होली अंक में शम्भू जी की तरंग कुछ ज्यादा ही वल्गर हो गयी। ऐसा लगा पढ़कर कि वे उत्तराखंड के सोद्देश्य पाक्षिक
में न लिखकर अपने चौकड़ी के चार यारों को अपने दिनों का किस्सा सुना रहे हों। चलो, फिर लिखने वाले ने लिख दिया। मगर समाचार का एक सम्पादक भी तो है। उसकी भूमिका ? अब शायद कुछ लोग यह कहें कि ‘आधा गाँव’ में भी तो राही मासूम रज़ा ने बहुत सी गालियाँ लिखी हैं। मगर ‘नैनीताल समाचार’ एक अखबार है, जिसका विशेष पाठक वर्ग न होकर उसका प्रत्येक अंक हमारे परिवार की धरोहर होता है। मेरे ही घर पर पत्नी व बेटी अकसर कहती हैं समाचार को पढ़कर सुनाओ। ऐसे में कोई क्या सुनाये ? ‘नैनीताल समाचार’ से पूरे परिवार का लगाव है। सभी सदस्य उसे पढ़ते हैं। मैं उसे रजाई में छुपाकर तो पढ़ नहीं सकता किसी उपन्यास की तरह।
ऐसी चीजें समाचार में जाने से समाचार की व शम्भूजी की, दोनों की गरिमा कम हुई है। भविष्य में इससे बचा जायेगा
तो अच्छा लगेगा।
महेश बवाड़ी
हल्द्वानी
‘नैनीताल समाचार’ का होली विशेषांक मिला। पढ़कर खुशी हुई। होली के सामाजिक पक्ष को सामने रखते हुए जहाँ रामसिंह जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीं दूसरी ओर अरविन्द मुदगिल जी ने रंगों को दैनिक उपयोग की वस्तुओं से जोड़ते हुए आग उगलती महंगाई का बड़ा सुन्दर तुलनात्मक अध्ययन किया। यही नहीं ऐसे में शम्भू राणा जी कहाँ पीछे रहने वाले ? उन्होंने व्यंगात्मक शैली में अपने अनुभव (कड़ुवे और मीठे) जिस अंदाज में लिखा वह सराहनीय है। होली का आधुनिक स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। ऐसे मौके पर जहाँ छेड़छाड़ की घटनायें बढ़ रही हैं, वहीं लोग शराब पीकर एक दूसरे से झगड़ा करते हैं। यही नहीं, इससे समाज में अश्लीलता का विकास भी हो रहा है।
मनोज कुमार खोलिया
गरुड़, बागेश्वर
महेश बवाड़ी जी की बातों से बिल्कुल इत्तेफाक है।