज्ञानिक सोच नहीं रहा। उदाहरण के लिये अगस्त तथा सितंबर माह में हुई अतिवृष्टि ने साबित किया कि कलेक्ट्रेट भवनों में बुनियादी खामी है। कलेक्ट्रेट के ठीक सामने बने सरकारी आवास रातोंरात खाली कराए गए। जानकार बताते हैं कि यहाँ की भूमि कभी भी खिसक सकती है। दूसरी तरफ भुरचुनियाधार में बने जिला न्यायालय के भवनों से आज भी मजियाखेत के लोगों के घरों में मलबा घुस रहा है। लोग हर बारिश में नाली निर्माण आदि के लिए चिल्लाते रहते हैं। विकास भवन भी सुरक्षित स्थान पर नहीं है। न्यू कलेक्ट्रेट का मलबा कभी भी उसे लील सकता है। सरयू का कटाव भी विकास भवन के लिए खतरा है।
जिले में सड़कों की स्थिति खासी खराब है। राष्ट्रीय राजमार्ग गरुड़-कौसानी, बागेश्वर-ताकुला बेहाल है। गरुड़ मार्ग में पाँच साल पहले एक मंत्री के बेटे द्वारा किये गये हॉटमिक्स की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए, मगर हुआ कुछ नहीं। मार्ग आज भी नाजुक है। ताकुला मोटर मार्ग पिछले चार सालों से अभी निर्माणाधीन ही है। बिलौना से बागेश्वर की ओर का सड़क का हिस्सा दुर्घटनाओं को न्यौता दे रहा है। 60 के दशक में ग्रामीणों द्वारा श्रमदान से बनाये गये सुप्रसिद्ध पिंडारी ग्लेशियर मोटर मार्ग के चौड़ीकरण के लिये आज तक कुछ नहीं हो सका है। वर्ष 2010 में कई दुर्घटनाएँ घटित होने के बावजूद कपकोट क्षेत्र की सड़कों की स्थिति जस की तस बनी है। कांडा, धपोलासेरा आदि मोटर मार्गं भी खराब हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाले मार्ग कैसे होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है।
जल संस्थान, जल निगम द्वारा करोड़ों रुपये हर साल बर्बाद करने के बावजूद लोग पीने के पानी के लिये जंग कर रहे हैं। राज्य बनने के दस साल बाद भी खरेही के 61 गाँवों के लिए पेयजल की कोई योजना नहीं बन सकी है। सरयू में बनी पंपिंग योजना जाड़ों में भी ग्रामीणों को सप्ताह में मात्र एक दिन पानी की आपूर्ति कर रही है। स्वजल के तहत जिले में बन रही अधिकतर योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं। 2001 की जनसंख्या पाँच हजार के अनुरूप बागेश्वर में बनी योजनायें अब बीस हजार पार हो चुकी जनसंख्या के लिये अपर्याप्त हैं। बारहों 12 महीने पानी की किल्लत बनी रहती है।
अपराध में जिला जरूर आगे दौड़ लगा रहा है। हत्या, लूट, अश्लील एमएमएस, दुराचार, चोरी आदि मामलों में इन दस सालों में इजाफा हुआ है। रोजगार न होने से पलायन अभी जारी है। 1971 में स्थापित झिरौली मैग्नेसाइट में एक हजार लोग काम पर लगे। लेकिन इधर इस उद्योग को भी झटका लगा है और सौ के करीब ही लोग काम पर बचे हैं। उन्हें भी वेतन के लिए महीनों का इंतजार करना पड़ता है। राज्य बनने के बाद जिले में किसी भी प्रकार का कोई उद्योग नहीं लगा। अलबत्ता खड़िया खानों की भरमार हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार वर्तमान में 41 खड़िया खानें पंजीकृत हैं। दर्जन भर नई खानों को अनुमति मिलने की उम्मीद है। इस खड़िया खनन और प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना के चलते बागेश्वर का विनाश निश्चित है। इस बात को भूवैज्ञानिक भी मानते हैं, लेकिन माफियाओं के हाथ बहुत लंबे हैं। नाकुरी तथा कांडा-कमस्यार घाटी में इन दस सालों में हुए अंधाधुंध खनन से यहाँ की घाटियाँ कब खिसक जाएँ, पता नहीं। सुमगढ़ में 18 बच्चों की अकालमृत्यु जल विद्युत परियोजनाओं की हकीकत बयाँ करती है। प्रकृति ने अपनी तरह से लोगों को चेतावनी दे ही दी है।
जिले में चार डिग्री कालेज हैं। कपकोट, कांडा तथा गरुड़ के डिग्री कॉलेजों में प्राध्यापकों का भारी टोटा है। एकल प्राध्यापक के सहारे ही यह चल रहे हैं। भवनों का निर्माण न होने से कपकोट, कांडा के कॉलेज इंटर कालेज के भवनों तथा गरुड़ के प्राथमिक विद्यालय में चल रहे हैं। आईटीआई कांडा, एससीएसटी आईटीआई कमेड़ी में स्टाफ का रोना है। पौलीटेक्निक गरुड़ के भवनों को अभी इंतजार है। स्वास्थ्य को देखें तो जिला अस्पताल रैफर सेंटर की भूमिका दस साल पूर्व भी निभा रहा था अब भी निभा रहा है। डॉक्टरों का लंबा टोटा है। अल्ट्रासाउंड मशीन चलाने वाला तक नहीं है। जाँचें बाहर से हो रही हैं। बैजनाथ, कपकोट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा अनेक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरविहीन हैं। पिंडारी ग्लेशियर के अंतिम पड़ाव खाती के अस्पताल में दस सालों से कोई डॉक्टर नहीं आया। राज्य बनने से पहले यहाँ जरूर डाक्टर था। करोड़ों रुपये से अस्पताल भवनों का निर्माण तो हो गया, लेकिन डाक्टरों का टोटा होने से चौकीदारों ने इन्हें अपना घर बना लिया है। होम्योपैथी तथा आयुर्वेदिक अस्पतालों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है।
अलबत्ता राज्य बनने के बाद लोगों के हक-हकूकों पर जरूर कब्जा हुआ है। जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले ग्रामीण राज्य आंदोलनकारियों को कोस रहे हैं। वन विभाग ग्रामीणों को उनकी भूमि से भी पेड़ काटने की अनुमति नहीं दे रहा है। भ्रष्ट कर्मचारी इसके लिये मोटी रकम वसूलने से गुरेज नहीं करते। तस्करों की जरूर पौ बारह हो रही है। वन विभाग की साँठगाँठ से तमाम प्रजातियों के पेड़ काटे जा रहे हैं। गौचर, पनघट पर वन पंचायतों के बनने से ग्रामीण खासे आहत हैं। उनके पशुओं के लिए चारे का इंतजाम नहीं हो पा रहा है। इन दस सालों में लोगों ने पशुपालन कम दिया है और ग्रामीण रोजगार कम हुआ है। दूध का उत्पादन गिर गया है। राज्य बनने से पूर्व जिले में जो दुग्ध संघ था उसका अब अल्मोड़ा जिले में विलय हो गया है।
राज्य बनने से पहले से चली आ रही मुख्यालय पर रोडवेज डिपो; नाकुरी को तहसील तथा ब्लॉक का दर्जा; टनकपुर-बागेश्वर रेल मार्ग का निर्माण; कपकोट, कांडा में गैस गोदाम; नगर क्षेत्र के विस्तार के लिए लिंक मोटर मार्ग; बेस अस्पताल, सीवर लाइन, कपकोट तथा गरुड़ में नगरपालिकाओं का निर्माण, मैग्नेसाइट को खड़िया लीज तथा चूना फैक्ट्री लगाने की अनुमति देने; तहसीलों में फायर बिग्रेड की तैनाती; राजस्व क्षेत्रों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए पुलिस चौकी; नए पर्यटन स्थलों की खोज तथा पर्यटन स्थलों को हाईटेक सुविधा से जोड़ने; साहसिक पर्यटन, खेल मैदानों का निर्माण, कपकोट में हैलीपैड निर्माण आदि प्रमुख माँगों पर आने वाले सालों में भी लोग आन्दोलित होते रहेंगे।
पीयूसीएल के प्रदेश उपाध्यक्ष एनबी भट्ट तथा ग्रामीण महिला उत्थान समिति के संस्थापक बिशन सिंह टंगड़िया आदि सामाजिक कार्यकर्ता जनपद की उपेक्षा के लिये भाजपा तथा कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हैं।