बात कुछ दिनों पूर्व की है, जब घर-घर जाकर दो महिलाओं द्वारा घर के मुख्या व अन्य सदस्यों की सम्पूर्ण जानकारी एकत्रित की जा रही थी। एक-एक कर जब उनका हमारे घर आना हुआ तो पूछने पर मालूम हुआ कि बहुत जल्द खटीमा क्षेत्र में आंगनबाड़ी केन्द्र खुलने जा रहा है। इसके अन्तर्गत परिवारों की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है। सुनकर अच्छा लगा कि अब उन बच्चों को आसरा मिलने जा रहा है, जिनके माता-पिता के लिये अपने बच्चों को स्कूल भेजना तो दूर दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल है।
हमारे सहयोग को देखकर वे बहुत खुश दिखीं। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि कहने को लोगों ने बड़े-बड़े आलीशान मकान खड़े कर दिये हैं, लेकिन उनकी सोच में अब भी वही संकीर्णता देखने को मिलती है। मात्र गिने-चुने लोग होंगे जो इस बात को सुनकर खुश होंगे या सहयोग की भावना को व्यक्त किया होगा। वर्ना…. कई लोगों ने यह तक कहा कि हमें भला इन योजनाओं से क्या लाभ है ? आखिर हमारे पास ‘भगवान का दिया सब कुछ है। भला हमें इसकी क्या जरूरत है ?’ कई लोगों ने अभी समय नहीं है, कहकर बहाना कर दिया।
सोचने वाली बात है कि क्या यह वही समाज है, जिसका हम भी एक अभिन्न अंग हैं। क्या हम अपने घर के जलने का इंतजार करेंगे ? जब कोई चिंगारी हमारे छत पर गिरेगी, तभी हम बचाव करेंगे या तभी सहयोगात्मक रवैया अपनायेंगे। आज का मनुष्य यह नहीं सोचता कि इस तरह का रवैया उसे खुद गर्त में डाल रहा है। आखिर कब तक कहेंगे…..भगवान का दिया सब कुछ है। किसी ने सच ही कहा है कि, ‘राजा कब रंक बन जाय और रंक कब राजा बन जाय, किसी को नहीं मालूम’। इसलिये उठो व अपने भीतर के इन्सान को जगाओ और मदद के लिए आगे बढ़ो।
इन्द्रा बिष्ट, खटीमा (उधमसिंह नगर)