22 जून को अल्मोड़ा में सम्पन्न हुआ कुमाऊँ विश्वविद्यालय का दशम दीक्षान्त समारोह एक तरह से ‘चिपको आन्दोलन’ को समर्पित रहा। समारोह की मुख्य अतिथि जहाँ प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ वंदना शिवा थीं, वहीं चंडी प्रसाद भट्ट को डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। ध्यान रहे कि अस्सी के दशक में ‘चिपको’ आन्दोलन में कुमाऊँ विश्वविद्यालय परिसर अल्मोड़ा के छात्रों की अहम भूमिका रही थी। सुप्रसिद्ध साहित्यकार हिमांशु जोशी व मृणाल पाण्डे को भी इस अवसर पर मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया।
डॉ. वन्दना शिवा का दीक्षान्त भाषण का केन्द्र चिपको आन्दोलन का प्रभाव, दुनियाँ का बदलता मौसम व विकसित राष्ट्रों द्वारा तीसरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर केन्द्रित रहा। वन्दना ने कहा कि ‘चिपको’ की तरह ‘नदी बचाओ आन्दोलन’ को भी सुनियोजित ढंग से चलाने की आवश्यकता है। यदि हम गंगा को नहीं बचा पाये तो देश की संस्कृति को क्या बचा पायेंगे ? विकसित राष्ट्रों की जो वस्तु कूड़ा हो गई है, उसे भारत जैसे देश में बेचा जा रहा है। भोपाल गैस काण्ड जैसा हादसा अमेरिका में हुआ होता तो सौ गुना से अधिक मुआवजा पीड़ितों को मिला होता। मैक्सिको की खाड़ी में जो तेल का रिसाव हुआ है, उसमें अमेरिका ने खरबों रुपये मुआवजे की माँग की है, जबकि वहाँ एक भी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई है। उन्होंनं कहा कि विश्वविद्यालय की शिक्षा की तरह समाज की शिक्षा भी जरूरी है। समाज को जानना है तो गाँवों में जाना होगा, अन्यथा शिक्षा किताबी रह जायेगी। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा की जा रही हमारे जल, जंगल, जमीन की लूट का प्रतिरोध तभी संभव है जब हम वास्तविक रूप मे शिक्षित बनें।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् चण्डीप्रसाद भट्ट ने अपने वक्तव्य में अल्मोड़ा के साथ विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, ऐनी बेसेन्ट, पण्डित नेहरू, उदयशंकर, चित्रकार ब्रूस्टर जैसे महापुरुषों की स्मृतियों को जोड़ते हुए आठवें दशक में अल्मोड़ा परिसर में अध्ययनरत् उन तमाम विद्याथिर्यों को याद किया जो ‘चिपको’ आन्दोलन में उनके सहयोगी रहे और जिन्होंने सन् 1976 में वृक्षारोपण कर कटारमल की नंगी, वृक्षविहीन पहाड़ी को हरा-भरा बनाया। उन्होंने कहा कि हिमालय के जल, जंगल और जमीन के अंधाधुंध दोहन से हिमालय और हिमालयवासियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया है। यह याद रखना चाहिये कि गंगा-यमुना के मैदान का संकट पूरे देश का संकट है। साहित्यकार हिमांशु जोशी ने कहा कि भारत की नई पीढ़ी दुनिया में सबसे प्रतिभावान है, लेकिन उसे आगे लाने के लिए पर्याप्त क्षिातिज उपलब्ध कराना होगा। श्रीमती मृणाल पाण्डे को उनकी अनुपस्थिति में ही मानद उपाधि दी गई।
अपने अध्यक्षीय भाषण में राज्यपाल व कुमाऊँ विवि की कुलाधिपति मारग्रेट अल्वा ने कहा कि विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता शिक्षकों व छात्रों से बनती है। दुर्भाग्य है कि आज शिक्षा संस्थायें इसलिए खोली जा रही हैं कि उससे धन अर्जित किया जाये। उत्तराखण्ड चूँकि ‘चिपको’ का केन्द्र है, इसलिए आशा की जाती है कि यहाँ से पूरे विश्व को व्यावहारिक शिक्षा मिलेगी। कार्यक्रम में कुलाधिपति द्वारा 13,596 छात्र-छात्राओं को उपाधियाँ प्रदान की गईं। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्राते. बी. पी. अरोड़ा ने सभी का आभार प्रकट किया।

























Down memory lane to 1974,when Shambhu Dajyu, Shri Shekhar Pathak and many more started campaign for Seprate Kumoun University and got it.