हिमालय, बर्फ, जंगल और पानी उत्तराखंड की शान हैं। लेकिन जैसे औरत की खूबसूरती कई बार उसके लिये अभिशाप हो जाती है, उसी तरह हमारी ये निधियाँ भी हमारे लिये संकट का कारण बन गई हैं। एक ओर हमारी सरकार ‘ग्रीन बोनस’ की माँग कर रही है कि जिस तरह कुम्भ या आपदा के बहाने भारी भरकम धनराशि ठिकाने लगी थी उसी तरह इस राशि से भी राजनीति की आड़ में पल रहे ठेकेदारों की पौ बारह हो सके; दूसरी ओर इस जंगल और पानी पर बाहरी कुदृष्टि पड़ने से यहाँ के निवासी त्राहि-त्राहि करने लगे हैं। नदियों के बहते पानी से बिजली बनने की असीम सम्भावनायें देख कर बाहरी कम्पनियाँ यहाँ टूट पड़ी हैं और ग्रामीण जगह-जगह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को विवश हैं। वहीं अभयारण्यों तथा टाइगर व बायोस्फेयर रिजर्वों से ग्रामीणों की दैनंदिन जिन्दगी चौपट हो गयी है। और तो और, हजारों सालों से साथ-साथ इन जंगलों में रहे जानवर भी अब मनुष्य के दुश्मन बन गये हैं।
अभी 23 मार्च को एक गुलदार को जिंदा जलाने के बाद से पौड़ी जिले के रिखणीखाल ब्लॉक का धामधार गाँव देश भर में कुख्यात हो गया है। पिंजरे में कैद गुलदार को जिंदा जलाने के आरोप में धामधार के मनवर सिंह, कृष्ण कुमार, विमला देवी, कुमाल्डी गाँव के नरेन्द्र कुमार, झर्तग्राम की विष्णु देवी, ढिकोलिया के विक्रम सिंह व खदरासी गाँव के विजय सिंह वन्यजीव जंतु संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 9,52,53 तथा भा. द. सं. की धारा 147, 333 व 352 के तहत जेल में हैं। निचली अदालत के बाद जिला अदालत से भी इनकी जमानतें खारिज हो चुकी हैं। बताते हैं कि क्षेत्रीय विधायक व पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ग्रामीणों से स्पष्ट कह गये कि ‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे’। पर्यावरणप्रेमी जंगली जानवरों को नुकसान पहुँचाने वालों को मौके पर ही गोली मार देने का कानून बनाने की वकालत कर रहे हैं। मगर वे इस वीभत्स घटना के कारणों को जानने-समझने के लिए तैयार नहीं हैं।
घटनास्थल का दौरा करने के बाद ‘नागरिक’ के सम्पादक मुनीष कुमार ने बताया है कि धामधार क्षेत्र में गुलदार का आतंक पिछले कुछ माह से बना हुआ है। गुलदार ग्रामीणों के कई मवेशियों को मार चुका है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद भी वन विभाग ने गुलदार को पकड़ने अथवा मारने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की। 22 मार्च,11 को शाम 5 बजे गुलदार धामधार निवासी शेखरचन्द्र की गौशाला में घुस गया। ग्रामीणों ने दरवाजा बंद कर ताला लगा दिया तथा चाबी 3 किमी दूर रघुवाढाव तक पैदल जाकर रेंज अधिकारी को सौंप दिया तथा गुलदार को पकड़ने का निवेदन किया। रात्रि लगभग 10 बजे रेंज अधिकारी पाण्डे व अन्य वन्य कर्मचारी मौके पर पहुँचे। उन्होंने आतंककारी गुलदार को पिंजरे में कैद करने की जगह उसे गौशाला का ताला खोलकर खुला छोड़ दिया। धामधार निवासी हेमलता ने बताया कि रेंज अधिकारी ने इस दौरान उनसे कहा कि हम गुलदार को छोड़ रहे हैं, तुम अपने घोड़े अन्दर बाँध लो। पाँच घंटे से बंद गुलदार खुला छूटने पर जंगल में नहीं गया, बल्कि गाँव के भीतर ही आतंक मचाने लगा। कुछ देर में उसने गजे सिंह (उम्र 60 वर्ष) तथा यशपाल सिंह (उम्र 32 वर्ष) को हमला कर घायल कर दिया। अगले दिन सुबह उसने भारत सिंह को भी बुरी तरह घायल कर दिया। फिर वह पुनः उसी गौशाला में घुसकर बैठ गया। आतंकित ग्रामीणों ने किसी तरह गौशाला को बाहर से बन्द किया और पुनः वन विभाग को सूचना दी। इस बार ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए वनाधिकारियों की गुलदार को खुला छोड़ने की हिम्मत न पड़ी और उन्हें उसे पिंजरे में कैद करना पड़ा। ग्रामीणों के अनुसार गुलदार को पकड़ने के बाद रेंज अधिकारी ने कहा कि हम यदि इसे कानपुर चिडि़याघर भेजते हैं तो वहाँ पर हमसे गोश्त के लिए पैसे माँगे जाते हैं, तब हमें इन्हें लाकर पुनः जंगल में छोड़ना पड़ता है। इस बार भी हमें इसे यहीं कहीं जंगल में छोड़ना होगा। यह सुन कर आतंकित ग्रामीण बुरी तरह गुस्सा गये और उन्होंने गुलदार को जला दिया। उस वक्त, वन अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की।
ऐसे हालात में धामधार के उन ग्रामीणों को कितना दोषी माना जाये ?
पिछले कुछ महीनों में रामनगर के निकट स्थित सुन्दरखाल गाँव चर्चा में रहा है। पिछली बरसात में हुई जबर्दस्त तबाही के बाद यहाँ के निवासी राहत के साथ अपने ‘वन ग्राम’ को ‘राजस्व ग्राम’ घोषित किये जाने की माँग कर रहे थे कि तेंदुए ने वहाँ की दो औरतों को मार डाला। अब भारत का वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सुन्दरखाल के निवासियों को खदेड़ने पर आमादा है। इसके लिये 65 करोड़ दिये गये हैं और वहाँ के साढ़े चार सौ परिवारों से कहा जा रहा है कि दस लाख रुपया प्रति परिवार लो और यहाँ से दफा हो जाओ। ग्रामीणों के प्रतिरोध को दबाने के लिये कभी अमेरिका से टाइगर विशेषज्ञ बुलाये जा रहे हैं तो कभी किसी स्थानीय एन.जी.ओ. को उन्हें बरगलाने के काम में लगाया जा रहा है। मजेदार बात यह है कि डी.जे. बजा कर जबर्दस्त प्रदूषण फैलाने वाले कॉर्बेट सीमा से लगे होटल मालिक तथा जानवरों का गोश्त फेंक कर पर्यटकों के आगे टाइगर बुलाने वाले गाईड भी पर्यावरण के नाम पर इस मुहिम में शामिल हो गये हैं।
कुल मिला कर जंगल के नाम पर एक बहुत खतरनाक खेल उत्तराखंड में खेला जा रहा है….