बागेश्वर में खड़ी होली का अपना एक अलग ही अंदाज रहा है। बताया जाता है कि यहां बागनाथ मंदिर में पहले शिवरात्रि को रात में खड़ी होली का आयोजन होता था, जिसमें सतराली (सातगांव), ताकुला के होल्यारों का भी आगमन होता था। स्थानीय होल्यारों के साथ रात भर होलियाँ गाई जाती थीं।
खड़ी होली गाने का अपना यहाँ एक अलग अंदाज है। भगवान गणेश की स्तुति ’सिद्धि को दाता विघ्न विनासन’ से प्रारम्भ करते हुए गाँव-गाँव में मंदिर, चौपाल में पुरुष रात को अलाव जलाकर ढोल और झांझर की ताल में दो पारी बनाकर गाते हैं। राधा-कृष्ण के अलग-अलग देवस्थानों में सम्बद्ध देवता पर आधारित, यथा शंकर के मंदिर में ‘हां-हां जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला’, होलियों का गायन होता है।
होली गायन में कृष्ण-सुदामा का मिलन, जनकपुरी में विश्वामित्र-जनक संवाद, कौरवों के दरबार में द्रोपदी के चीरहरण पर द्रोपदी के कृष्ण को लगाई गई पुकार का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है-
‘‘श्याम मुरारी के दर्शन को जब, ![]()
विप्र सुदामा आए लला
द्वारपति जब भीतर गयो है,
विप्र खड़ो एक द्वारे लला
लाओ झटपट, लाओ उनको, रोको
नहीं क्षण एक लला‘‘
‘‘सांवरी सूरत बड़ी-बड़ी अंखियां,
गोर बदन तन जाके ये दो बालक काके
कौन नगर में जन्म भयो है, क्या है नाम पिता के,
ये दो……।
अवधपुरी में जन्म भयो है, दशरथ नाम पिता के,
ये दो……..।’’
‘‘तुम मो पति राखो आज
हरि कौरव पाण्ड़व मिल कर बैठे,
खेलत चैपड़ हर पड़ी। तुम……………..।’’
अधिकांशतया रात्रि में होली गायन मंदिर अथवा सार्वजनिक चैपाल/आंगनों में बैठकर गाई जाती है। होली के अंतिम दिन अर्थात छलड़ी के दिन सभी मंदिर, नगर के सभी मोहल्लों, आंगनों से होते हुए निकलती है तथा होली गायन करते हैं। छलड़ी के दिन मुख्यतः कुछ खास होली गाई जाती है, जैसे ‘‘बूंद जो पड़ी है गुलाब की, चादर मोरी भीगे रे, छैला आज की रैना सुहावना’’ या फिर ‘‘चैतरी उप्पर चैंतरा, हां हां चैतरी उप्पर चैतरा. ..मलि बाग लगाया रे छैला, आज की रैना सुहावना।‘‘
छलड़ी के दिन होली का समापन होता है इसमें भी सभी होल्यारों, नगरवासियों को आर्शीवाद/शुभकामनाएं देते हुए गायन होता है।
‘‘ हो हो होलकी रे…बरस दिवाली बरसे फाग…
हो हो होलकी रे… जो नर जीवे खेले फाग हो हो ….।
आज का वसंत कै का घर, हो हो।
इसमें सभी देवताओं, होल्यारों आदि का नाम लेकर एक दूसरे को होली की शुभकामनाएँ देते हुए गले मिलते हैं। यह दृश्य वास्तव में एक विदाई की जैसी स्थिति उत्पन्न कर देता है। इसके दूसरे दिन दाम्पत्य टीका होता है जिसमें रात्रि में पुनः एक बार मंदिर में बैठक कर हलुवा, आलू बनाया जाता है तथा गुड़ बांटा जाता है।


























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