तीन दिवसीय उत्तराखंड लोकभाषा सम्मेलन 16 से 18 अप्रेल 2011 तक देहरादून में सम्पन्न हुआ। ओ.एन.जी.सी. के कौलागढ़ रोड स्थित ए.एम.एन. घोष सभागार में सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने लोकभाषाओं के विकास के लिये सरकार की प्रतिबद्धता बताई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार हिमांशु जोशी ने अपने विदेश यात्रा के संस्मरण को सुनाते हुए लोकभाषाओं के विकास के लिये जनता को स्वयं आगे बढ़कर कार्य करने के लिये कहा। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में दून विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरिजेश पंत, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार की कुलपति डॉ. सुधारानी पाण्डे तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वी.पी. एस. अरोड़ा भी उपस्थित थे।
इस अवसर पर 24 विद्वानों को उत्तराखंड भाषा सम्मान से अलंकृत किया गया। ये विद्वान हैं पद्मश्री डॉ. देवी दत्त शर्मा, डॉ. हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’, शिवराज सिंह रावत ‘निसंग’, डॉ शेर सिंह पांगती, शिवप्रसाद भारद्वाज, प्रो. विष्णु दत्त ‘राकेश’, कैलाश चन्द्र लोहनी, हर्ष पर्वतीय, शेर सिंह मेहता ‘कुमाउनी’, भगवती प्रसाद नौटियाल, डॉ. अचलानन्द जखमोला, मथुरादत्त मठपाल, डॉ. जग्गू नौडियाल, वीणापाणि जोशी, गोपाल दत्त भट्ट, बिहारी लाल दनोसी, डॉ. मधुबाला नयाल, डॉ. देव सिंह पोखरिया, डॉ. शेर सिंह बिष्ट, भारती पाण्डे, केशव चन्द्र सकलानी, नन्दकिशोर हटवाल, मदन मोहन डुकलान और दिनेश चमोला आदि।
17 अप्रेल 2011 को दून विश्वविद्यालय के सभागार में योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’, दिनेश पाठक, नवीन लोहनी, चारूचन्द्र चंदोला, विमल नेगी और उदय किरौला, हयात सिंह रावत आदि विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किये। मुख्य अतिथि के रूप में कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत मौजूद थे। संचालन डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया।
द्वितीय सत्र में ‘लोकभाषा और लोक साहित्य’ पर डॉ. मधुबाला नयाल, डॉ. नागेन्द्र ध्यानी, डॉ. भवानी दत्त काण्डपाल, डॉ. शेर सिंह पांगती और भगवती प्रसाद नौटियाल ने चर्चा की। संचालन डॉ. मृदुल जोशी ने किया। सत्र में लोकभाषाओं की प्रकृति एवं उसके व्याकरण व भाषिक तत्व पर तर्कपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की गई। बुद्धिबल्लभ शास्त्री ने अकाट्य तर्कों से सिद्ध किया कि यूरोपीय भाषायें संस्कृत मूल की हैं। उन्होंने कुमाउंनी और गढ़वाली के शब्दों की व्युत्पत्ति करते हुए उन्हें संस्कृत से निश्पन्न माना है। डॉ. शेर सिंह पांगती ने दूरस्थ सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जनजातीय भाषा की प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए उनके विकास के लिये ठोस पहल किये जाने को कहा। मुख्य अतिथि चमन लाल प्रद्योत ने भाषा कैसे सीखी जाती है, इस पर अपना व्याख्यान दिया। इस सत्र के तुरन्त बाद में लोकभाषा कवि सम्मेलन देर रात 12 बजे तक चलता रहा। लोकेश नवानी, हरीश सुयाल ‘कुटज’, गिरीश सुन्दरियाल, प्रीतम अपछ्याण, हेमवती नन्दन ‘हेमू’, वीणापाणि जोशी, बीना बैंजवाल, नीता कुकरेती, देवकी मेहरा, नवीन बिष्ट, मोहन राम टम्टा, शान्तिप्रकाश जिज्ञासु, मदन मोहन डुकलान, तोताराम ढौंडियाल आदि कवियों ने काव्यपाठ किया। संचालन गणेश खुगसाल ‘गणी’ ने किया।
सम्मेलन के अन्तिम दिन ‘लोकभाषाओं का वर्तमान स्वरूप एवं विकास के उपाय’ पर चर्च हुई। सत्र के मुख्य अतिथि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक व अध्यक्ष भगवती प्रसाद नौटियाल थे। डॉ. देव सिंह पोखरिया, बुद्धिबल्लभ शास्त्री, डॉ. एम आर सकलानी, डॉ. नन्द किशोर ढौढियाल आदि वक्ताओं ने लोकभाषाओं के स्वरूप पर गहन विचार-विमर्श किया और इनके संरक्षण के उपाय सुझाये। सत्र का संचालन गणेश खुगसाल ‘गणी’ ने किया। अन्तिम सत्र ‘लोकभाषा और लोक संस्कृति’ पर था, जिसकी अध्यक्षता डॉ. उमा भट्ट ने की। मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी थे। लोक संस्कृति के विविध रूपों पर गहन चर्चा के साथ लोकनाट्यों पर भी श्रीश डोभाल एन.एस.डी., डॉ. डी.आर. पुरोहित और राकेश भट्ट ने अभिनय एवं गीतों को गाकर प्रकाश डाला तथा विस्तार से लोकनाट्यों का महत्व बतलाया। सत्र को डॉ. शेखर जोशी और कमला पन्त ने भी संबोधित किया। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने सम्मेलन का समापन किया।