‘कलचुण्डी चिड़िया’ गढ़वाली लोकबोली के अनुसार ‘दीन रात नहेण धुएण कर दी छौ-कर दी, छौ, सब्या बोदीं काली छै, काली छै, काली छै।’ की धुन पर आधारित यह गीत उत्तराखण्ड राज्य व गैरसैंण राजधानी के लिये शहीद हुए साथियों की कल्पना को साकार करने हेतु समर्पित है – ![]()
दीन रात एकि बात बोल्दि छौं, टक्क लगैक सूंणा धौं,
गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, राजधानी गैरसैंण।
हिंस्वली, किलमोड़ी, काफल जख
बेड़ु का बि झुण्टा जख
उच्चा निस्सा डांडा जख
गदन कू घुघराट जख
पुरैयलीं शितगा साल, ढंग से कारा देख भाल
जनकैकि हमल रैंण, हमल रैंण, हमल रैंण
सक्या धाणीं गैरसैंण।
दीन रात …
सब्बि जिलों क बीच मा, सब्बि दिलों क बीच मा
सुद्ध हवा का बीच मा, सुद्ध पाणी क बीच मा
कीचड़ की किचकिच ना, भू माफिया की चिकचिक ना
अपण जनम भूमि जनि राजधानी हूणि चैन्द
सूणा सब्बि भाई बैंण, गैरसैंण-गैरसैंण-गैरसैंण, राजधानी गैरसैंण -
मरी गैन कदगा लोग, ऊका छाया कन यो जोग
जनम भूमि क वास्ता, जौन कब्बि सुख नि भोग
स्वींण ऊंकू कौरि सच, आस ऊंकि कुई नि बच
कलचुण्डी चखुली बोल्दी, मन मा हमर यो गीत द्योल्दी
चुप हमल बि अब नि रैंण, अब नि रैंण, अब नि रैंण – मेरि प्राणी गैरसैंण।
- धरमवीर परमार
भावार्थ: ध्यान लगाके सुनो, दिन रात एक ही बात बोलती है कि राजधानी गैरसैंण…गैरसैंण…गैरसैंण। हिसालू-किलमोड़ी-काफल व बेडू के झुरमुट के बीच, ऊँचे-नीचे पहाड़ों के बीच जहाँ नदियों की आवाज सुनाई देती है। राज्य बने इतने साल हो गये हैं। ठीक से इसकी देखभाल करो। ऐसी राजधानी गैरसैंण में बनाओ जो हमारे रहने लायक हो।
सभी जिलों के बीच में, हम सबके दिल में, शुद्ध हवा-पानी के बीच जहाँ न कीचड़ की किच-किच है और न भू माफियाओं का डर है। अपनी जन्म भूमि के बीच राजधानी गैरसैंण ही होनी चाहिये। यह उनका धन्य भाग है जो राज्य के लिये शहीद हो गये। उन्होंने जन्म भूमि के लिये कभी सुख नहीं भोगा। उनके सपनों को साकार करो, ताकि उनकी कोई आस बची न रहे। कलचुण्डी चिड़िया ने हमारे मन में यह गीत घोल दिया है कि मेरे प्राण गैरसैंण में हैं इसलिये अब चुप नहीं रहना है।
फोटो : राजीव रावत