‘जो नर जीवें खेले फाग, हो हो हो लकी रे’
गिरिजा काण्डपाल
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खड़ी होली के अन्तर्गत महिलाओं द्वारा जो होलियाँ गाई जाती हैं, वे आमलकी (आँवला) एकादशी के दिन से प्रारम्भ हो जाती हैं। महिलायें एकादशी का व्रत रख कर आँवले के वृक्ष की पूजा करती हैं। आँवले के वृक्ष की शाख पर चीर (वस्त्र) बाँधती हैं। होली गायन के रूप में सर्वप्रथम सिद्धि विनायक गणपति को आमन्त्रित किया जाता है। साथ ही राधा-कृष्ण, सीता-राम, शिव-पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु, महेश का आह्वान किया जाता है, भक्ति रस में डूबी हुई होली के कुछ बोल इस प्रकार हैं -
हो तुम सिद्धि करो महाराज,होलिन के दिन में।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश मनाऊँ, सरस्वती जी के साथ-होलिन के दिन में।
आओ-आओ गिरिराज खेलें होरी।
गणपति माथे तिलक लगो है,रिद्धि सिद्धि मांग अबीर रोरी।
आओ गिरिराज खेलें होरी।
सभी महिलायें मिल-जुल कर होली गाती हैं तथा नृत्य करती हैं। घर के सभी सदस्यों का नाम लेकर चीर बाँधी जाती है। उस दिन से होली गाने व एक-दूसरे को गुलाल, अबीर लगाने का क्रम प्रारम्भ हो जाता है। घर-घर होली गायन की प्रथा प्रचलित है। जलपान के रूप में गुझिया, आलू के गुटके व चिप्स-पापड़ तथा चाय परोसी जाती है। जिसके घर में होली गाई जाती है, उस घर के सभी सदस्यों को आशीश दी जाती है। चारों ओर एक उल्लास पूर्ण वातावरण रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी एक गाँव के सभी लोग टोली बना कर दूसरे गाँव में जाते हैं तथा होली गाते हैं। जिसके आँगन में होली गाई जाती है, उस घर का मुखिया गुड़ की भेली तोड़ कर सबको गुड़ देता है। अन्त में सब मिल कर आशीश देते हैं-
‘जो नर जीवें खेले फाग, हो हो होलकी रे।आज को बसन्त कैका घर, आज को बसन्त … जी का घर’ आदि
दूसरी ओर बैठी होली का प्रचलन भी बहुत ज्यादा है। पौष के महिने के रविवार से पुरुषों की बैठी होली (पक्के रागों की होली) प्रारम्भ हो जाती है। पुरुषों द्वारा बैठी होलियाँ अधिकतर रात्रि में गाई जाती हैं। पक्के राग की होलियों को गाने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। जिस किसी भी व्यक्ति को होली सुनने व गाने का शौक होता है तथा लय, ताल का थोड़ा सा भी ज्ञान होता है, वह होली गा सकता है। होली के गीत श्रृंगार रस से ओत-प्रोत होते हैं। विशेष रूप से राधा-कृष्ण की होली श्रृंगार प्रधान होती है।
कामिनी भर-भर मारत रंग, कामिनी भर-भर मारत रंग/भर भर मारत रंग। कामिनी…..।/अपने री अपने महल से निकसी।/अपने पिया के संग।…
कुमाऊँ में होली गायन की यह परम्परा एक लम्बे अर्से से चली आ रही है। किन्तु आज इस परम्परागत होली को मनाने में कुछ व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं, जिनमें पहला कारण है-मद्यपान, खास तौर से उत्तराखण्ड में नशे की लत प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अधिकतर लोग सोचते हैं कि मद्यपान के अभाव में कोई भी पर्व या उत्सव फीका है। लोगों की यह सोच उचित नहीं है। ‘छलड़ी’ वाले दिन पुरुष वर्ग तो टोलियाँ बना कर एक-दूसरे के घर जाते ही हैं, गुलाल, अबीर का टीका लगाते हैं। साथ महिलायें भी अपने-अपने मोहल्लों में टोलियाँ बना कर एक-दूसरे के घर जाती हैं लेकिन शराब पीने वालों की अधिकता के कारण महिलाओं के मन में एक भय व्याप्त रहता है कि कहीं कोई नशे में धुत हो कर अनर्गल बातें न बोले। उनका रंग भंग न हो जाये। इसी प्रकार पुरुष वर्ग की बैठी होली में भी यदि कोई व्यक्ति शराब पी कर आ जाता है, तो बैठक में रंग में भंग की स्थिति हो जाती है ऐसे में उल्लास व उमंग का माहौल बिगड़ जाता है।
अतः हम सभी को प्रयास करना चाहिए कि हम अपनी कुमाउनी होली की परम्परा को अक्षुण बनाये रखने के लिए अपने युवा वर्ग को शराब की लत से दूर रहने के लिए प्रेरित करें तथा उन्हें अपनी परम्पराओं से अवगत कराते हुए उनका रुझान इस ओर आकर्षित करें कि वे सभी कुमाउनी होली की गरिमा का ध्यान रखते हुए स्वस्थ मानसिकता के साथ इस त्यौहार को मनायें तभी हम अपनी कुमाउनी होली की परम्परा को जीवित रख पायेंगे।