छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ के शंकर गुहा नियोगी मजदूर, किसान और बुद्धिजीवी की एकता के प्रबल समर्थक थे। इसी कारण दल्ली-राजहरा का संघर्ष देश के विभिन्न क्षेत्रों के समर्थन से आगे बढ़ा। नियोगी इस लड़ाई में बलिदान हो गये, लेकिन देश में चल रहे बदलाव के आन्दोलन में उन्होंने हमेशा के लिये अपना स्थान बना लिया। इन दिनों हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर द्वारा 19 वर्ष पूर्व रुचिका गिरहोत्रा नामक एक नाबालिग लड़की को आत्महत्या के लिये मजबूर करने पर सिर्फ छः माह की सजा दिये जाने से जज, नेता, नौकरशाही, पुलिस और जाँच एजेंसियों के गठजोड़ पर जनता का आक्रोश दिखाई दे रहा है। सच्चाई यह है कि यदि रुचिका की सहेली आराधना के पिता आनन्द प्रकाश ने हिम्मत के साथ यह लम्बी लड़ाई न लड़ी होती तो घटना के समय गूँगे हो चुके मीडिया को इस वक्त गला फाड़ कर चिल्लाने का मौका नहीं मिलता।
21 साल पहले इसी तरह पौड़ी नगर में शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी ने जुझारू पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या कर उसकी लाश गायब कर दी। इस शराब माफिया का उस वक्त पौड़ी में इतना आतंक था कि उसके खिलाफ कोई चूँ तक नहीं कर सकता था। मगर उमेश की हत्या राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारों का मुद्दा बनी और आज भी उमेश की शहादत मनाने के लिये हर साल उत्तराखंड के पत्रकार तथा संस्कृतिकर्मी 25 मार्च किसी एक स्थान पर एकत्र होते हैं।
उमेश डोभाल की हत्या को इतना बड़ा मुद्दा बनाने वाले राजेन्द्र रावत ‘राजू’ भी अब हमको छोड़ कर चले गये हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि राजू नहीं होता तो न पौड़ी में कोई आन्दोलन खड़ा होता और न बाहर से उस आन्दोलन को कोई मदद मिलती। एक लापता पत्रकार के रूप में उमेश डोभाल का नाम भी अब तक मिट चुका होता। यह लड़ाई लड़ना पत्रकारों के बूते की बात नहीं थी….।
राजू रावत मूलतः पत्रकार नहीं था, एक ट्रेड यूनियन नेता था। हमारा रिश्ता भी उमेश, राजू और ओंकार बहुगुणा से पत्रकारिता का नहीं, जन सरोकार का था। ये सभी उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी से जुड़े थे। इसीलिये जब उमेश की हत्या की खबर अल्मोड़ा पहुँची, मैं पौड़ी के लिये चल पड़ा। 2 अप्रेल को इस हत्या के विरोध में पौड़ी में एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। चूँकि उमेश की लाश ही नहीं मिली थी, अतः विश्वास के साथ यह कहना भी मुश्किल था कि उसकी हत्या की गई है।
1 अप्रेल की शाम जब मैं पौड़ी पहुँचा तो वहाँ जबर्दस्त सन्नाटा था। परिचितों को ढूँढा तो कोई नहीं मिला। कुछ जाने-पहचाने चेहरे दूर से ही देख कर खिसक गये। आज के मुख्यमंत्री के अखबार के दफ्तर में पहुँचे तो वहाँ ताला पड़ा था। बाद में पता चला कि उन स्थितियों से बचने के लिये वे नगर से बाहर चले गये हैं। अन्ततः नगर से दो किमी. दूर अल्मोड़ा के रहने वाले एक जूनियर इंजीनियर ने रहने के लिये जगह दी। इन मित्र ने ही पौड़ी नगर में शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी के आतंक के बारे में बतलाया। पता चला कि वह कांग्रेस का नेता भी है और चूँकि कांग्रेस उन दिनों एकमात्र ताकतवर पार्टी थी, अतः राजनैतिक रूप से भी उसका कोई विरोध नहीं था। यह भी सूचना मिली, जैसा प्रायः होता है, कि छात्रसंघ भी शराब माफिया के साथ खड़ा है। मैं चिन्ता में पड़ा कि इन हालातों में इस हत्याकांड को लेकर कोई आवाज उठेगी भी तो कैसे ? अगले दिन सुबह तक सारा पौड़ी नगर मनमोहन सिंह नेगी के पक्ष में ‘राजपूत संगठन’ के पोस्टरों से पट चुका था। कोई दीवार खाली नहीं बची थी। प्रदर्शन के लिये हम मुठ्ठी भर पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, जिनमें रमेश पहाड़ी, धर्मानन्द उनियाल ‘पथिक’, उमाशंकर थपलियाल ‘समदर्शी’ और मोहनसिंह ‘ग्रामवासी’ के नाम ही मुझे इस वक्त याद आ रहे हैं, ही वहाँ थे। उधर ‘सन एंड स्नो’ होटल, जहाँ उमेश की हत्या की गई थी, बाहर से आये भाड़े के गुण्डों से भरा पड़ा था। हमारे लोगों की राय थी कि इतनी कम संख्या में जलूस निकालना फिजूल है। दरअसल सभी लोग अपनी और शराब माफिया की तुलनात्मक शक्ति से आतंकित थे। हम लोग ताज्जुब में थे कि राजेन्द्र रावत ‘राजू’ और ओंकार बहुगुणा आदि कहाँ छिपे हैं!
हम किंकर्तव्यविमूढ़ थे कि तभी देखा कि ग्रामीणों का एक विशाल जलूस नारे लगाता हुआ आ रहा है। आगे-आगे राजू रावत और ओंकार हैं। इस जलूस का दिखाई देना था कि हम लोगों की निराशा काफूर हो गई। फिर तो पौड़ी नगर में जबर्दस्त जलूस निकला। ‘सन एंड स्नो’ होटल में एकत्र गुंडों और उनके इशारे पर काम कर रहे पुलिस अधीक्षक का साहस कुछ करने का नहीं हुआ। पौड़ी शहर के लोग भी एक-एक, दो-दो करके जलूस में जुड़ते गये और जलूस का आकार बढ़ता गया। शहर में फैला आतंक टूट गया, लेकिन पूरी तरह नहीं। मुझे याद है कि उक्रांद के एक नेता, जो आजकल मंत्री हैं, मुझसे कह रहे थे, मनमोहन सिंह नेगी के खिलाफ नारे नहीं लगने चाहिये, डी.एम. और एस.पी. के खिलाफ लगने चाहिये। रामलीला मैदान में हुई विशाल जनसभा में भी वक्ता माफिया का नाम लेने से कतराते रहे। सभा के बाद धर्मानन्द उनियाल ‘पथिक’ जी ने मुझसे कहा कि बिष्ट जी, आप श्रीनगर के रास्ते अकेले न जाइये। नेगी का खास गुण्डा बलदेव आपको घूर रहा है।
ऐसे दिनों में, जब बाहर से कुछ घंटों के लिये पौड़ी आये लोग भी घबरा रहे थे, राजू रावत इस आन्दोलन में लगातार चट्टान की तरह वहाँ डटा रहा और घटनाओं के केन्द्र में बना रहा। वह न होता तो आतंक के उस माहौल में आन्दोलन का टिकना सम्भव नहीं था। इसी कारण पौड़ी से बाहर उत्तराखंड और लखनऊ, दिल्ली तक भी आन्दोलन का विस्तार हुआ और एक जनधर्मी, संघर्षशील पत्रकार के रूप में उमेश डोभाल अमर हो गया। पौड़ी का आतंक वह माफिया आपस में ही लड़-मर कर समाप्त हो गया और मनमोहन सिंह की भी लाश कभी नहीं मिली।
यह एक प्रकरण राजेन्द्र रावत ‘राजू’ के साहस और सरोकार को बतलाता है। उसके व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। वह राजू हमें छोड़ कर चला गया। मैं उसे श्रद्धांजलि देता हूँ।
