घनश्याम विद्रोही
नये साल के लिए फिर शराब के टेंडर हो गए हैं। महिलाओं ने भी इस बार शराब बेचने के लिए अपने आवेदन लगाए थे। लेकिन यह आवेदन क्या उनकी मर्जी से लगे? या पुरुष प्रधान देश में महिलाओं की मर्जी के खिलाफ हुआ। शराब से सबसे अधिक महिलाएं ही प्रभावित रही हैं। चाहे वह बड़े घरों की हों या मध्यवर्गीय परिवारों से। शराबी पति, पिता, भाई तथा पड़ोसी के कोप का भाजन हो रही महिलाएं शराब की दुकानों के लिए आवेदन कैसे कर सकती हैं? यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है। अलबत्ता नाम किसी का हो, शराब के तस्करों को सिर्फ धन कमाकर उत्तराखंड के युवाओं को नेस्तानाबूंद जो करना है। सरकार भी बेचारी लाचार है। बिना शराब के उसके कारिन्दों की तनख्वाह तक नहीं निकल रही है। ऐसे में महिलाओं को चंडी, लक्ष्मीबाई तथा सावित्री बनकर अपने पिता, पति तथा भाई को इस भयंकर शराबरूपी बीमारी से बचाना होगा।
उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ जौन में 29 मार्च को नैनीताल जिले में 61, अल्मोड़ा में 36, बागेश्वर में 10, पिथौरागढ़ में 21, चंपावत में 15 जबकि उद्यमसिंहनगर में 90 शराब की दुकानों का आवंटन लाटरी पद्धति से हुआ।
नैनीताल में 1220 महिलाओं ने शराब की दुकान के लिए आवेदन किए। जिसमें नौ महिलाओं के नाम पर दुकानों का आवंटन हुआ। अल्मोड़ा में 61 महिलाओं ने भाग्य आजमाया एक के नाम लाटरी लगी। उद्यमसिंह नगर में 819 महिलाओं ने ओवदन किए जबकि पिथौरागढ़ में 44 महिलाएं, चंपावत में 57 तथा बागेश्वर में 15 महिलाओं द्वारा आवेदन किए गए थे। शराब की दुकानों के लिए महिलाओं के आवेदन में हर साल हो रहे इजाफे के बाद एक सवाल उठने लगा है जो महिलाएं शराब के खिलाफ थीं, वह आवेदन कैसे कर सकतीं हैं। इस पर सीधे तौर पर पुरुष प्रधान नीयत ही सामने आ रही है। इस बात पर कुछ महिलाओं से सीधे तौर पर संवाद भी स्थापित किया गया, तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया कि वे शराब के पक्ष में कभी भी खड़़ी नहीं हो सकती हैं, शराब से होने वाली अंधाधुंध कमाई को लेकर उनके पतिदेव ही उनके नाम की लाटरी डाल रहे हैं। शराब के लिए आंदोलन कर चुकी सामाजिक कार्यकर्ता तथा कई पुरस्कारों से सम्मानित नंदी भंडारी कहतीं हैं कि गलई में शराब की दुकान हटाने को लेकर जो संघर्ष उन्हें करना पड़ा, शायद ऐसा संघर्ष और कोई महिला नहीं कर सकती है। यदि महिलाएं एक मंच में आ गई तो पहाड़ से शराब जैसी बुराई को खत्म करने में समय नहीं लगेगा। मालूम हो भंडारी के नेतृत्व में चले आंदोलन में उन्हें सफलता मिली है। हालांकि गलई के नाम देशी शराब की दुकान कंधार नामक स्थान पर टिन सेड में चलाई जा रही है।
शराब की दुकानों के आवंटन में इस बार एक और चेहरा भी सामने आया। जिलाधिकारियों के निर्देश पर जिला सूचना अधिकारियों ने पत्रकारों को एक पत्र लिखा। वह पत्र लाटरी के दिन का आमंत्रण था। पत्र में शराब की दुकानों के आंवटन में पारदर्शिता के लिए पत्रकारों की उपस्थिति अनिवार्य बताई गई। पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि सरकार के निर्देश पर ही पत्रकारों को यह आमंत्रण भेजा जा रहा है। इस आमंत्रण को पत्रकार भाईयों ने भी बखूबी निभाया। पर्ची निकालने में उनका भी उतना ही योगदान रहा, जितना शराब के तस्करों को अपने पर्ची निकलने का उतावलापन था। यह सौभाग्य उन्हें सभी जिलों में प्राप्त हुआ। कुछ लोग तो यह भी कहते सुने गए कि मैंने फलां व्यक्ति के नाम पर्ची निकाली, उसका महीना तो बँध गया। कुछ पत्रकार तो जरूरी कामकाज छोड़कर लाटरी के दिन समय पर उपस्थित रहे। कुछ ने तो अपने मातहतों की परवाह भी नहीं की। दौड़े-दौड़े जहाँ लाटरी डाली जा रही थी, वहाँ पहुँच गए। शराब के प्रति बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों, बड़े-बड़े घरों के लोगों का रुझान बढ़ते जा रहा है। इस पर बहस की जरूरत है। आखिर शराब से मुनाफा किसे हो रहा है? सरकार शराब परोसकर क्या करना चाहती है? पहाड़ के गाँव-गाँव तक शराब ले जाकर युवाओं की बर्बादी का कौन जिम्मेदार है? गैर कानूनी कार्य में लगे युवाओं का भविष्य किस ओर जा रहा है? यदि शराब जैसी बुराई का अंत करने के लिए संघर्ष करने वाली महिलाएं, युवा तथा पत्रकारों का इस ओर रुझान होगा, तो देवभूमि उत्तराखंड का क्या हस्र होगा?
इस बीच प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में शराब के विरोध में महिलायें मुखर हुई हैं। धरना-प्रदर्शन-जलूसों के साथ ही तोड़-फोड़ की कार्यवाही भी होने लगी है। देखना है भविष्य में यह शराब विरोधी आंदोलन क्या रूप लेता है।