3 जुलाई को मैं दिल्ली के ‘गांधी शांति प्रतिष्ठान’ में चल रही एक बैठक में था। 5 से 8 मई 2010 तक छत्तीसगढ़ में रायपुर से दंतेवाड़ा तक की गई ‘शांति न्याय यात्रा’ की समीक्षा के लिये ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ के डॉ. बनवारी लाल शर्मा ने यह बैठक बुलाई थी। मुद्दा था कि अब क्या हो ? देश को गृहयुद्ध में झुलसने से बचाने के लिये शुरू किये गये इस अभियान को आगे कैसे ले जाया जाये ? बैठक में मौजूद थे ‘शांति न्याय यात्रा’ में भाग ले चुके राधा बहन, डॉ. वी. एन. शर्मा, नीरज जैन, वी. बी. चन्द्रशेखरन, सिस्टर रेशमी तथा इनके अतिरिक्त डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, मेधा पाटकर, अरविन्द केजरीवाल, जी.एन. साईंबाबा, प्रो. अजित झा, देवेन्द्र शर्मा आदि।
एक दिन पहले ही माओवादियों के पोलित ब्यूरो सदस्य और प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले के जोगापुर के जंगलों में पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत हो जाने की खबरें आ चुकी थीं। बैठक में यह बात उभर कर आयी कि आजाद की मृत्यु मुठभेड़ में नहीं हुई, बल्कि उन्हें नागपुर से उठा कर आदिलाबाद के जंगलों में ले जाकर गोली मारी गई। चूँकि स्वामी अग्निवेश विदेश में होने के कारण जल्दबाजी में बुलाई गई इस बैठक में शामिल नहीं हो पाये थे, इसलिये साईबाबा ने ‘शांति न्याय यात्रा’ के बाद हुई प्रगति का विवरण दिया। उन्होंने बताया कि आजाद शान्ति प्रक्रिया को आगे चलाने को उत्सुक थे। ‘शान्ति न्याय वार्ता’ के सम्पन्न हो जाने के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने 11 मई को स्वामी अग्निवेश को एक पत्र लिख कर शान्ति के इस प्रयास के लिये धन्यवाद दिया था और ‘72 घंटे के युद्धविराम’ की पेशकश की थी। हालाँकि चिदम्बरम ने यह भी लिखा था कि इस युद्धविराम के लिये तैयारी करनी होगी और माओवादियों को भी हिंसा छोड़ने की बात स्वीकार करनी होगी। यह पत्र आजाद को पहुँचाया गया। 31 मई को उनके द्वारा भेजा गया उत्तर सकारात्मक था। चिदम्बरम की इस पहल से आजाद को लगा होगा कि सरकार अपने इरादे में ईमानदार है और शायद इसीलिये उन्होंने आवश्यक सावधानी बरतने में लापरवाही बरती होगी, जिससे आंध्र पुलिस को उनका अपहरण करने का मौका मिल गया। निश्चित रूप से यह शान्ति प्रक्रिया के लिये बड़ा झटका है।
……हमारी ये बातें चल ही रही थीं कि मुझे ढूँढने भूपेन सिंह (आई.आई.एम.सी. में प्रवक्ता) और विजयवर्द्धन उप्रेती (पिथौरागढ़ में ई.टी.वी. के संवाददाता) वहीं पहुँच गये। वे हेम चन्द्र पांडे की गुमशुदगी को लेकर चिन्तित थे। मैं हेम को नहीं जानता था। एकाध बार भेंट हुई भी होगी तो याद नहीं है। लेकिन उसकी पत्नी बबीता ने कुछ वर्ष पूर्व बाकायदा ‘नैनीताल समाचार’ के लिये काम किया था और उसका छोटा भाई राजीव भी लगातार ‘समाचार’ से जुड़ा रहा है। राजीव ने ही पहले दिन फोन पर अपने बड़े भाई के नागपुर के लिये रवाना होने और फिर उसका मोबाइल स्विच ऑफ हो जाने की सूचना दी थी। भूपेन और विजयवर्द्धन चाहते थे कि मैं उस बैठक में शिरकत कर रहे लोगों के माध्यम से हेम का पता लगाने में मदद करूँ। संयोग से साईंबाबा के पास तेलुगू दैनिक ‘इनाडु’ का उस रोज का अंक था, जिसमें छपे आजाद के साथ के दूसरे शव को भूपेन और विजय ने हेम के रूप में पहचान लिया।
फिर तो माओवाद के समाधान के प्रयास के लिये की जा रही उस बैठक में दुःख, गुस्से और हताशा की लहर फैल गई।
उसी शाम हमने दिल्ली के प्रेस क्लब के लॉन में एक प्रेस कान्फ्रेंस की, जिसमें डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, डॉ. बनवारी लाल शर्मा, जी.एन. साईंबाबा और मेरे अतिरिक्त बबीता भी शामिल हुई। हम लोगों ने आजाद की हत्या के कारण पटरी से उतरी शांति प्रक्रिया पर चिन्ता जाहिर करते हुए केन्द्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने, शांति प्रक्रिया अविलम्ब पुनः शुरू करने तथा आजाद और हेम की हत्या की उच्चस्तरीय जाँच की माँग करते हुए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। लेकिन मीडिया का ध्यान अपने पति की हत्या से स्तब्ध और शोकाकुल बबीता पर ही केन्द्रित था। इसे बबीता का असाधारण साहस ही कहा जायेगा कि उसने उस विषम परिस्थिति में भी अपने आप को सम्हाल कर पत्रकारों के टेढ़े-मेढ़े सवालों का अच्छी तरह जवाब दिया। लेकिन यह जान कर कोफ्त हुई कि अगले दिन मीडिया में इस प्रेस कांफ्रेंस का बहुत ही कम कवरेज था और जितना था, उसमें भी नकारात्मक अधिक था। मीडिया का चरित्र भारत में सर्वत्र जन विरोधी है!
5 जुलाई की रात बबीता और राजीव पांडे हैदराबाद पहुँचे। 6 जुलाई को आदिलाबाद जिले के बेलामल्ली नगर के एक अस्पताल में पड़े हेम के शव को लाने से पूर्व इन लोगों ने आंध्र पदेश की गृहमंत्री सबिता इन्दिरा रेड्डी से भेंट कर हेम के पत्रकार होने के प्रमाण प्रतुत किये और इस हत्या की उच्चतरीय जाँच की माँग की। रेड्डी ने इस बारे में कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। न ही उन्होंने हेम के शव को सरकारी व्यय पर दिल्ली पहुँचाने की माँग स्वीकार की।
यह खर्च हैदराबाद के कुछ पत्रकारों ने वहन किया। 6 जुलाई को हैदराबाद में दर्जनों पत्रकारों ने हेम के शव के साथ प्रदर्शन किया। उसका शव बशीरबाग के प्रेस क्लब में रखा गया। दिल्ली में हेम का शव स्वामी अग्निवेश की जंतर-मंतर स्थित कोठी में रखा गया। 7 जुलाई को निगमबोध घाट पर उसका अन्तिम संस्कार किये जाने से पूर्व दिल्ली के पत्रकारों ने भी एक शोक सभा की, जिसमें अन्य लोगों के साथ स्वामी अग्निवेश, डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा और अरुंधती रॉय भी शामिल हुए। सभा में वक्ताओं ने हेम की हत्या की कड़े शब्दों में आलोचना की। पहले शव को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को दान किये जाने की बात थी, किन्तु संस्थान ने पोस्टमार्टम किये हुए शव को लेने से इन्कार कर दिया।
9 मई की शाम स्वामी अग्निवेश ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से भेंट कर आजाद और हेम की हत्या की जाँच की माँग की। लेकिन चिदम्बरम ने इसे आंध्र प्रदेश का मामला बतलाते हुए पल्ला झाड़ लिया।
इस तरह एक प्रखर और प्रतिभाशाली पत्रकार, जिसका वामपंथी रुझान स्पष्ट था, के जीवन का अन्तिम अध्याय समाप्त हुआ….


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