सीताराम बहुगुणा
ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर एवं रुद्रप्रयाग के मध्य सिरोबगड़ अनवरत् भूस्खलन के कारण खतरनाक बना हुआ है। यहाँ पिछले एक वर्ष में कई लोग जान से हाथ धो चुके हैं और दर्जनों अन्य घायल हो चुके हैं। यह राष्ट्रीय राजमार्ग घंटों बंद रहने से बीमार समय पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं पहुँच पाते और छात्र और कर्मचारी अनेक बार आधे रास्ते से वापस लौट जाते हैं। हाँ, सीमा सड़क संगठन के लिये यह भूस्खलन दुधारू गाय बना हुआ है। करोड़ों रुपये का बजट ठिकाने लग रहा है। यों तो मंत्री और आला अधिकारियों को भी अक्सर सिरोबगड़ में परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है, लेकिन देहरादून जाकर ये लोग सब भूल जाते हैं।
हर वर्ष चारधाम, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी सहित चमोली एवं रुद्रप्रयाग जनपदों में स्थित अनेक पौराणिक महत्व के मंदिरों के दर्शनों के लिए लाखों यात्री इस मार्ग से गुजरते हैं। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण सामरिक दृष्ठि से भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है। ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग इन दोनों जनपदों की लगभग दस लाख से अधिक की आबादी को देश के अन्य भागों से भी जोड़ता है। भूगर्भ वैज्ञानिक सिरोबगड़ को दुनिया के सबसे कुख्यात भूस्खलन क्षेत्रों में मानते हैं। भ्रंश की प्रक्रिया के कारण इस स्थान पर चट्टानें पाउडर में तब्दील हो रही हैं। वनस्पति की ऊपरी परत हटने के कारण यह क्षे़त्र तुरन्त ही बारिश के संपर्क में आ जाता है, परिणामस्वरूप हर बरसात में भूस्खलन बढ़ता जाता है। डी.एस.टी., वाडिया इंस्टीट्यूट, केन्द्रीय भवन निर्माण शोध संस्थान एवं गढ़वाल विश्वविद्यालय करोड़ों रुपये इस समस्या के समाधान हेतु खर्च कर चुके हैं, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं सुझा पाये हैं। सिरोबगड़ हमारी तकनीकी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।
सिरोबगड़ से श्रीनगर की दूरी मात्र 18 किमी है। लेकिन वैकल्पिक मार्गों से खेड़ाखाल-डुंग्रपंथ होते यही दूरी 38 किमी एवं वाया खिर्सू होते हुए 70 किमी हो जाती है। जाहिर सी बात है कि समस्या का स्थाई समाधान न होने के कारण सिरोबगड़ यात्रियों की जेब पर भारी पड़ रहा है।