उत्तराखंड के तराई-भाबर के वनग्रामों तथा खत्तों में रहने वाले वन गूजरों और पर्वतीय मूल के लोगों को देश की आजादी के 65 वर्ष बाद भी बुनियादी नागरिक अधिकार तक हासिल नहीं हैं। पंचायतीराज व्यवस्था इनके लिये दूर की कौड़ी है और मनरेगा जैसी योजनायें भी लगता है कि इनके लिये नहीं बनी है। वनाधिकार कानून 2006-07 भी उत्तराखंड के वनग्रामों और खत्तों में रहने वाली इस लाखों की आबादी को न कोई रियायत दिला सका, न कोई राहत। राशन कार्ड, फोटो पहचान पत्र, जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र आदि तमाम चीजें जिन्हें सरकार भी अनिवार्य करार देती है, उन्हें वन ग्रामों और खत्तों में रहने वाले लोग एड़ी-चोटी का जोर लगाकर भी नहीं पा सकते। वन विभाग तो वनवासियों और खत्तेवासियों को अपना जरखरीद गुलाम समझता है। वनवासी-खत्तेवासी यदि वाहनों द्वारा वनों से बाहर आते हैं तो वन विभाग वाहनों का शुल्क वसूलता है। जानवरों के चुगान का शुल्क वसूलना, झोपड़ी बनाने के लिये घास-फूस का शुल्क लेना, बिना कोई कीमत चुकाये जानवरों का गोबर उठा लेना, गोबर व अन्य उत्पादों को बेचने की अनुमति न देना, अग्निकांडों और आंधी-तूफान से सुरक्षा के लिये टिन रोड डालने की इजाजत तक न देना ये वन विभाग द्वारा वनवासियों-खत्तेवासियों के उत्पीड़न की लम्बी फेहरिस्त में से लिये गए नमूने हैं।
वनवासियों खत्तेवासियों के इस उत्पीड़न के लिये जिम्मेदार महकमों और सरकारों के खिलाफ अखिल भारतीय किसान महासभा ने अभियान छेड़ दिया है। 2 फरवरी 2011 को हल्द्वानी में वन ग्राम के निवासियों और खत्तेवासियों की मांगों को लेकर विशाल रैली निकाली गयी। इसे हल्द्वानी में हुआ सबसे बड़ा प्रदर्शन, राजनीतिक हलकों में माना गया। इस रैली के बाद नैनीताल जिला प्रशासन भी थोड़ा हरकत में आया और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भी झूठी-सच्ची घोषणाओं का अंबार लगाने सरकारी उड़नखटोले में पहुँचे।
बहरहाल वनवासियों-खत्तेवासियों की विभिन्न खत्ते व वन गाँवों को राजस्व गाँव का दर्जा दिया जाने समेत तमाम मांगों को लेकर अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा देहरादून में ‘चेतावनी रैली’ की तैयारी में अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा नैनीताल से लेकर हरिद्वार तक खत्तों और वन गाँवों में व्यापक जनसम्पर्क अभियान चलाया गया। रैली की तैयारी में महासभा के नेतृत्वकारी साथी उस हंसपुर खत्ता में भी पहुँचे जहाँ से कुछ वर्षों पहले राज्य की पुलिस ने कुछ माओवादियों को पकड़ने का दावा किया था। तब से उत्तराखंड सरकार इस खत्ते को ‘माओवादियों का गाँव’ बता कर वहाँ किसी तरह की मीटिंग तक नहीं करने देती। पुलिसिया कार्यवाही का विरोध करते हुए अखिल भारतीय किसान महासभ द्वारा यहाँ चेतावनी रैली की तैयारी बैठक की गई और यहाँ से रैली में कम संख्या में ही सही परंतु हिस्सेदारी हुई।
18 मई 2011 को अस्थायी राजधानी देहरादून की सड़कों पर लाल झंडों और बैनरों के साथ सैकड़ों की तादाद में वनग्रामों के निवासी और खत्तेवासी उतरे। रेलवे स्टेशन से शुरू हुई रैली अपनी वाजिब मांगों के लिये इंकलाबी नारे बुलंद करती हुई शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए गांधी पार्क में जाकर सभा में तब्दील हो गयी।
सभा को भाकपा (माले) के केन्द्रीय कमेटी सदस्य राजेन्द्र प्रथोली, उत्तराखंड प्रभारी राजा बहुगुणा, अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष पुरुषोत्तम शर्मा, किसान नेता बहादुर सिंह जंगी, अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रदेश सचिव जगत मर्तोलिया, अखिल भारतीय किसान महासभा के राज्य कार्यकारिणी सदस्य आनन्द सिंह नेगी व मो. मोमिन, भाकपा (माले) के राज्य लीडिंग टीम के सदस्य कॉ कैलाश पांडेय, किसान नेता मान सिंह पाल, भुवन जोशी, आनन्द सिजवाली, आलमगीर, गोविन्द जीना, रोशनद्दीन, उमरूद्दीन, अब्दुल रहीम, सुरेन्द्र बृजवाल आदि ने संबोधित किया। बाद में इन माँगों को लेकर मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपा गया। सभा के अंत में पारित प्रस्तावों में माँग की गई कि उ.प्र. के भट्टा परसौल कांड की न्यायिक जांच हो; महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु प्लांट को हटाया जाये; पुरोला में सैकड़ों हरे पेड़ काटने वाले आइ.ए.एस अधिकारी को गिरफ्तार किया जाये; भूमि अधिग्रहण कानून बदला जाये; उत्तराखंड में कूजा एक्ट को समाप्त किया जाये व नया भूमि सुधार कानून लागू किया जाये; राज्य में अनिवार्य चकबंदी लागू की जाये। 1893 का बेनाप भूमि संबंधी शासनादेश रद्द किया जाये; राज्य में अनिवार्य चकबंदी लागू की जाये तथा गैर राजस्व गाँवों, वनग्रामों व खत्तों में भी ग्राम पंचायतें गठित करने का अधिकार दिया जाये। सभा की अध्यक्षाता वरिष्ठ किसान नेता गणेश सिंह ‘गरीब’ ने की।