2 Responses

Page 1 of 1
  1. avatar
    घिंघारु September 15, 2009 at 2:36 PM |

    इस घटना का विस्तृत वर्णन अब मिला, अब तक तो जब कोई नेता ही वहां गया था, उसी के भाषण या आरोप ही पढने को मिले थे।
    बड़े-बड़े मीडिया घराने जो कैटवाक कर रही माडल की ड्रेस गिर जाने पर या दिल्ली में भैस के मरने तक की वाहियात खबरों को ब्रेंकिंग न्यूज सेक्शन में डाल देती हैं, या किसी मासूस बच्चे के बोरवैल में गिरने के बाद निकलने तक का लाईव टेलीकास्ट करते हैं, उनके पास इस त्रासदी के लिये अपने चैनल में समय नहीं था। पता नहीं नेशनल मीडिया उत्तराखण्ड के साथ इतना भेदभाव क्यों करता है?
    क्या पता, इनके ब्लैक्मेलू और वकील टाईप के पत्रकार (?) {एंकर ज्यादा सही होगा} सरकार से कुछ झड़ा ही देते।

    Reply
  2. avatar
    Hem Pant September 15, 2009 at 2:59 PM |

    भूस्खलन की त्रासदी पहाड़ की नियति बन चुकी है. सरकार की तैयारियों और आपदा प्रबन्धन के प्रति गम्भीरता तो इसी बात से पता चल जाती है कि सरकार भूस्खलन के लिये इस इलाके को संवेदनशील नहीं मानती थी. मैंने यह इलाका स्वयं देखा है. लगभग 10-15 साल पहले भी समीपवर्ती बमनगांव के सामने का पूरा पहाड़ दरक गया था लेकिन सौभाग्यवश उस क्षेत्र में कोई रिहायश नहीं थी.

    राष्ट्रीय मीडिया की उदानसीनता निश्चय ही दुखद है. Zee TV जैसे प्रतिष्टित चैनल में उत्तराखण्ड के मन्त्री प्रकाश पन्त जी का बयान दिखाया जा रहा था और उन्हें “पिथौरागढ का सांसद” बताया जा रहा था. वो भी तब जबकि Zee TV में उत्तराखण्ड के कई पत्रकार वरिष्ट पदों पर कार्यरत हैं. इतनी बड़ी दुर्घटना को चैनलों ने एक तरह से अनदेखा कर दिया.

    Reply

Leave a Reply