अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अराजक कार्यकर्ताओं द्वारा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन में की गयी तोड़फोड़ के बाद अनिश्चित काल के लिए बंद कुमाऊँ विश्वविद्यालय खुल तो गया पर इस घटना से विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई सबक लिया हो ऐसा नहीं लगता। बाहर से सबकुछ सामान्य दिख रहे विश्वविद्यालय का अन्दरूनी माहौल बिलकुल सामान्य नहीं है। चाटुकारों से घिरे कुलपति के व्यवहार से खिन्न कर्मचारियों व अध्यापकों के बीच कामकाज का सौहार्दपूर्ण माहौल अभी तक नहीं बन पाया है। जब विश्वविद्यालय का मुखिया ही तमाम सवालों से घिरा हो, तब बाहरी अराजक तत्वों को सजा मिल पायेगी, यह उम्मीद करना बेवकूफी है।
लेकिन छात्र हितों की आड़ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने 4 अगस्त को कुलपति का घेराव करने के बहाने प्रशासनिक परिसर में जो तोड़फोड़ की उसकी सजा तो ऐसे अराजक व गुण्डा तत्वों को मिलनी ही चाहिये। यह बात दीगर है कि प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि अपने आनुषंगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बिगड़ैल कार्यकर्ताओं को सजा दे। यह इसी से जाहिर है कि जब इस संगठन के कार्यकर्ता तोड़फोड़ कर रहे थे तब वहाँ मौजूद प्रशासन और भारी पुलिस फोर्स मूक दर्शक बने बैठे थे। पुलिस ने खानापूर्ति के लिए जब लाठियाँ ठकठकायीं, तब तक पूरा नुकसान हो चुका था। प्रदर्शनकारियों को जब पुलिस अपनी गाड़ियों में भरकर पुलिस लाइन ले गयी तो कई भाजपा नेता उन्हें छुड़ाने चले गये।
इस घटना के तुरन्त बाद कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन और नैनीताल, भीमताल व अल्मोड़ा परिसरों को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। साथ ही कार्य परिषद् सदस्य राजीव लोचन साह व सुरेश डालाकोटी ने घटना के विरोध में 24 घंटे का उपवास रखने की घोषणा की। 5 अगस्त को इस घटना को लेकर काफी गहमागहमी का माहौल रहा और सर्वत्र इस घटना की निन्दा की गयी। प्रशासनिक भवन में आहूत बैठक का सभाकक्ष नागरिकों से खचाखच भर गया। बैठक की शुरूआत करते हुए कुलपति प्रो.सी.पी. बर्थवाल ने बताया कि अ.भा. वि.प. की अधिकांश मांगें शासन स्तर की हैं, जिनको शासन के पास भेज दिया गया है और जो विश्वविद्यालय स्तर की हैं उन पर कार्यवाही चल रही है। लेकिन सामान्यतया अनुशासन में रहने वाले इस संगठन ने जो अराजकता व तोड़फोड़ की उससे विश्वविद्यालय को करीब 50 लाख की क्षति हुई है। बैठक का संचालन करते हुए कार्यपरिषद के सदस्य डॉ. सुरेश डालाकोटी ने घटना का विवरण देते हुए दोषियों को दण्डित करने की माँग की। राजीव लोचन साह ने विश्वविद्यालय के इतिहास में इस घटना को काला इतिहास बताते हुए कहा कि वे इस घटना में कुलपति को दोषमुक्त नहीं मानते पर वर्तमान हालातों में अराजकता फैलाने वालों को सजा दिलवाने और विश्वविद्यालय में शांति का माहौल बनाये जाने के पक्ष में हैं। वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी बाँकेलाल कंसल और पूर्व सांसद डॉ. महेन्द्र सिंह पाल सहित अनेक लोगों ने घटना की निन्दा करते हुए दोषियों को दण्डित करने की मांग की। मगर साथ ही कुलपति व विश्वविद्यालय प्रशासन को भी खूब लताड़ा और पुलिस-प्रशासन की हीलाहवाली पर नाराजगी व्यक्त की। कर्मचारी व अध्यापकों ने सुरक्षा की माँग की। तय किया गया कि पुलिस-प्रशासन द्वारा प्राथमिकी दर्ज न कराये जाने पर उच्च न्यायालय में पी.आई.एल. लगाई जाये। भाजपा के नगर अध्यक्ष गोपाल रावत द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रों का पक्ष लेने पर बैठक में थोड़ी देर के लिये उत्तेजना भी फैली।
6 अगस्त को आयुक्त कुमाऊँ, एस. राजू ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और विश्वविद्यालय प्रशासन से वार्ता की। इधर भारी जनदबाव के बाद मल्लीताल पुलिस थाने में 8 लोगों के नाम वि.वि. प्रशासन की ओर से आई. पी.सी. की धारा 147, 427 के तहत मुकदमा तो दर्ज कर लिया, पर दोषियों की गिरफ्तारी बड़े नाटकीय अंदाज में की। अभियुक्तों की पुलिस संरक्षण में जिस तरह खातिरदारी की उससे अभियोजन अधिकारी और न्यायाधीश तक खिन्न दिखाई दिये।
यह बात भी समझ से परे रही कि कुलपति प्रो. बर्थवाल इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के सम्बन्ध में बातचीत करते हुए क्यों हर जगह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को एक अनुशासित संगठन बताते रहे! न ही यह बात स्पष्ट हो पायी कि अ.भा.वि.प. अंक तालिकाओं में गड़बड़ी व छात्र हितों की अनदेखी करने के आरोपों के साथ जगह-जगह कुलपति का पुतला फूँकते हुए 4 अगस्त को कुलपति के घेराव की घोषणा कर रहा था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कार्रवाही क्यों नहीं की और क्यों पुलिस-प्रशासन संभावित घटना के प्रति लापरवाह बना रहा ?
बहरहाल 8 अगस्त को कुलपति को देहरादून बुलाया गया और मुख्यमंत्री से उनकी वार्ता हुई। वहाँ से लौट कर 11 अगस्त को कुलपति की अध्यक्षता में हुई बैठक में विश्वविद्यालय खोलने का निर्णय लिया गया। इसी दिन कर्मचारी संयुक्त मोर्चा की बैठक में भी छात्र हितों एवं जन भावनाओं का आदर करते हुए विश्वविद्यालय खोले जाने पर सहमति बन गयी और 12 अगस्त से पुलिस फोर्स के साये में कुमाऊँ विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन तथा अल्मोड़ा, नैनीताल व भीमताल परिसरों को खोल दिया गया।
विश्वविद्यालय बंद कर दिये जाने से करीब एक लाख विद्यार्थी प्रभावित हुए। विश्वविद्यालय में डी. एस.बी, भीमताल व अल्मोड़ा परिसरों के अलावा 34 डिग्री कॉलेज व 15 प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट यहाँ से सम्बद्ध हैं । इनमें करीब 98 हजार छात्र-छात्राएँ अध्ययनरत हैं। इनके अतिरिक्त प्रोफेशनल कोर्स में करीब 12 हजार छात्र अध्ययनरत हैं। इस घटना के बाद प्रशासनिक भवन में कार्यरत कर्मचारी अभी भी दहशतजदा हैं। उधर कुलपति की अकर्मण्यता से अध्यापकों का मनोबल अपने न्यूनतम स्तर पर है। लगता है अनियमितताओं व लापरवाहियों से घिरे कुमाऊँ विश्वविद्यालय का कोई खैरख्वाह इन दिनों नहीं है।