कैसी विडम्बना है कि जिस बरसात को खुशहाली का कारण माना जाता था, उसे बरसात को हमारी सरकारों के गैर जिम्मेदारी और नाकारेपन ने आपदा और भय का प्रतीक बना दिया है। पहले बरसात शुरू होने पर लोग खुश होते थे कि चलो चारों ओर हरियाली का साम्राज्य होगा और धरती में पानी की मात्रा बढ़ने से पेयजल और सिंचाई की सुविधायें बढ़ेंगीं।
तीन दशक पहले 15 जून के लगभग मानसून के साथ वर्षा शुरू हो जाती था और जुलाई व अगस्त में जमकर पानी बरसता। मगर किसी को कोई परेशानी या शिकायत नहीं होती थी। बारिश यदि दो दिन से ज्यादा लगातार होने लगे तो आमा कहती थी, लगता है सतझड़ पड़ने वाले हैं, अर्थात लगातार सात दिन तक बारिश होने वाली है। आमा का पूर्वानुमान किसी मौसम विज्ञानी से ज्यादा सही होता था और बारिश सातवें दिन ही बंद होती थी। इस दौरान जनजीवन जरूर ठहर सा जाता था, जो घर कभी नहीं टपकता था, वह टपकने लगता, लेकिन इसके बावजूद किसी के मुँह से यह नहीं सुनाई देता था कि बारिश ने आफत करके रख दी या बारिश बंद हो जाये तो ठीक ही रहता। घरों के भीतर भी सतझड़ का आनन्द भुट्टे, चने, चावल व मक्का को भूनकर उन्हें खाने के साथ उठाया जाता। हाँ, नदियों, नालों और रौखड़ों के किनारे बसे परिवारों को जरूर अपने खेतों के कटान की चिंता रहती थी। यदि किसी की फसल या खेत बर्बाद भी हो गए तो भी वह दो-चार सौ रुपये के मुआवजे के लिए दौड़-भाग करता नहीं दिखाई देता था।
अब उल्टी गंगा बहने लगी है। हमारी सरकारों ने बरसात के मौसम को आपदा का मौसम बना दिया है, जिसके शुरू होते ही लोग चिंता और भय में डूब जाते हैं। सड़कें पहले भी बननी थीं, लेकिन उनमें भूस्खलन इतना नहीं होता था। सतझड़ पड़ने के बाद भी सड़कें खुली रहती थीं। आज सड़कों को चौड़ा करने के दौरान कार्यदायी संस्थाएँ सारे मानकों को ताक पर रखकर भारी विस्फोटको का अनियंत्रित प्रयोग कर रही हैं, जो भूस्खलन का बड़ा कारण बन रही हैं। पारम्परिक मकानों के बदले पहाड़ों में सीमेंट, कंक्रीट के जो मकान अब बन रहे हैं उनकी बुनियाद खोदते समय यह नहीं देखा जाता है कि क्या उसके नीचे ठोस चट्टान है। भुरभुरी मिट्टी वाले पहाड़ों में भूस्खलन होने से मकान गिर रहे हैं। आबादी से बहने वाले नदी, नालों, गाड़-गधेरों पर मनुष्य ने अपने अतिक्रमण कर दिया है। स्वाभाविक है कि बरसात में पानी बढ़ेगा तो वह नुकसान करेगा। पानी के बहने के लिए रास्ता ही नहीं होगा तो वह घरों में ही तो घुसेगा! जरूरत बरसात को कोसने की नहीं, अपितु नदी-नालों से अतिक्रमण हटाने और पहाड़ों में निर्माणकार्य करते समय उसकी संवेदनशील प्रकृति को समझने की है। यदि ऐसा करते हैं तो बरसात आपदा नहीं बनेगी और यदि ऐसा नहीं करते हैं तो बरसात हर वर्ष आपदा ही बनी रहेगी और राहत राशि का लूटतंत्र जारी रहेगा। प्रभावितों के हाथ में राहत नहीं, बल्कि आँसू ही आयेंगे!