मदन मेहरा
फरवरी के प्रथम सप्ताह में ‘बाबा इन्टरटेनमेंट नैनीताल’ के बैनर तले मोहन राकेश के नाटक ‘लहरों के राजहंस ’ का मंचन लगातार तीन दिन तक शैले हॉल नैनीताल के प्रेक्षागृह में किया गया। नैनीताल में सालों तक अजगर वजाहत, धर्मवीर भारती, विजय तेन्दुलकर, सतीश आलेकर, हबीब तनवीर, राधेश्याम कथावाचक, शेक्सपियर, सोफोक्लीज आदि के क्लासिक नाटक मंचित किये जाते रहे हैं। हाल के सालों में साधनों व रंगकर्मियों के अभाव में एक चुप्पी सी पसरी है। ऐसे में बाबा इन्टरटेनमेंट का यह प्रयास सराहनीय कहा जायेगा। जहाँ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भारतेन्दु नाट्य अकादमी, श्री राम सेन्टर नई दिल्ली से प्रशिक्षित और अनुभवी रंगकर्मी कोई गतिविधि नहीं कर पा रहे है, वहाँ एक अप्रशिक्षित और युवा निर्देशक रितेश सागर द्वारा मोहन राकेश के एक जटिल नाटक को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करना चकित करता है।
निर्देशक और कलाकारों का नाटककार के मनःस्थिति तक पहुँचना अनिवार्य है और यह समझना भी बेहद जरूरी है कि नाटककार का एक भी शब्द व्यर्थ न जाने पाये, पूरे भाव के साथ दर्शक तक पहुँचे। नाटक के पात्रों की आन्तरिक गतिविधियों, उथल-पुथल को युवा निर्देशक ने ही नहीं, बल्कि पहली बार मंच पर उतरे अभिनेताओं ने भी समझा, यह इस नाटक की बड़ी उपलब्धि है। मंच सज्जा, वस्त्र सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, संगीत आदि नाटक को गति प्रदान कर रहे थे, परन्तु कभी-कभी ये अवयव नाटक के ऊपर हावी होते हुए से प्रतीत होते है। अभिनेताओं, संजय, आरती, नीरज, हिमानी, ध्रुव, रेहान, रितिका, दिव्यंत, अनवर, देवेन्द्र आदि के अलावा वाचस्पति ड्यूँडी, अनिल घिल्डियाल, आशु, दीपक सहदेव, शरद, मंजूर हुसैन आदि के श्रम व सहयोग से नैनीताल के दर्शकों को एक ताजा और साफ-सुथरा नाटक देख पाने का अवसर मिला।