(कुमाऊँ में प्रचलित पर्वों के बारे में हम पिछले कुछ अंकों से माया पाण्डे की अप्रकाशित पुस्तक से जानकारी दे रहे हैं। इसी क्रम में इस बार शिवरात्रि के बारे में जानकारी प्रस्तुत है। -संपादक)
जीवात्मा का परमात्मा से सहयोग, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा मन, अहंकार, चित्त और बुद्धि इन चतुर्दश का समुचित निरोध ही शिवरात्रि है। निरोध कर्मज्ञान, भक्ति द्वारा होता है। जीवात्मा का शिव के समीप वास ही उपवास है। शिव के साथ आनन्द देने वाली ऐसी रात्रि माघ, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी है, जिसमें शिव पूजा करना महाव्रत है। इस व्रत में पूजा, उपवास व जागरण प्रधान है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि की विशेषता यह है कि नये वर्ष चक्र का आरम्भ होता है। सृष्टि के साथ लय, लय के साथ सृष्टि यही कालचक्र है। कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा में अगणित सूर्य प्रभावों से प्रकाशित होकर शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। अतः शिवरात्रि व्रत महानिशा व्यापिनी चतुर्दशी को ही करना चाहिए। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी अक्सर फाल्गुन मास में ही पड़ती है।
विषयासक्त लोग निद्रावस्था में रहते हैं और संयमी लोग जागृतावस्था में रहते हैं। अतः शिवरात्रि में जागरण किया जाता है। शिवपूजा का अर्थ बेलपत्री, चन्दन एवं धतूरे का फूल अर्पण कर ध्यान करना चित्तवृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा अर्थात शिव के साथ योग करना है। शिव सहस्त्रनाम के अनुसार कुरुक्षेत्र के युद्ध में सरशैया में पड़े भीष्म पितामह से युधिष्ठर ने पूछा कि सब देवताओं में श्रेष्ठ कौन है? पितामह ने कहा कि जब श्रीकृष्ण स्वयं यहाँ हैं तो उन्हीं से पूछो। युधिष्ठर ने जब श्रीकृष्ण से यह प्रश्न पूछा तो उन्होंने कहा कि भगवान शिव ही सब देवों में श्रेष्ठ एवं पूज्य हैं। अर्जुन की हर विपदा के समय उन्होंने शिव स्मरण का उपदेश दिया। जयद्रथ वध के समय शिवभक्ति का कार्य सौंप पाशुपतास्त्र पुनः प्रदान कराया। शिवरात्रि को पवित्र नदियों-जलाशयों में, जहाँ शिवमूर्ति या शिवलिंग हों, लोग स्नान-ध्यान करके एक लोटा जल शिव को चढ़ाकर अपनी उदर-क्षुधा मिटाने में लग जाते हैं। कहते हैं शिव तो आशुतोष हैं। श्रद्धा से दिया जल ग्रहण करके भी वह भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। शिवरात्रि के दिन अन्न ग्रहण नहीं किया जाता, फलाहार ही ग्रहण किया जाता है। शिव हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। स्वयं वह उत्तर के निवासी हैं और वरण करते हैं धुर दक्षिण में कन्याकुमारी में रहने वाली पार्वती का। शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के विभिन्न प्रान्तों में बिखरने के बाद भी एक ही साथ सम्पूर्ण देश को एकत्र कर दिया है। एक कथा के अनुसार एक बार बह्मा और विष्णु में इस बात को लेकर युद्ध छिड़ गया कि दोनों में बड़ा कौन है ? युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला। तभी उन दोनों के बीच एक स्तम्भ प्रकट हो गया, जिसका न आदि था न अन्त। ब्रह्मा व विष्णु ने यह निर्णय लिया कि जो इसके आदि-अन्त का पता लगाने में सफल होगा, वही बड़ा माना जायेगा। ब्रह्मा तो हँस का रूप लेकर ऊपर की ओर उड़ गये और विष्णु श्वेत वाराह का रूप लेकर नीचे की ओर चल दिए। लगभग एक हजार वर्षां तक इस शंका का समाधान न ढूँढ सकने के कारण निराश होकर यह सोचने लगे कि हम दोनों में कोई भी बड़ा नहीं है। तब शिव ने प्रकट होकर कहा कि यह स्तम्भ मेरा ज्योतिर्लिंग है और मेरे ब्रह्मस्वरूप का परिचायक है। यह अब छोटा हो जायेगा, ताकि सभी श्रद्धालु इसकी पूजा कर सकें। यह घटना फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को घटित होने से इस दिन महा शिवरात्रि मनायी जाती है।
पुराणों के अनुसार लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अन्त में स्वयं सदाशिव हैं, इसलिए यह शिवलिंग मात्र शिव का नहीं परब्रह्म परमेश्वर का ही स्वरूप है। शिव के कंठ में स्थित विष सांसारिक कष्ट हैं, गंगा सुख की धारा है। जटायें अंधकार और चंद्रमा प्रकाश का प्रतिबिंब है। त्रिशूल दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से रक्षा करने की प्रेरणा देता है। साथ ही सत-रज-तम का प्रतीक है। डमरू संगीत की मधुरता तो नन्दी धर्म का। उनका श्मशानी होना सांसारिक नश्वरता है और भस्म नश्वरता को अंगीकार करने की क्षमता का मेरुदण्ड। इनके पाँच अवतार पाँच प्रमुख कार्यो- सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह को दर्शाते हैं। बिल्वपत्र भिन्नता में एकता आकपुष्प की पाँच पंखुड़ियाँ एक साथ जोड़कर परस्पर अभिन्नता की द्योतक हैं।