शनिवार, 8 अगस्त की प्रातः ढाई बजे मुनस्यारी तहसील के दाफा में हुई तबाही का मंजर अन्य लोग तो भूल ही जायेंगे, लेकिन जिन लोगों के दिल के टुकडे़ उस जगह दफ्न हो चुके हैं, उनका इस हादसे को ताउम्र भुला पाना मुमकिन नहीं हो सकेगा। यहाँ बादल फटने के बाद हुए भूस्खलन से ला, पनेलिया, झेकला गाँवों में 44 लोगों की अकाल मौत हो गई। सैकड़ों मवेशी भी दफ्न हो गए। सैणराथी गाँव के रूमीडोला तोक में दो परिवारों के पाँच, चचना गाँव के दो व ला गाँव के सात परिवारों के 44 लोग इस हादसे में जिंदा दफ्न हो गए। पनेलिया से जाकुला नदी तक 45 से 60 डिग्री ढलान पर पहाड़ी पर बसे पाथर के मकानों व सीढ़ीनुमा खेतों में गूँजने वाली आवाजें अब खामोश हैं। झेकला गधेरे के बगल में पर्यटकों को लुभाने वाले हीरामणी रेस्टोरेन्ट का नामोनिशाँ मिट गया है। अब यहाँ मस्ती के गीत नहीं, सुबकने की आवाजें सिहरन पैदा करती हैं।
दैनिक हिन्दुस्तान के समाचार संपादक पूरन बिष्ट ने जब सुबह साढे़ नौ बजे फोन पर इस दुर्घटना की सूचना दी तो पहले यकीन ही नहीं हुआ। बदहवासी में बेरीनाग में हीरा को फोन किया तो उसने बताया कि वह खुद भी रेस्क्यू टीम के साथ वहीं जा रहा है। हीरा यानी हृदयेश परिहार जो एक कुशल पर्वतारोही भी हैं और पुलिस विभाग में सेवारत हैं। तुरंत अपने साथी घनश्याम जोशी को बुलाया, डॉ. राजीव उपाध्याय से गाड़ी माँगी और 11 बजे हम बागेश्वर से चल पड़े। थल से नाचनी होते हुए जब हम आगे निकले तो कई जगह पर सड़क धँसी मिलीं। कई जगह सड़क कीचड़ से सनी दलदल बनी हुई थी। पनियाली से पहले कई बड़ी गाड़ियाँ आगे सड़क संकरी होने की वजह से फँसी पड़ी थी।
दोपहर करीब दो बजे झेकिला के पास पहुँचे। दोनों ओर कई किलोमीटर दूर तक गाड़ियों का काफिला रुका था। हर कोई बदहवास सा दिखा। प्रकृति का भयावह मंजर हमारे सामने था। बिजली और टेलीफोन की लाईनें ध्वस्त हो गई थीं। हादसे में घायल लोगों को बचाने की बात ही नही थी। सभी मलवे में दफ्न हो चुके थे। थल-मुनस्यारी मोटर मार्ग का झेकिला के पास तीन सौ मीटर तक कहीं नामोनिशाँ नहीं था। रैस्क्यू भी किया जाता, तो किसका ? दूर नीचे जाकुला नदी के किनारे आधा किलोमीटर के गोल दायरे में फैले मलवे में आईटीबीपी, पुलिस के जवान तथा स्थानीय लोग शव ढूँढने में लगे थे। हमारे नीचे पहुँचने तक दस लाशें निकाली जा चुकी थीं। तीन शव जाकुला नदी से भी नीचे के गाँव में निकाले जा चुके थे। पिथौरागढ़ का सारा प्रशासनिक अमला वहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा था। पटवारी नक्शे में मकान, खेत व परिवारों की ढूँढ खोज करने में जुटे थे। पुलिस व डॉक्टर लाशों का पंचनामा भर पोस्टमार्टम करने में लगे थे।
दो घंटे तक हम ठिठके से प्रकृति के गुस्से का मंजर देखते रहे। मालपा की याद हो आई। हमने मृतकों की जानकारी ले डी.एम. पिथौरागढ़ से आगे की कार्यवाही बाबत पूछा। उनका कहना था कि मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रुपया मिलेगा। किसे दोगे ? कोई तो बचा नहीं शायद ?…. पूछने पर उन्होंने चुप्पी साध ली। चार बज चुके थे। लौट पड़े वापस ऊपर सड़क की ओर। रास्ते में दूसरे गाँवों के लोग भी दौड़ते हुए नीचे को आ रहे थे….घबराए हुए से….कई जगहों पर औरतें सुबकने में लगी थीं। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था, एक खामोशी थी। सड़क पर आ वापस नाचनी की ओर चल पड़े। डोर से आगे एक मोड़ पर तीन शव किनारे रखे थे। ये शव जाकुला नदी से निकाले गए थे। रास्ते में सी.डी.ओ. की गाड़ी में प्रदेश के मुख्यमंत्री घटनास्थल को जाते दिखे। बाद में पता लगा कि हैलीकॉप्टर उतारने के लिए सही जगह न बताने पर एस. डी.एम. पिथौरागढ़ देवमूर्ति यादव को निलंबित कर दिया गया। हालाँकि चर्चा थी कि ये तो एक बहाना है। चंडाक प्रकरण में एस.डी.एम. की कार्यप्रणाली से भाजपाई नाखुश थे। इंतजार में थे मौके के। इससे अच्छा मौका ढूँढे नहीं मिलता। अभी डीडीहाट की एस.डी.एम. दीप्ति सिंह पर भी गाज गिर सकती है। दीप्ति सिंह ने गंगोलीहाट में शराब तस्करों को नुकसान तो पहुँचाया ही, काम भी करने नहीं दिया। और ये सर्वविदित है, सरकार जिसकी शराब तस्कर उसी के हो जाते हैं।
धर्मशक्तू जी इस हादसे को लेकर काफी विचलित थे। उनका कहना था कि प्रशासन ने एक हादसे पर सारा तंत्र यहाँ दौड़ा दिया। यदि कहीं और इस तरह की घटना हो जाती एक ही समय में तो….? बहुत कुछ कह गए वे एक अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह। खोखला कर दिया है पहाड़ को शराब ने… थल. .. नाचनी.. हर कस्बे में हरियाणा.. चंडीगढ़ की शराब बिक रही है…..यहीं मलवे में डेढ़ हजार प्लास्टिक की बोतलें मिलीं। देवभूमि में क्या कुछ नहीं हो रहा… सब जानते हैं। लेकिन सभी अपने विकास में लगे हैं।
नाचनी पहुँचने पर देखा कि नेटवर्क काम नहीं कर रहा तो थल से आगे उड्यारी बैंड को चल पड़े। आधे रास्ते में नेटवर्क मिला, लेकिन बार-बार कट जाने से खबरें भेजने में दिक्कत होने लगी। देर होने पर फिर बेरीनाग का रुख किया। बमुश्किल खबरों का भेज पाना हो सका। रात बारह बजे बागेश्वर पहुँचना हुआ। दूसरे दिन दिमाग में पनेलिया ही घूमता रहा। एक बार फिर देहरादून से पनेलिया जाने के लिए आदेश आया। रास्ते की हालत देख इस बार हेमंत की वैन माँग ली। रात नौ बजे नाचनी पहुँचना हुआ। आगे जाने से पहले हमने वहाँ पुलिस चौकी से जानकारी ले लेनी उचित समझी। चौकी में जाने पर पता लगा कि उन्हें कुछ भी जानकारी नहीं है। कारण….. वायरलैस सैट वहाँ लगा ही नहीं। हादसे यहाँ होते रहते हैं, नेटवर्क अक्सर फेल रहता है। शराबियों के आतंक के आगे हर कोई बेबस है। फिर यहाँ पुलिस चौकी क्यों खोल रखी है ? सिर्फ मित्रता निभाने को ! कहीं कोई उत्तर न मिलने पर स्थानीय पत्रकारों की ढूँढ-खोज शुरू कर दी। पत्रकार केवलानंद जोशी को फोन किया। थोड़ी देर में ही वे पत्रकार मोहन जंगपांगी के साथ आ गए। बारिश और रात हो जाने के कारण उन्होंने हमें आगे जाने से रोक लिया। रुकने के लिए नाचनी में दो होटल थे और वो भी पैक थे। हमने टैंट लगाने का निर्णय किया, लेकिन जोशी जी व जंगपांगी जी नहीं माने। लगभग खींचते हुए जोशी जी हमें अपने घर ले गए।
खाना हम अपने साथ ही घर से लाए थे, कि वहाँ न जाने क्या स्थिति हो। पनेलिया समेत आसपास के गाँवों की जानकारी मिली। प्रशासन की कार्यप्रणाली से दोनों खासे क्षुब्ध थे। हम कुछ नोट्स तैयार कर सो गए। सुबह जोशी जी भी हमारे साथ हो लिए। आगे तेजम से ही एक पूर्व सैनिक भी हमारे साथ हो लिए। रास्ते में दूर पहाड़ियों पर बसे गाँवों के नीचे से जगह-जगह भूधँसाव दिख रहा था। नौ बजे घटनास्थल पर पहुँचे। पी.डब्लू. डी. की गैंग झेकिला (सुकराड़ी) गधेरे से बह चुकी सड़क को ठीक करने में जुटी थी। कीचड़-दलदल से लथपथ रास्ते को पार कर जाना हुआ। आसपास के गाँव वाले इधर-उधर खडे़-बैठे गुमसुम से थे। कुछ महिलाएँ घर से जंगल को काम के लिए निकली थीं। घंटों से वहाँ खड़ी सुबक रही थीं। आगे बढ़ने पर आर.ई.एस. के अभियंता जे. एस. धर्मशक्तू मिले। इनसे पुराना परिचय था। धर्मशक्तू जी इस हादसे को लेकर काफी विचलित थे। उनका कहना था कि प्रशासन ने एक हादसे पर सारा तंत्र यहाँ दौड़ा दिया। यदि कहीं और इस तरह की घटना हो जाती एक ही समय में तो….? बहुत कुछ कह गए वे एक अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह। खोखला कर दिया है पहाड़ को शराब ने… थल. .. नाचनी.. हर कस्बे में हरियाणा.. चंडीगढ़ की शराब बिक रही है…..यहीं मलवे में डेढ़ हजार प्लास्टिक की बोतलें मिलीं। देवभूमि में क्या कुछ नहीं हो रहा… सब जानते हैं। लेकिन सभी अपने विकास में लगे हैं।
जोशी जी के परिचित दाफा गाँव के पूर्व प्रधान धन सिंह मेहता वहीं पर मिल गए। रास्ते में साथ चलते हुए उन्होंने बताया कि घटना के दिन यदि संचार व्यवस्था ठीक होती तो शायद कुछ लोग बच सकते थे। चार दिन से फोन बंद थे। दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी। उस रात एकाएक गर्जना करते हुए काफी बिजली कड़की और जोरों की बारिश होने लगी। लाईट भी नहीं थी। बाहर घुप्प अंधेरे में सुकरोड़ा गधेरे में बाढ़ आने के साथ ही पहाड़ खिसकने का सा एहसास हुआ। मोबाइल फोन से नीचे सूचना देने की सोची तो नेटवर्क ही नहीं था।
सड़क से लगभग एक किमी चढ़ाई के बाद प्राथमिक विद्यालय मडलकिया पहुँच। मालूम हुआ कि यहाँ प्रभावितों की ठहरने की व्यवस्था की गई है। प्रभावित तो दिखे नहीं, हाँ अधिकारियों और उनके कर्मचारियों की फौज जरूर दिखी। अधिकारी परेशान थे। शायद ड्यूटी से। कुछ ग्रामीणों ने चुपचाप एक व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए बताया कि ये ब्लॉक प्रमुख के पति हैं। यही सब देखते हैं उनका काम। ग्रामीणों में ब्लाँक प्रमुख पति के खिलाफ अविश्वास व डर सा दिखा। पुराने घाव हरे हो गये होंगे। एक ग्राम प्रधान महिला अपने पति से फोन में जल्दी आने के लिए कह उसका मोर्चा संभालने को कह रही थी। हम आगे दाफा को निकल गए। यहाँ के कुछ मकान भूस्खलन की जद में दिखे। घरों में कोई नहीं मिला। मालूम हुआ कि प्रशासन ने उन्हें नीचे स्कूल में रहने को कहा है। नीचे खेतों में तीन महिलाएँ गुड़ाई करती सी दिखीं। लेकिन जब कैमरे से देखा तो वे भी आँसू भरे हुए सुबक रही थीं। वापस नीचे को लौटे। स्कूल के पास पहुँचे। अधिकारीगण कागजी कार्यवाही पूरी करने में मशगूल थे।
पनेलिया गाँव की ओर रुख किया। फौज में तैनात देव सिंह तथा दिल्ली में प्राइवेट नौकरी में उसका भाई बलवंत एक माह पूर्व ही घर से गए थे। हादसे में घर के सभी 12 सदस्यों की मौत की खबर मिलने पर दोनों बदहवास से घर को आए। हम लोग सुनसान बाखली से होते हुए देव सिंह राणा के चाचा के दोमंजिले घर में पहुँचे। देव गुमसुम सा था। धीरे-धीरे कुरेदने पर वह फट सा पड़ा। इस पर उसके चाचा, चाची व दादी ने राहत की साँस ली। पता लगा कि तीन दिन से वह गुमसुम सा बैठा है। कुछ दिन पहले ही तो उसने बच्चों से बात की थी। सुबकते हुए पुरानी यादों में खो सा गया वह……. जब वह छुट्टी में घर आया था तो छोटे भाई मोहन के हीरामणी होटल में पर्यटकों की सेवा करने में क्या ही आंनद आया था। छोटा भाई काफी मेहनती व व्यावहारिक था। होटल अच्छा चल रहा था। अब तो वहाँ बस मिट्टी, पत्थर ही दिख रहा है। परिजनों के शरीर ही मिल जाते तो क्रिया-कर्म तो किया जाता….प्रशासन के लोग तो बस अपना टीए-डीए बनाने में जुटे हैं।
फौज में तैनात देव सिंह तथा दिल्ली में प्राइवेट नौकरी में उसका भाई बलवंत एक माह पूर्व ही घर से गए थे। हादसे में घर के सभी 12 सदस्यों की मौत की खबर मिलने पर दोनों बदहवास से घर को आए। हम लोग सुनसान बाखली से होते हुए देव सिंह राणा के चाचा के दोमंजिले घर में पहुँचे। देव गुमसुम सा था। धीरे-धीरे कुरेदने पर वह फट सा पड़ा। इस पर उसके चाचा, चाची व दादी ने राहत की साँस ली। पता लगा कि तीन दिन से वह गुमसुम सा बैठा है। कुछ दिन पहले ही तो उसने बच्चों से बात की थी। सुबकते हुए पुरानी यादों में खो सा गया वह…….
पास में ही 85 वर्षीय बूढ़ी दादी भी सुन रही है। देख सकती नहीं। मोतियाबिंद से आँखें खो चुकी है। बताती हैं कि बुढ़ापे में ही यह सब देखने को लिखा था। देव को सांत्वना दे हम मल्ला ला गाँव की ओर चल पड़े। रास्ते में सड़क किनारे सीमेंट के गोदाम के बाहर बरामदे में जमघट लगा देख उधर का ही रुख किया। पता लगा कि राहत सामग्री बँट रही है। कंबल, प्लास्टिक व छोटे-छोटे साबुन, जिनकी संख्या करीब 50 के आसपास होगी। कागजों में नाम खंगाले जा रहे थे। नीचे सड़क में कुछ महिलाएँ सामान लाते दिखीं। पता लगा कि नीचे भी कहीं राहत सामग्री बँट रही है। एक कबंल, 5 किलो आटा-चावल व एक कप दाल…! इनसे प्रभावित, गरीबों के चूल्हे एक-आध दिन तो जल ही जाएँगे। कुछ तो उनकी भूख मिटेगी। प्रशासन व दानी संस्थाओं की भूख भी तो राहत के नाम पर ऐसे मौकों पर ही मिटती है। हममें पत्रकार की बू सूँघ कुछ संस्था वालों ने हमें घेर लिया और अपना गुणगान करने लगे। इतने लोग आए हैं राहत सामग्री बाँटने…… सभी को संतुष्ट कर दिया… कुछ बचा भी क्या ? पूछने पर बोले बचा कहां साहब माल तो गिन कर लाए थे लेकिन कई दूसरे भी उठा ले गए हैं…कम जो पड़ गया….पटवारीजी को दे दिया था कि तुम बाँट दो….क्या करें भीड़ में गलत लोग भी घुस गए। हम सोचते रह गए कि कौन लोग गलत थे ? हालातों से मजबूर होने पर ही कोई भीख माँगने के लिए अपना हाथ आगे करता है…… . इस घटना से जो प्रभावित नहीं थे वे यदि कुछ ले भी गए तो यकीनन इतनी पीड़ादायी स्थिति में जरूर होंगे कि लाईन में घंटों खड़े रहे। अपने आप में जलालत भी महसूस की होगी। उत्तराखंड के विकास में यदि वे पिछड़ रहे हैं तो किसी की क्या गलती है ! गलती तो उन्हीं की है कि वे जिंदा हैं। दानवीरों को दान देना ही था, तो उसमें फर्क क्यों देखना हुआ… दान करने के बाद बचा सामान वापस ले जाते वक्त उन्हें भी तो संतोष होता कि सभी पीड़ितों के आँसू कुछ तो उन्होंने भी पोछ लिए! अब यहाँ तो विपरीत था। सामान कम और दानवीर ज्यादा….
सड़क से नीचे उतरे मल्ला ला गाँव की ओर। तल्ला ला गाँव के कई परिवारों का यहाँ मल्ला ला गाँव में भी अक्सर रहना होता है। आपदा के दिन जो यहाँ थे वो बच गए। दो मंजिले ग्वाड़ (मकान) में जानवरों की देखरेख के लिए अक्सर यहीं रह रहे 80 वर्षीय बहादुर सिंह व उनकी पत्नी 70 वर्षीय मोतिमा देवी ने आँगन में आवाज सुन बाहर को झाँका। सीढ़ियों में ही हम सभी बैठ गए। परिवार के नौ सदस्यों को खोने का दुःख उनके चेहरे पर झलक रहा था। राहत के नाम कुछ मिला पूछने पर बोले हम बूढ़ों को क्या चाहिए….. सूखी लकड़ी की तरह जिंदगी हो गई अब तो….. कुछ नहीं चाहिए… कुछ नहीं….।
नीचे बाखली की ओर गए। बाहर आँगन में शून्य में ताकती 55 वर्षीय गवरा देवी दिखीं। पास में ही उसका बेटा अपने बच्चों के साथ बैठा था। उसकी हालत देख हमें कुछ सूझा ही नहीं। उसके लड़के से मालूम हुआ कि हादसे में भाई समेत वे पाँच जनों को खो बैठे हैं। पटवारीजी कह गए हैं कि घर छोड़ दो। जाना कहाँ है पता नहीं।
भरे मन से हम वापस लौटे। सड़क में पहुँचने पर देखा कि डोली में एक बीमार को लेकर कुछ लोग ऊपर दाफा गाँव से आ रहे हैं। पता लगा कृषि अधिकारी, पिथौरागढ़ एन.एस. बिष्ट हैं। चढ़ाई चढ़ते वक्त दिल का दौरा पड़ गया। बेहोश हो गए। 108 बुला उन्हें पिथौरागढ़ भेजा गया। बाद में पता लगा कि हालत ज्यादा खराब होने पर उन्हें हल्द्वानी भेज दिया गया था।
झेकला गधेरे के पास पी.डब्लू.डी. की गैंग सड़क बनाने में जुटी पड़ी थी। फौजी देव सिंह का बड़ा भाई बलवंत बदहवास सा सड़क पर घूम रहा था। बार-बार वह मकान वाली जगह की ओर इशारा कर बता रहा था कि उसका परिवार वहीं कहीं दबा है। प्रशासन ने सिर्फ जाकुला नदी के किनारे ही ढूँढ खोज कर इतिश्री कर ली। यहाँ आर्मी को लगाना चाहिए। हर कोई तो फफक रहा था वहाँ। नीचे जाकुला नदी आज शांत सी दिख रही थी। ला गाँव के दूसरे छोर पर नजर पड़ी तो वहाँ जमीन में कई जगह गहरी दरारें दिखीं।
सायं हो चुकी थी। बुझे मन से वापसी की राह पकड़ी। नेटवर्क की जगह पर पहुंचते ही गाड़ी ने गहरी सांस लेते हुए आगे बढ़ने से मना कर दिया। बमुश्किल उड्यारी बैंड तक पहुँचना हुआ। दूसरे दिन दोपहर तक गाड़ी की साँस लौटी तो फिर हमने झेकला की ओर प्रस्थान करने का विचार बनाया। लेकिन एक बार फिर गाड़ी ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। तभी दर्जनों गाड़ियों का काफिला आता हुआ दिखा। बागेश्वर के कई चिर-परिचित चेहरे दिखे। उनके साथ सांसद प्रदीप टम्टा भी थे, जो सांसद हरीश रावत के साथ घटनास्थल को जा रहे थे। रावतजी बेरीनाग होते हुए आ रहे थे। झेकला का उनका यह दूसरा दौरा था। टम्टा जी पुराने आंदोलनकारी रहे हैं। हिमालयी नीति तथा राज्य की राजधानी गैरसैंण पर जोर देते हुए उनका कहना था कि सत्ता सुख भोगने वालों को पता लगना चाहिए कि पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति और यहाँ जीवन कितना कठोर है। उन्होंने प्रभावित परिवारों को तराई में बसाए जाने की वकालत भी की।
गाड़ी ठीक हुई तो वापस बागेश्वर ही लौटना पड़ा। मगर मन अभी भी नाचनी से बिर्थी फाल के बीच बसे गाँवों की ओर भटकता रहता है। जाकुला नदी के किनारे फौजी देव की पत्नी का शव भी मिल गया है। प्रशासन ने अब मृतकों की ढूँढ-खोज का काम बंद कर मलवे में दफ्न शेष लागों को मृत मानने का फरमान जारी कर दिया है। मलवे में दबे शवों के सड़ने-गलने से वहाँ अब दुर्गंध उठने लगी है। पहाड़ों की ढलानों में पीढ़ियों से रच-बस चुके ग्रामीण अब अपनी सुरक्षा को लेकर दहशत में हैं। दैवीय प्रकोप मान वे पूजा-पाठ भी करने में लगे हैं। सरमौली, भंडारीगाँव, उमली, लुईशपट्टा, बिर्थी, गिरगांव सहित दर्जनों गांवों के प्रभावितों का कहना है कि उन्हें आशा नहीं कि प्रशासन उनके विस्थापन की कार्यवाई कभी करेगा। दरअसल झेकला, ला व दाफा ग्राम सभा को प्रशासन ने कभी संवेदनशील की श्रेणी में रखना मुनासिब ही नहीं समझा था। पचास परिवारों का गांव तेजम के तल्ला बाजार को जाकुला नदी ने काटना शुरू कर दिया है। 250 परिवारों के अपने में समेटे मोड़मगांव में भूस्खलन से दो किमी का क्षेत्र तबाह हो गया है। 30 परिवारों वाला मुर्गरम रिजा गाँव तो जाकुला नदी के किनारे ही बसा है। बमनगाँव, धारकुला के तीस परिवारों पर भी भूस्खलन की तलवार लटकी है। रूसपाटा में हो रहा भूस्खलन उत्तरकाशी के वरुणावत पर्वत की तरह ही फैलता चला जा रहा है। यहाँ 15 परिवार दहशत में जी रहे हैं। ताराकोट, आधुधुरा व बजेता गाँवों की स्थिति भी कुछ इसी तरह है। भंडारीगाँव के सात परिवारों ने गाँव छोड़ दिया है। राज्य सरकार इनके लिए क्या करेगी ? शायद कुछ नहीं। 2007 सितंबर में धारचूला तहसील के बरम गाँव में आई आपदा के प्रभावित आज भी वहाँ के राजकीय इंटर कालेज में रह रहे हैं।
इस घटना का विस्तृत वर्णन अब मिला, अब तक तो जब कोई नेता ही वहां गया था, उसी के भाषण या आरोप ही पढने को मिले थे।
बड़े-बड़े मीडिया घराने जो कैटवाक कर रही माडल की ड्रेस गिर जाने पर या दिल्ली में भैस के मरने तक की वाहियात खबरों को ब्रेंकिंग न्यूज सेक्शन में डाल देती हैं, या किसी मासूस बच्चे के बोरवैल में गिरने के बाद निकलने तक का लाईव टेलीकास्ट करते हैं, उनके पास इस त्रासदी के लिये अपने चैनल में समय नहीं था। पता नहीं नेशनल मीडिया उत्तराखण्ड के साथ इतना भेदभाव क्यों करता है?
क्या पता, इनके ब्लैक्मेलू और वकील टाईप के पत्रकार (?) {एंकर ज्यादा सही होगा} सरकार से कुछ झड़ा ही देते।
भूस्खलन की त्रासदी पहाड़ की नियति बन चुकी है. सरकार की तैयारियों और आपदा प्रबन्धन के प्रति गम्भीरता तो इसी बात से पता चल जाती है कि सरकार भूस्खलन के लिये इस इलाके को संवेदनशील नहीं मानती थी. मैंने यह इलाका स्वयं देखा है. लगभग 10-15 साल पहले भी समीपवर्ती बमनगांव के सामने का पूरा पहाड़ दरक गया था लेकिन सौभाग्यवश उस क्षेत्र में कोई रिहायश नहीं थी.
राष्ट्रीय मीडिया की उदानसीनता निश्चय ही दुखद है. Zee TV जैसे प्रतिष्टित चैनल में उत्तराखण्ड के मन्त्री प्रकाश पन्त जी का बयान दिखाया जा रहा था और उन्हें “पिथौरागढ का सांसद” बताया जा रहा था. वो भी तब जबकि Zee TV में उत्तराखण्ड के कई पत्रकार वरिष्ट पदों पर कार्यरत हैं. इतनी बड़ी दुर्घटना को चैनलों ने एक तरह से अनदेखा कर दिया.