तहसील धारचूला की चौदांस पट्टी रं संस्कृति के लिये जानी जाती है। चीन और नेपाल के सीमांत पर बसा चौदांस क्षेत्र अपनी विषम भौगोलिक परिस्थितियों और अपनी विविध व बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत के लिये जाना जाता है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग के मध्य पड़ने वाला यह भाग मुख्यतः सोसा, सिर्धांग, पांगू, हिमखोला, जयकोट, रुंग, लुमखेड़ा, कुरीला, मड़बारसो, छलमाछिलासो, पुलनाभक्ता, सामरी, कुरीला, बंग्पा, जयकोट, शानखोला, गिप्ती, तानकुल आदि गाँवों से बना है। विषम भौगोलिक परिस्थिति के बावजूद रं संस्कृति के लोग अपनी लोक संस्कृति और सामाजिक सद्भाव के लिये विख्यात हैं। ये लोग हर 12 वर्ष में कंग्डाली नामक त्यौहार मनाते हैं।
इस वर्ष 4 अक्टूबर से 11 अक्टूबर के मध्य कंग्डाली पर्व मनाया गया। जिस प्रकार नवरात्रि को देश भर में बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, उसी तरह काली व धौली नदियों के मध्य में बसे चौंदांस क्षेत्र में बुराई का प्रतीक मानी जाने वाली कंग्डाली वनस्पति को नष्ट किया जाता है। इसी के साथ आने वाले 12 वर्षों के लिये संभावित सभी संकटों से मुक्त होना माना जाता है। महाकुम्भ की तर्ज पर 12 वर्षों बाद मनाये जाने वाले कंग्डाली महोत्सव के लिये देश सहित विदेशों में रहने वाले चौदासी लोग मय परिवार के घर आते हैं और धूमधाम के साथ इस पर्व में शामिल होते हैं। चौंदांस के सभी गाँवों में इसकी खूब तैयारी की जाती है।
कंग्डाली, जिसका वानस्पतिक नाम स्ट्रोबिर्लेथस वाल्लीची है, उच्च मध्य हिमालयी भूभाग में पाया जाने वाला एक पुष्पीय पौधा है। इस पौधे में अगस्त से अक्टूबर के मध्य फूल खिलते हैं। इस पौधे को इस क्षेत्र के लिये अभिशप्त मानते हुए सामूहिक रूप से नष्ट किया जाता है। कंग्डाली महोत्सव एक विजय पर्व है। युद्ध की पोशाकों से सजे चौंदांसवासी विविध वाद्यों से निकली ध्वनि में एक विशेष प्रकार का विजय नृत्य करते हैं। उत्सव का आरंभ जौ एवं मेथी के आटे से बने एक शिवलिंग की पूजा से होता है। प्रत्येक परिवार यह पूजा करता है, जो अंत में एक समुदाय में परिवर्तित हो जाता है। परंपरागत परिधानों, गहनों व युद्ध की पोशाकों में स्त्री-पुरुष प्रत्येक गाँव के एक निर्धारित घर के आँगन में इकठ्ठा होकर एक ध्वज फहराते हैं। इस दौरान अनाज द्वारा बनाई गई स्थानीय शराब का भी प्रयोग किया जाता है। एक व्यक्ति ध्वज अपने हाथ में लेकर आगे बढ़ता है। ध्वजवाहक के पीछे एक जलूस बन जाता है, जो विभिन्न वाद्यों की धुन में युद्ध नृत्य करते हुए निर्धारित स्थान की ओर बढ़ते हैं। महिलायें इसका नेतृत्व करती हैं। प्रत्येक के हाथ में करील होता है, जो दरी बनाने का एक उपकरण होता है तथा इससे वे खिले पौधों पर जोर से आक्रमण करती हैं। उनके पीछे तलवारों से लैस बच्चे व पुरुष रहते हैं। ये लोग कंग्डाली पौधे की ओर बढ़ते हैं। विजय नृत्य तथा झाड़ी के उखड़ जाने के बाद यह लोग गाँव में एक जगह एकत्र होते हैं। सामूहिक भोज होता है और देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ यह उत्सव समाप्त होता है। प्रत्येक गाँव में लगभग इसी प्रकार यह उत्सव मनाया जाता है।
इस पर्व को मनाये जाने के पीछे कई किंवदन्तियाँ हैं। एक कथा के अनुसार यह उत्सव उन महिलाओं की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने 1841 में लद्दाख से जोरावर सिंह के आक्रमण होने पर जोरावर की सेना को तब पीछे धकेल दिया था जब गाँव के पुरुष व्यापार के लिये बाहर गये थे। उन महिलाओं ने उन कंग्डाली की झाडि़यों का समूल नाश कर दिया, जिसके पीछे शत्रु छिपे थे, जो पीछे हट गये।
कुछ लोगों के अनुसार अतीत में इस क्षेत्र में रहने वाली महिला का इकलौता बारह वर्षीय पुत्र बीमार पड़ गया, जिसका उपचार स्थानीय जड़ी-बूटी से करने पर वह स्वस्थ होने लगा। इसी क्रम में जब कंग्डाली के पौधे को भी औषधि के रूप में दिया गया तो लड़के की मौत हो गई। इससे खिन्न होकर महिला ने अपने घर के पास उगे कंग्डाली के सभी पौधों को नष्ट कर श्राप दिया कि जिस प्रकार बारहवें वर्ष में उसका पुत्र छिन गया है, उसी तरह बारहवें वर्ष में तेरा भी नाश हो। तभी से बारहवें वर्ष में कंग्डाली पर्व का आयोजन कर उसके पौधों को नष्ट किया जाता है।
कंग्डाली उत्सव के पीछे एक बालक की किंवदन्ती है कि उसने अपने फोड़े पर कंग्डाली जड़ी की जड़ का लेप लगाया और वह मर गया। क्रोधित होकर उसकी माँ ने जड़ी को शापित कर दिया तथा रं महिलाओं को आदेश दिया कि वे कंग्डाली के पौधों को उखाड़ फेंके, जब वह पूर्ण रूप से खिला हो, जो 12 वर्ष में एक बार होता है।
कहानी कुछ भी हो, लेकिन यह पर्व उन सभी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक बहुत अच्छा माध्यम है, जो उस क्षेत्र के हैं लेकिन अब बाहर रह रहे हैं।