थारुओं की जमीन का मामला
भारत-नेपाल सीमा से लगी तराई की पट्टी में थारू एवं गैर थारू लोगों के बीच वर्षों से चला आ रहा भूमि विवाद गहराता जा रहा है। जनजाति के लोग मानते हैं कि गैर थारू भू-माफिया ने ऊँची राजनैतिक पहुँच और दादागिरी के बूते उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया है। इसके विपरीत गैर थारू लोग कहते हैं कि थारुओं ने वर्षों पहले उन्हें अपनी जमीनें बेच दी थीं, इसलिये इन जमीनों पर थारुओं का मालिकाना हक नहीं रहा। गैर थारू इस बात पर अड़े हैं कि वे खरीदी गयी जमीनें लेकर रहेंगे जबकि थारुओं की युवा पीढ़ी अपनी जमीनों से कब्जे हटाने के लिए अब कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में आ गई है। इस विवाद से टकराव की आशंकायें बन रही हैं।
देश की आजादी के वक्त थारू तथा बुक्सा जनजाति के लोगों को तराई में जमीन मुहैया कराई गई थी। ये जमीनें केवल खेती के लिये थीं। लेकिन पचास के दशक से ही इन लोगों ने अपनी जमीनों को गैर जनजाति के लोगों को बेचना शुरू कर दिया। जबकि कानूनन यह जमीन बेची नहीं जा सकती थी। जमीनों को खरीदने वालों में पूर्व सैनिक, पंजाब एवं हरियाणा के कृषक और उत्तर प्रदेश के पूर्वी-पश्चिमी भागों से यहाँ आये लोग थे। उत्तर-प्रदेश सरकार ने 1981 में जमींदारी उन्मूलन तथा भूमि सुधार कानून के तहत जनजाति के लोगों की अचल संपत्ति की खरीद फरोख्त पर रोक लगा दी। बावजूद इसके ये सिलसिला चलता रहा।
मौजूदा समस्या तब उत्पन्न हुई, जब 1986 में केन्द्र सरकार ने जनजाति बचाओ अभियान चलाया। इसके अंतर्गत यूपी सरकार ने चकबंदी के सहारे गैर जनजाति के लोगों को थारुओं की भूमि से बेदखल कर थारुओं को उनकी भूमि वापस दिलाने की मुहिम शुरू कर दी। तत्कालीन जिलाधिकारी नैनीताल को पुलिस बल प्रयोग कर चकबंदी करने के आदेश दिये गये। लेकिन उस वक्त गैर थारु कृषकों ने इस कार्यवाही का पुरजोर विरोध कर इसे विफल कर दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चकबंदी का आदेश वापस ले लिया और स्थिति जस की तस बनी रही।
कुछ सालों तक मामला ठंडा रहने के बाद अगस्त 1999 में एक बार फिर उ.प्र. सरकार ने 14 गाँवों में चकबंदी के आदेश दे दिये। फलस्वरूप सभी प्रभावित लोग इसके विरोध में लामबंद हो गये। खास बात यह है कि 1994 से 2000 तक इस आन्दोलन में सिर्फ पूर्व सैनिक ही सम्मिलित थे। बाद में इसमें गैर पूर्व सैनिक कृषक भी शामिल हो गये। सभी ने मिलकर तराई किसान सुधार समिति का गठन किया, जिसका अध्यक्ष कैप्टन शेर सिंह दिगारी को चुना गया। इस आंदोलन को उस वक्त झटका लगा जब जुलाई 2002 को नैनीताल उच्च न्यायालय ने गैर थारु कृषक जगपाल सिंह की याचिका पर फैसला सुनाया, जिसमें याचिकाकर्त्ता की माँग के विपरीत चकबंदी लागू करने के तथा आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग करने के भी आदेश थे। इसके बाद एक बार फिर प्रभावित लोगों का प्रतिनिमण्डल कैप्टन दिगारी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मिला और चकबंदी रोकने तथा भूमि बंदोबस्त करवाने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारी उधमसिंह नगर को उच्च न्यायालय से शपथ-पत्र वापस लेने के आदेश दे दिये। जनवरी 2003 में उच्च न्यायालय ने खटीमा में चकबंदी करवाने पर रोक लगा दी।
तिवारी सरकार ने मामले को सुलझाने के लिये तत्कालीन राज्य योजना आयोग के अध्यक्ष विजय बहुगुणा की अध्यक्षता में एक भूमि संशोधन कमेटी का गठन किया। यह कमेटी भी किसी सार्थक नतीजे में नहीं पहुँच सकी। अब स्थिति यह है कि गैर थारू लोग 1982 के शासनादेश को रद्द कर खुद की खरीदी गयी जमीनों पर मालिकाना हक चाहते हैं। वे नया शासनादेश लाये जाने की माँग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर थारुओं की नई पीढ़ी का कहना है कि भूमाफिया ने उनके पूर्वजों को मार-पीट और डरा-धमकाकर उनकी जमीनें हड़प ली हैं जिन्हें वे मुक्त कराकर रहेंगे। खटीमा एस.डी.एम. कोर्ट में थारुओं की नई पीढ़ी ने दर्जन भर ऐसे मामले दर्ज किये हैं, जिनमें उन्होंने भूमाफिया से अपनी भूमि वापस दिलाने की अपील की है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच गहराते मतभेद तराई में संघर्ष को जन्म दे सकते हैं।






















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