परम श्रद्धेय निशंक जी,
आपके मुख्यमंत्री बनने के बाद से मन बहुत दुःखी है। कारण यह कि जिन समस्याओं को लेकर हम बाकी मुख्यमंत्रियों की खिंचाई कर लेते थे, वह अब करना संभव नहीं है। एक तो बड़े भाई, ऊपर से कवि, साहित्यकार, रचनाकार, पत्रकार भी……। जो भी अंधेरगर्दी उत्तराखण्ड में हो रही है, उसके जिम्मेदार आप कतई नहीं हैं। क्योंकि आप राजा हैं और राजा का काम सिर्फ राज्य करना होता है। यह प्रसन्नता की बात है कि अब तक हमारे प्रदेश में राजा कोई बाहर से आकर नहीं बना।
विगत 10 अगस्त 2011 को कुमाऊँ विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में कवरेज के लिए मैं इसलिये आया, क्योंकि यह मेरी अपनी यूनीवर्सिटी का आयोजन था। मैं 9 अगस्त की शाम को ही अपने भतीजे लवजीत के साथ नैनीताल के लिए रवाना हो गया था, क्योंकि एक साधारण वाहन से पहाड़ पर जाने और हेलीकाप्टर से जाने में फर्क होता है। कालाढूँगी के रास्ते नैनीताल में प्रवेश करने पर नगरपालिका के चुंगीकर्मियों द्वारा जिस तरह के अभद्र शब्द सुनने को मिले, मुझे नहीं लगता है कि कोई भी पर्यटक नैनीताल आने के बाद खुशी भरी यादें समेट कर घर लौटता होगा। छात्र महासंघ में सचिव रहते हुये अधिकतर समय नैनीताल में ही गुजरा था, उस समय काफी अच्छा माहौल था। लेकिन अब तो इस पर्यटन नगरी में भी गुण्डागर्दी के अलावा कुछ नहीं बचा है। खैर, बाद में मित्रों ने समझाया कि भाई हम तो यहाँ रोज ही यह गुण्डागर्दी झेल रहे हैं।
अगले दिन, 10 अगस्त को हम डीएसबी कैम्पस पहुँचे तो 11 साल बाद अपने गुरुजनों से मिल कर दिल प्रसन्न हो गया। कार्यक्रम इतना अच्छा था कि सारी पीड़ा चली गयी, पर दिल में अगर जख्म हो जाये तो जल्दी नहीं भर पाता। खैर, अपने भाषण में आपने जो कुछ कहा, वह एक कविता की भांति था और सुनने में काफी अच्छा लग रहा था। जबकि उच्च शिक्षा की उत्तराखण्ड में क्या हालत है, यह किसी से छिपा नहीं है।
आदरणीय मुख्यमंत्री जी आप इस कार्यक्रम की शान थे। कवरेज करना हमारी भी ड्यूटी थी। अपनी पीड़ा कहना चाह रहा था कि आप नैनीताल क्लब के लिए निकल गये। ड्राईवर को फोन किया तो पता चला कि जब तक मुख्यमंत्री जी नैनीताल में हैं, तब तक कोई भी गाड़ी इधर से उधर नहीं जा सकती। तब मुझे एहसास हुआ कि हमारे बड़े भाई की वैल्यू क्या है ? शायद आपको आभास नहीं होगा कि आपके नैनीताल में रुके रहने से आम जनता को कितनी परेशानी हुयी। आप बड़े भाई हैं, जन-जन के हृदय में हैं सो आगे से जनता का ध्यान रखें।
काफी बार कोशिश की कि आपसे मिलकर अनेक सारी बाते बताऊँ, आपको नेक सलाह दूँ, परन्तु आपके इर्द गिर्द का कॉकस ! यह पत्र इस लिए लिख रहा हूं कि आपसे मिलने का टाईम नहीं मिल पायेगा और जनकवि गिरदा ने हमें खुला-खुला बोलना सिखाया है। उम्मीद है कि इस पत्र को पढ़कर आप मेरे पैसे चुंगी वालों से वापिस करवा देंगे। आप अत्यन्त सहिष्णु, उदार हृदय साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते दिल दुखने का अर्थ तो समझते ही होंगे….
प्रेम अरोड़ा, काशीपुर से