तडि़त घिल्डियाल
उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार का ख्याल है कि प्रदेश का विकास जगह-जगह जल विद्युत योजनायें बनाकर ही हो सकता है। 24 हजार मेगावाट की क्षमता हासिल होने से यह प्रदेश आत्मनिर्भर हो सकता है। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये सरकार किसी भी सीमा तक जाने को तैयार बैठी है। यहाँ तक कि अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी तथा विवादास्पद अतीत वाले पद्मश्रीधारी तक इस अभियान में झोंक दिये गये हैं।
बाँधों से समृद्धि आना सिर्फ मुंगेरीलाल का हसीन सपना है। पाँच साल में 2,000 मेगावाट की चार योजनाओं, टिहरी, मनेरी भाली, धौलीगंगा व कोटेश्वर के बनने से कुछ नहीं हुआ तो लोहारीनाग-पाला, पाला मनेरी व भैरोघाटी योजनाओं, अलकनन्दा पॉवर प्रोजेक्ट श्रीनगर, विष्णुगाड़-पीपलकोटी योजनाओं से ही क्या चमत्कार हो जायेगा ? इनमें से श्रीनगर योजना, यदि वह पर्यावरणीय मानकों पर खरी उतरती है, पर एक साल का काम बचा है। पीपलकोटी पर दो साल का काम है। लोहारीनाग पाला यदि बनेगी भी तो चार साल कम से कम उसमें लगेंगे। बाकी दो को बनने में दस साल लगेंगे। क्योंकि ये येाजनायें अपनी घोषित क्षमता के अनुसार बिजली पैदा नहीं कर पा रही हैं, इसलिये उनके बनने से बहुत फर्क नहीं होगा। कारण राज्य में बिजली की माँग है, जो 15 से 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इनमें से अधिकतर योजनायें राज्य सरकार की हैं ही नहीं और नदियों में पानी की कमी के कारण मार्च से जून के मध्य मात्र 25 प्रतिशत क्षमता पर ही कार्य कर पाती हैं। ऊर्जा की जरूरत तभी पूरी हो सकती है, जब परियोजनाओं की सारी उत्पादित बिजली राज्य को मिले। मगर यह संभव ही नहीं है। दूसरी ओर, राज्य सरकार का खजाना खाली है और वह अपने बूते इन्हें बना नहीं सकती। ऐसे में कई योजनायें या तो पी.पी.पी. मोड में बन रही हैं या फिर उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के टी.एच.डी.सी., एन.एच.पी.सी. या एन.टी.पी.सी आदि बड़े निगम बना रहे हैं। ये जब पैसा लगायेंगे तो बिजली भी बेचेंगे और राज्य को मात्र 12 प्रतिशत बिजली मुफ्त देंगे। इनमें भी पी.पी.पी. मोड बेहतर माना जाता है, क्योंकि बनाने से लेकर बेचने व मुआवजा देने तक का सारा सिरदर्द पूँजीपति का ही होता है। टिहरी बाँध में तो टी.एच.डी.सी. ने इसे बनाने में 25 साल लगा दिये।
80 प्रतिशत बन चुके श्रीनगर बाँध को रोकना एक दृष्टि से उचित नहीं लगता। यह पूरा इलाका उजड़ तो चुका ही है। सामान्यतः लोग कहते हैं कि इससे पर्यावरण नष्ट तो हो ही गया, मगर जब सर ओखली में दे ही दिया तो मूसल को चलने ही दो। लेकिन परियोजना पूरी होने के बाद जब 14 किमी लम्बी झील बनेगी, तब पता चलेगा कि कल-कल बहती नदी अच्छी थी या यह झील। यह बाँध बना तो पौड़ी व टिहरी जिले की एक बड़ी आबादी के समक्ष रेत व पत्थरों की समस्या भी आयेगी, क्योंकि नदी का स्वाभाविक प्रवाह रुकने से बहकर आने वाले पत्थरों का आना पूरी तरह से बन्द हो जायेगा। इसमें अभी से ही तंगी दिखने लगी है। बाँध बनने पर नदी का बरसात में तेज व स्वभाविक प्रवाह न होने से सिल्ट बाँध में पहले ही रुक जायेगी। इसलिये धोबीधाट व श्रीकोट के समीप मिलने वाली रेत बहुत कम हो सकती है। इसलिये तब निर्माण सामग्री के लिये अधिक समय व पैसे चुकाने होंगे। इससे श्रीनगर में अवैध खनन बढे़गा और एक नया माफिया पैदा होगा। नदी में पत्थर न मिलने का असर मृतक के अन्तिम संस्कार पर भी होगा। बाँध बनने पर अलकनन्दा एक नाला बन कर रह जायेगी। पानी में कोलीफार्म बैक्टीरिया बढ़ जायेगा। पीलिया की शिकायत बढ़ सकती है।
टिहरी बाँध के लिये 85 हजार लोग अपनी माटी से बेदखल हुए। एक भरी-पूरी संस्कृति डूब गई। टिहरी के आसपास की जिन्दगी आज नर्क बन चुकी है। उनकी आज कोई नहीं सुनता। एक ओर से दूसरी तरफ जाने के लिये मीलों का चक्कर। शवदाह करने के लिये कई किमी की यात्रा करनी होती है। झील में कब कौन डूब जाये पता नही ? न आसपास रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं और न गाँवों को नियमित बिजली मिलती है।
परियोजनाओं के पक्ष में हाहाकार करने वाले बाहरी लोगों को हस्तक्षेप न करने की चेतावनी देते हैं। उत्तराखंड का मूल निवासी है कौन ? ज्यादातर लोग दूसरे इलाकों से ही यहाँ पर आये। विजय बहुगणा खुद को बंगाली बताने से नहीं चूके। भारत एक है और हिमालय उसका अभिभावक है। हिमालय न रहा तो नदियाँ कहाँ रहेंगी ? जितनी बिजली बन भी रही है वह भी नहीं बनेगी। लेकिन इंजीनियर इस बात को नहीं देखते। जब दो-चार बाँध बन गये तो वे कहेंगे कि रुद्रप्रयाग, चमोली, कर्णप्रयाग सब जगह बाँध बनने चाहिये। बिजली की हवस कभी कम न होने वाली, चाहे हिमालय रहे या न रहे।
अब पर्यावरण की परवाह किसी को नहीं है। पर्यावरण की आवाज उठाने वाला दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता। एक समय था, जब सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और खड्ग सिंह वल्दिया जैसे लोग एक जैसी बात करते थे। उन्होंने ही सबसे पहले हिमालय के पर्यावरण का पाठ पढ़ाया था। हिमालय में छेड़छाड़ का उन्होंने आरम्भ से विरोध किया था। अब वे बोलते-लिखते थक चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद भी राज्य में 557 बिजली परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं। पर्यावरण को लेकर काम कर रहे हजारों संगठन और अनगिनत सरकारी पर्यावरण संस्थानों के सफेद कालर वैज्ञानिक धृतराष्ट्र की तरह मौन हैं। अवैज्ञानिक तरीके से बन रही विकास योजनाओं से लेकर जलते जंगलों के मुद्दे पर उनकी खामोशी खतरनाक है। के. एस. वल्दिया या एन.डी. जयाल जैसा उनके बाद कोई नहीं निकल पाया। निर्वाचित जन प्रतिनिधियों में भी प्रदीप टम्टा के अलावा सारे लोग गूँगे बने हैं।
पहाड़ के विकास की कीमत हमेशा पहाड़वासियों ने ही चुकाई। राज्य बना भी तो क्या हुआ ? न राजधानी मिली न पलायन रुका, न रोजगार के अवसर ही मिले और न खेती ही पटरी पर आई। जब बरसात आती है तो यहाँ के निवासियों की साँसें अटक जाती हैं। कब, कहाँ कच्चे पहाड़ धँस जायें। डबरानी के धँसाव के कारण आई बाढ़ को शायद हम भूल चुके हैं। उत्तरकाशी के भूकम्प को भी हमने भुला दिया है। वरुणावत जैसे सदियों पहले की बात हो गई है। खतरा देहरादून में बसने वाले भाग्यविधाताओं के लिये तो है नहीं, खतरा तो पहाड़ को ही झेलना है।
यहाँ के बाँध कितनी बिजली पैदा करने में सक्षम हैं ? एक रन आफ रिवर के बाँध से कितना स्थाई रोजगार मिलता है ? तीस, चालीस। इतना तो दो इन्टर कॉलेज खोलने से मिल जाता है। और बाँध बनने के बाद रुकते कौन हैं ? मुआवजा पाने के बाद सब बाहर चले जाते हैं। कारोबार तो कोई भी विकसित नहीं होता है। टिहरी बाँध के आसपास कौन सा उद्यम विकसित हुआ ? धरासू में कौन सी इन्डस्ट्री लगी ? मनेरी फेज-2 पूरा होते समय लगता था कि राज्य में अब सरप्लस बिजली हो गई है। लेकिन फिर कमी होने लगी है। जब सब जगह बाँध बन जायेंगे तो फिर क्या होगा ? राजधानी बनने, बाँधों के कारण हो रहे विस्थापन, उचित कृषि नीति के अभाव तथा पहाड़ की घोर उपेक्षा के कारण हो रहे पलायन से देहरादून भी बर्बाद हो रहा है। वहाँ जगह-जगह कंक्रीट के जंगल उग गये हैं। यही बात उधमसिंह नगर में है। विकास की बात करने वाले खेती की बात भी करें। एक समय पहाड़ के लोग स्वयं अन्न उगाते थे। लेकिन आज खेती पर ध्यान न देने व भूमि प्रबन्धन न होने के कारण लोग खेती को छोड़ने को मजबूर हैं। यहाँ के लोगों ने कितनी मेहनत से इन खेतों को बनाया होगा ? इन परियोजनाओं से जमीन बर्बाद होती है, कंपनियाँ अपने पैसे से लोगों में फूट डालती हैं। पहाड़ में नदी किनारे ही अच्छी जमीन है। उसमें से सबसे ज्यादा बर्बादी होती है। गौचर, नैनी सैनी व चिन्यालीसौड़ की हवाई पट्टियों की बात क्यों नहीं होती ? कितना रोजगार मिल सका उनसे ? कितने हवाई जहाज आ रहे हैं ?
खेती एक दीर्घकालिक व पर्यावरण सम्यक रोजगार है। इसलिये हिमालय को हिमालय ही रहने दें। हिमालय रूठेगा तो देश टूटेगा। पर्यावरण बरबाद होगा तो करोड़ों लोगों को उसकी कीमत चुकानी होगी। इसलिये आबादी सीमित रखें और खपत कम करें। राज्य को ग्रीन बोनस मिले ताकि विकास के कारण जो कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जित हो रही है, उसे यहाँ के जंगल अवशोषित कर सकें। परियोजनाओं द्वारा पैदा की गई ‘विकास’ और ‘रोजगार’ की मृग मरीचिका में भटकने से क्या मिलेगा ?