28 अगस्त को उधमसिंह नगर के सितारगंज में काँवड़ियों की पुलिस से मारपीट एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इसका निहितार्थ तो यह है कि यदि किसी समूह के पास राजनैतिक संरक्षण है तो वह पुलिस से भी मोर्चा ले सकता है। दो वर्ष पूर्व कालाढूँगी कांड में भी यह प्रवृत्ति दिखाई दी थी। पक्ष-विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों के नेता मारे गये ब्लॉक प्रमुख के घर संवेदना व्यक्त करने जा रहे थे और पुलिस का मनोबल जमीन पर औंधे मुँह गिरा था। लगभग ऐसा ही इस ताजी घटना में हो रहा है। काँवड़ियों से पिटने के बाद भी पुलिस उनसे डरी हुई है। ऐसा नहीं कि वह काँवड़ियों के खिलाफ कोई कार्रवाही करना नहीं चाहती। लेकिन वह कर नहीं सकती, क्योंकि सरकार एक ऐसी विचारधारा से संचालित है, जो काँवड़ियों को प्रोत्साहित करती है। दरअसल काँवड़ियों का यह भस्मासुर उस आत्मघाती विचारधारा की स्वाभाविक परिणति है, जो भारतीय जनता पार्टी के मूल में है। दस-बारह वर्ष पूर्व कब सावन आया, कब गया, कब काँवड़िये गंगाजल लेकर लौटे यह पता भी नहीं चलता था। इस बीच उनकी संख्या बीसियों गुना बढ़ गई है। क्या हमारे समाज में उसी अनुपात में नैतिकता भी बढ़ी ? या सिर्फ गुण्डागर्दी बढ़ी है ? ये काँवड़िये हिन्दू धर्म के नाम पर सारी सड़कें बन्द कर दें, लूटपाट करें, उन्हें पूरी छूट है। पुलिस-प्रशासन मन मार कर बैठा रहता है। अब हर अधिकारी ने तय कर लिया है कि चुपचाप से नौकरी बचा लो, इसी में भलाई है। मगर इससे कानून-व्यवस्था की दिक्कतें कितनी बढ़ गई हैं और भविष्य में कितनी अराजकता फैल जायेगी, इस बात की चिन्ता एक विषैली विचारधारा के आधार पर सरकार चलाने वालों को नहीं है।