मैं सुबह एक अर्द्धस्वप्न से उठा कि मैं गिरदा से कह रहा हूं -आप को श्रद्धांजलि देने के लिए क्या शब्द प्रयोग किया जाय। वाकई अगर मैंने उनसे पूछा होता तो वह पहाड़ी स्टाइल में ऊकड़ूँ बैठ कर बीड़ी का एक लम्बा कश खींचते और उस कश के धुँए. को आसमान में टेढ़ा-मेढ़ा जाते देखते और बहुत देर बाद वापस आ कर कहते -खिराज-ए-अकीदत कैसा रहेगा…..? यही उनका स्टाइल था। जब भी मैं कोई बात पूछता तो वह ऐसा ही करते जैसे आसमान में सब खो गया है और वहाँ से कोई शब्द या दर्शन ला रहे हों। और फिर बहुत देर बाद उस स्थिति से वापस आ करके कहते – प्रभात! अब इस पर चर्चा फिर कभी करेंगे…। बहुत गहन विषय हुआ…यह…।
अब मेरा तो उनसे बहुत सम्बन्ध रहा नहीं बस छुटपुट मुलाकातें होती रहती थीं। हाँ ! मेरे पिता, उम्र का इतना फर्क होने के बावजूद भी, उनके अभिन्न मित्र थे। मेरे पिताजी मुझसे कम ही वार्ता करते थे। यदा-कदा ही वह अपने दार्शनिक अंतरंग की पिटारी खोलते थे। पर गिरदा के वे फैन थे और उनके बारे में बहुत बतलाते थे। उन पर उन्होंने एक फीचर भी लिखा था। उनके लिए गिरदा बहुत से उपन्यासों विशेष कर गोर्की के करैक्टर थे। वह कहते- तुम कभी उनकी कोठरी में गये ? कहीं कोई खिड़की नहीं। चारों ओर सीलन….। उनका है कभी खा लिया, कभी नही….एक नेपाली भी साथ रहते हैं…. चारपाई भी जीर्ण-क्षीण है और कभी-कभी सीलन भरी कोठरी के फर्श पर ही सोये मिलते हैं और आवाज…..कविता की समझ खूब…..सुरों को ऐसे चुनते हैं जैसे चाय बागान में कोई महिला अपनी कंडी में पत्तियों को चुनती होगी….. और भी बहुत बताया था, वो याद नहीं। मेरे विवाह के कार्ड में प्रतिक्षातुर में उन्होंने एक नाम गिरदा का भी लिखा था। गिरदा इस अपनत्व से बहुत खुश थे।
मुझे उनकी जिंदगी में नाटक हावी लगता था। उनके कविता पाठ में भी अभिनय पक्ष उभर कर आता था। उनके मस्त शरीर को टीवी में देख कर उनकी शांत मुद्रा देख मुझे लगा जैसे मरने का नाटक कर मंद-मंद हँस रहे हों। क्या खूब ! बंदा जी गया जिंदगी को पूरे इत्मीनान सेे…!
एक बार वह श्रीनगर आये। उस समय सफदर हाशमी भी मेरे साथ महाविद्यालय में अध्यापक था। गिरदा मुझसे बात कर रहे थे तो सफदर भी उनसे टकरा गया। वह मुझे छोड़ कर उससे बतियाने लग गये। उन्हें आदमी के महत्व, गुण की बहुत समझ थी। और फिर उनमें जबर्दस्त बहस लोकजीवन पर हो गयी और यह चलता रहा। दोनों कह रहे थे एक दूसरे से- मैं समझ रहा हूँ तो दूसरा भी कह रहा है….नहीं-नहीं आप कहते रहिए मैं समझ रहा हूँ। घंटों उन्होंने किसी बात पर सर खपाया और मेरा सर पकाया।
मेरा विवाह हो रहा था। भवाली के डाक बंगले में पुलिस वाले बैंड बजा रहे थे। मैं और सफदर बाहर खड़े गपशप मार रहे थे। फरवरी की शाम थी। तभी झाड़ी में हलचल हुई और ओवरकोट पहिने एक आकृति उभरी। वह गिरदा ही थे। वह बैंड वालों को सशंकित और घबरायी नजर से देख कर बोले- पुलिस मेरे पीछे पड़ी है। मैं बहुत मुश्किल से बचते-बचाते तुम्हें बधाई देने आया हूँ….। फिर उन्होंने पूरी सावधानी से चारों ओर देखा और झाड़ी में ही गायब हो गये। मैं कृतार्थ हुआ। सफदर उनकी अदा पर हँस कर बोला -वाह…..! उस समय नैनीताल क्लब कांड हुआ था।
एक बार वह गोपेश्वर आये। उस समय हमारे मित्र शैलेन्द्र प्रताप सिंह वहाँ एसपी थे । वह सांस्कृतिक सामाजिक कार्यो में रुचि रखते थे। उनका और नरेन्द्र नेगी जी का आना जान कर उन्होंने कवि सम्मेलन रखवा दिया। मैंने उनसे कहा था कि कवि सम्मेलन के बाद घर खाना खाने आयेंगे और वहीं रहेंगे। कवि सम्मेलन जो हुआ सो हुआ, पर बाद में उनको अंगूर की बेटी पुलिस वालों की मौजूदगी में लूट ले गयी। उन्होंने क्यों आना था ? फिर कुछ दिनों बाद उनका पोस्टकार्ड आया कि प्रभात नहीं आ पाया, अफसोस है। फिर कभी जोरदार ढंग से मिलेंगे। पर वह जोरदार दिन कभी नहीं आया।
उन्होंने अपनी इच्छाओं को जम कर जिया। दारू हो या लजीज खाना या कोई सुर, सुरधारी….. फैज का यह दीवाना सब पर टूटता था।
एक दिन शेखर, मैं और गिरदा नैनीताल समाचार में थे। मेरे बहाने वर्जित पदार्थ खाना चाहते थे। उन्होंने कहा- प्रभात के लिए चाय मगाओ। शेखर ने कहा वह नहीं पीते। फिर कहा कुछ और मंगाओ…. समोसा। मैंने कहा- समोसा मैं नहीं खाता। वह दुःखी हो गये। फिर बोले- अरे तो क्या करते हो ? क्यों हो इस दुनिया में ? अच्छा शेखर ! बंद मगाओ मक्खन वाला….। फिर मैंने वह सूचना दी जो इंटरनैट में भी उपलब्ध नहीं होती। कहा हमारे जमाने में खस्ता भी होता था बंद का भाई….तो बोले -हाँ, होता था। फिर बहस छिड़ी- बंद खस्ते में क्या अंतर होता है। फिर कहा -अरे पहिले पफ भी तो होता था…..। वह हर वस्तु को चखना चाहते थे। वह हवा से लेकर गीतों को खाना चाहते थे, मुझे ऐसा लगता था। यही उनका अंदाजे जिंदगी था। अगर मरने की भी बात आती तो उन्हें यह रास नहीं आता कि वह ऐसे मरें कि सब बैठ कर रोयें। शायद वह ग़ालिब की तरह कहते-
चलिए अब ऐसी जगह चल कर
जहां कोई न हो
हमसखुन कोई न हो,
हम जुबां कोई न हो
…एक बेदरोदीवार सा घर बनाया चाहिए
और गर मर जाइये तो नौरव्वां कोई न हो
जब दिल्ली में उनके प्रेम पिरम से हमारा परिवार मिला तो इस शांत, मोहिले, समझदार और गुणी को अनुभूत कर लगा था गिरदा का यह आत्मज कितना परमानन्द है। गिरदा ही रख सकते हैं किसी के सही व्यक्तित्व का इतना अंतरंग नाम।
उनकी मौत पर दुआयें, ईश्वर से प्रार्थना भी हुई होंगी। आत्मा के लिए दो मिनट का मौन भी हुआ होगा। पर वह होते तो शायद कहते-
दुआ तो सभी करते हैं, दुआ से कुछ हुआ भी हो
बंदे दुनिया में अनगिनत, कोई खुदा भी हो।
अभी मैंने जब हेम पांडे पर नैनीताल समाचार में लेख लिखा था कि उनका पहली बार फोन आया। बोले- प्रभात बहुत अच्छा लिखा तुमने। और वह तो बहुत ही गजब था- ….अगर मेरे पास हेम की कोई फोटो होती तो उस कविता के कैलेंडर पर उसकी फोटो भी चस्पाँ कर देता जिसमें लिखा था- जो सच बोलेंगे वह मारे जायेंगे। फिर बोले हल्द्वानी आउँगा तो जरूर तुम से मिलने की कोंशिश करूँगा। तुम से बहुत बात करनी है….। पर हमेशा की तरह वह बहुत बातें हो नहीं पायीं ।
16 अगस्त को मैं नैनीताल आया था तो दूर से मल्लीताल में रिक्शा स्टेंड के पास उन्हें किसी चुटियाधारी युवक के साथ बतियाते देखा था। पर मैं मिला नहीं। सोचा कि ऐसे क्या मिलना, जम के मिलूँगा। अब के मन बनाया था उनका साक्षात्कार अपने ढंग से लूँ, खूब अन्तरंग बातें करूँ….। पर फिर जम के बारिश हुई और जा नहीं पाया।
मौत को तो उन्होंने वैसे ही निमंत्रित बहुत पहिले कर लिया था। वह नहीं रहे। वैसे होने से क्या होता है, कहते हैं-
अगर है तो होने का हक पैदा कर ।
गिरदा ने अपने होने का हक तो पैदा ही किया। जीवित लोग, लोक जीवन के इस महान लोकगीत को गुनगुनाते रहेंगे।
और क्या कहना ठैरा फिर -
फकीराना आये सदा कर चले, मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले….।
कहैं क्या जो पूछे कोई हमसे मीर, जहाँ में तुम आये थे क्या कर चले….।
“girdaa”.man nahee bharataa. unhein jaanane samajhne kee cheshthaa badhti jaatee hai.