मुनस्यारी क्षेत्र में बाँज की तरह ही खमिया प्रजाति का एक जंगल है। इसका वानस्पतिक नाम एसर लेविगेटम है। खमिया की दो प्रजातियाँ मिलती हैं। काले रंग की पत्तियों वाली प्रजाति मवेशियों के चारे के रूप में काम में आती है। दूसरी प्रजाति के पत्ते सफेद होते हैं। खमिया का पेड़ खजूर जैसा हरा, लंबा-चौड़ा होता है। इसकी बड़ी-बड़ी टहनियाँ होती हैं। इन्हें बड़ा खमिया व छोटा खमिया के नाम से भी जाना जाता है। बड़े खमिया की पत्तियाँ बड़ी व हाथ के आकार की होती हैं। इसका बाहर का हिस्सा हरा होता है, जिसमें छोटे-छोटे बालनुमा उभार होते हैं व बाहर का हिस्सा हरे रंग का होता है। छोटे खमिया की पत्तियाँ छोटी, पतली व चमकदार होती हैं। उचित संरक्षण के अभाव में खमिया के इस जंगल का अस्तित्व खतरे में है।
विकासखंड मुनस्यारी में सैरणाथी के चुथेरी व थाला में स्थित यह जंगल 15 साल पहले तक घने रूप में था। चारा, इमारती लकड़ी व तस्करी के चलते यह अब उजाड़ पर है। काली प्रजाति के खमिया का चारे के लिए अवैध दोहन हुआ वहीं सफेद पत्ते वाले खमिया की गाँठें उसके विनाश का कारण बनीं। वन्य जीवों के अंगों और जड़ी-बूटियों के तस्करों की गिद्ध दृष्टि खमिया पर टिकी हुई है। एक समय इन गाँठों को काटने का व्यापार जम कर हुआ। बाद में स्थानीय संगठन ‘उत्तराखंड जागरण मंच’ द्वारा आवाज उठाने के बाद इसमें थोड़ी रोक लगी।
अवैध व्यापार करने वाले सफेद खमिया की गाँठों को तराया कर कटोरेनुमा बर्तन का रूप देते हैं, जिसे ‘दोबा’ नाम से जाना जाता है। इन कटोरों में माँग के अनुसार चाँदी या किसी अन्य धातु को मढ़ा जाता है, जिससे इनका आकर्षण बढ़ जाता है। नेपाल और चीन में इसकी भारी माँग है। बताया जाता है कि नेपाल में दोबा का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है और ऐसे एक काष्ठ बर्तन की कीमत पाँच सौ रुपये से ऊपर चली जाती है। चाँदी मढ़े दोबा की कीमत तो 20 हजार रुपए तक होती है। लड़की की शादी में दहेज के रूप में भी दोबा दिया जाता है। इस माँग की पूर्ति की खातिर मुनस्यारी के जंगलों में खमिया का दोहन हो रहा है। गाँठ निकालने के छः माह बाद ही यह वृक्ष सूख जाता है। ‘उत्तराखंड जागरण मंच’ के सक्रिय कार्यकर्ता गंभीर सिंह मेहता कहते हैं कि यदि दोबा के दोहन पर कड़ाई से रोक नहीं लगाई गई तो यह प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। वन विभाग के बेरीनाग प्रभाग में तैनात एसडीओ मनोहर सिंह सीमिया खमिया के लगातार खत्म होने का कारण नई पौध का न आ पाना बताते हैं। वे कहते हैं कि यह कच्ची प्रजाति का पौधा होता है इसकी आयु 100 साल के आसपास होती है। इसकी लकड़ी कच्ची होती है। आग लगना भी इसके विनाश की एक बड़ी वजह रही है।