अब देवभूमि में भी शिक्षा मिशन न रह कर एक प्रोफेशन है। दुर्गम क्षेत्र में तैनाती होते ही अध्यापकों द्वारा अपनी या परिवार में किसी और की गंभीर बीमारी का हवाला देकर मैदानी इलाकों में वापिस पहुँचने की तिकड़म शुरू हो जाती है। मेडिकल ग्राउंड पर देहरादून या अन्य मैदानी इलाको में स्थानान्तरण की गुहार लगाते हजारों प्रार्थना पत्रों को देख एहसास होता है मानो पूरा शिक्षा विभाग ही बीमार पड़ गया हो। ऐसे हालातों में एक शिक्षक को याद कर शायद कुछ राहत मिले, जिसने उत्तराखण्ड की सुदूर वादियों में भारत-तिब्बत सीमा से सटी नीती घाटी की नई पीढ़ी को शिक्षित होने के लिये प्रेरित किया। यह शिक्षा क्रान्ति सन् 1962 में भारत-तिब्बत सीमा सील हो जाने के बाद अचानक बेरोजगार हो गये घाटीवासियों के पुनः अपने पैरों पर मजबूती से खड़े होने में मील का पत्थर साबित हुई।
पौड़ी जिले में द्वारीखाल विकास खण्ड के डंगला गाँव के केदारदत्त कुकरेती सन 1954 में गमशाली में खुले नीती घाटी के पहले जूनियर हाई स्कूल के प्रधानाचार्य बने। उस समय जिला चमोली भी पौड़ी जिले का ही एक हिस्सा था और पीपलकोटी में आखिरी बस अड्डे से 150 किमी. का पैदल सफर तय कर गमशाली गाँव पहुँचा जाता था। नीती घाटी की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से भारत-तिब्बत व्यापार पर निर्भर थी और घाटी का लगभग हर परिवार इससे जुड़ा था। यहाँ के बाशिंदे भेड़पालन के साथ घोड़े-खच्चरों पर माल लाद कर भारत-तिब्बत बॉर्डर से उत्तराखण्ड की विभिन्न मंडियों तक पहुँचाने के लिये महीनों तक पैदल सफर करते थे। इस सफर में बच्चे भी शामिल होते थे, ताकि इस व्यापार का हर गुर बचपन में ही सीख लें। ऐसे में केदारदत्त जी का घाटी में घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने का आग्रह जल्दी किसी के भी गले नहीं उतरा, क्योंकि इसका सीधा-सीधा अर्थ था, अगली पीढ़ी का यह व्यापार छोड़ कर एक नई दिशा में कदम रखना, जिसके लिये ये लोग मानसिक तौर पर कतई तैयार न थे।
कुकरेती जी के एक छात्र, जगत सिंह पाल, जो कि ट्रेजरी विभाग में एडिशनल ड़ायरेक्टर के पद से रिटायर हुए, बताते हैं कि गुरुजी भारत तिब्बत सीमा तक भी बच्चों को लेने पहुँच जाते थे। उनका यह जज़्बा जल्दी ही रंग लाया, जब 1957 में आठवीं की बोर्ड परीक्षा में पहले बैच के एक छात्र ने तो पूरे गढ़वाल में सर्वोच्च अंक प्राप्त किये। परीक्षाओं के दौरान अपने कमरे के बगल में बच्चों के लिये कमरे किराये पर लेकर दिन-रात उन्हें पढ़ाना उनके छात्रों को आज भी याद है। नीती घाटी में उनका कार्यकाल 1960 तक रहा। इस दौरान के अधिकांश छात्र ऊँचे पदो पर आसीन रहे और घाटी में तिब्बत से व्यापार बंद होने से मायूस लोगों के लिये शिक्षा ही पुनः स्थापन का एकमात्र लेकिन प्रभावी सहारा बना। कुछ अस्वस्थता के कारण डीआईओएस के पद से उन्होंने स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले लिया, लेकिन गाँव वापिस लौट कर भी बच्चों को शिक्षित करने की उनकी मुहिम जारी रही, जिसका श्रेय वहाँ के क्षेत्रवासी आज भी उन्हें ही देते है। शिक्षा के संचार को समर्पित केदारदत्त जी विवाह के बंधन से भी मुक्त रहे और 70 वर्ष की आयु में सन् 1997 में आपने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।