पोरबंदर….
पहली बार गुजरात आने का सुयोग मिला तो तय किया कि अपनी यात्रा वहीं से शुरू करूँगा, जहाँ से 140 वर्ष पहले महात्मा गाँधी ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी। उस वक्त तो जेहन में यह भी नहीं था कि वह तो 30 जनवरी का मौका होगा और हो सकता है कि गुजरात में नफरत की खेती करने वाले शान्ति और अहिंसा के मसीहा की जन्मभूमि पर मौजूद होंगे।
अगली सुबह यानी कि 28 जनवरी को पोरबन्दर एक्सप्रेस से यात्रा करने की तैयारी शुरू हो रही थी। मैं दिल्ली में था कि अल्मोड़ा से शमशेर बिष्ट जी का फोन आया कि उत्तराखंड लोक वाहिनी के बसन्त भट्ट तथा आजादी बचाओ आन्दोअन के स्वप्निल श्रीवास्तव को माओवादी होने के शक में रस्यूना गाँव से पकड़कर अल्मोड़ा की पुलिस लाईंस में लाया गया है। वे 15-16 घंटों से हिरासत में हैं और तगड़ी पूछताछ की जा रही है। उन्हें अभी -अभी सूचना मिली है…………..मैं अवाक रह गया !
रस्यूना गाँव पनार से सात-आठ किमी आगे सरयू के किनारे थोड़ा चढ़ाई पर है। सरयू के उस पार पिथौरागढ़ जिला है और इस पार अल्मोड़ा। हम लोग यहाँ पर प्रोड्यूसस कम्पनी गठित कर एक मेगावाट जल विद्युत परियोजना शुरू करने की कोशिश कर रहें है। उत्तराखंड में बनने वाली 500 जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध करने के कारण बार-बार हम पर तोहमत लगायी जाती है कि हम विकास विरोधी हैं, हम उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने के प्रयासों में अड़ंगा लगा रहे हैं।
दरअसल ऐसा है नहीं। पानी बहेगा तो उसे रोककर बिजली बनाने में क्या हर्ज है? लेकिन इसके लिये नदियों के किनारे सैकड़ों सालों से रहने वाले लोगों का उजाड़ा जाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। न ही यह बर्दाश्त किया जा सकता है कि कच्छा-बंडी बनाने वाली कम्पनियों को भाजपा-कांग्रेस के चुनावी फंडों में करोड़ों रुपया डालकर उत्तराखंड को लूटने-खसोटने की अनियंत्रित छूट दी जाये। संसाधन उत्तराखंड के हैं, उनसे होने वाले लाभ पर पूरा-पूरा अधिकार यहाँ के निवासियों का हो, ऐसी हमारा सोच है। इसी के चलते पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ रविकिरण जैन और आजादी बचाओ आन्दोलन के संयोजक डॉ. बनवारी लाल शर्मा से बातचीत कर यह विचार बना कि प्रोड्यूसर्स कम्पनी बना कर यह काम किया जाये, जिसमें सिर्फ प्रभावित गाँव के लोगों के ही शेयर हो सकते हैं, किसी बाहरी व्यक्ति के नहीं। इस काम के विशेषज्ञ स्वप्निल श्रीवास्तव के दो-तीन दौरों के बाद रस्यूना गाँव इस काम के लिये उपयुक्त लगा। बसन्त भट्ट की कोशिशों से ग्रामवासी भी इस विचार से सहमत हुए। एक बार डॉ. शमशेर बिष्ट और हम लोग भी ग्रामीणों की शंकाओं का समाधान करने के लिये रस्यूना पहुँचे। उस बार की पदयात्रा के बाद से ही बिष्ट जी पाँव की तकलीफ से परेशान हैं। यह भी तय हुआ कि इस परियोजना में लगने वाले एक करोड़ रुपयों में से 50 लाख रुपयों की ब्यवस्था ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ करेगा और शेष के लिए उत्तराखण्ड सरकार पर दबाव बनाया जायेगा कि वह गारण्टी देकर किसी बैंक से ऋण उपलब्ध करवाये। जब ‘बेनी’ जैसे लुटेरों को दिया जा सकता है तो इनको क्यों नहीं?
इसी सिलसिले में स्वप्निल श्रीवास्तव और उनके साथ मूलतः धौलादेवी के रहने वाले बसन्त भट्ट रस्यूना गाँव में थे, जब तड़के उन्हें उठाकर अल्मोड़ा ले जाया गया। ये लोग बार-बार स्पष्टीकरण देते रहे-डॉ. शमशेर बिष्ट का और मेरा नाम लेते रहे मगर हम लोगों से पूछना भी पुलिस को उचित नहीं लगा। उत्तराखण्ड में माओवाद का विशेषज्ञ माने जाने वाले जालिम पुलिसिया अधिकारी इन लोगों को मानसिक यंत्रणा देते रहे और बसन्त भट्ट की तो पिटाई भी की गई। देर शाम शमशेर बिष्ट जी को सूचना मिली और उनके हस्तक्षेप के बाद ये लोग मुक्त हुए। स्वप्निल श्रीवास्तव तो इतना डरे कि अगले दिन प्रेस से मुखातिब हुए बगैर ही चुपचाप इलाहाबाद चले गए!
कौन कहता है कि उत्तराखण्ड एक सुरक्षित स्थान है? यहाँ एडवेंचर टूरिज्म के लिए आने वालों में से भी कोई कभी मार डाला जाये, क्या पता? नक्सलियों के दमन के नाम पर आदिवासियों के खनिजों के खजाने को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपने के लिए चलाये जा रहे ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्त्ता काफी सजग हैं। मगर उत्तराखण्ड में इस चुपचाप चल रहे दमन की तो किसी को खबर ही नहीं है।
ये सारे समाचार मुझे पोरबंदर एक्सप्रेस में बैठे हुए लगातार मिल रहे थे। मैंने सोचा था कि गांधी जी के जन्म स्थान में चुपचाप आँख मूँदे इस समस्या पर विचार करूँगा, किंतु वहाँ तो एक दूसरा झटका मुझे लगने वाला था। 29 जनवरी को तीसरे पहर पोरबंदर पहुँचे तो पुलिस की सरगर्मी अस्वाभाविक रूप से ज्यादा थी। होटल में कमरा मिलने में भी थोड़ी दिक्कत हुई। पता चला कि कल 30 जनवरी को शहीद दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेने गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ आ रहे हैं। ताज्जुब हुआ कि गांधी जी की हत्या को ‘गांधीवध’ कहने वालों का पोरबंदर में क्या काम? कीर्ति मन्दिर में, जहाँ पुतलीबाई ने मोहन दास को जन्म दिया था और अब जो एक राष्ट्रीय स्मारक है, मोदी की पुलिस स्टेनगन लेकर बापू की अहिंसा को रौंद रही थी। उन्हें इसकी भी परवाह नहीं थी कि इस पवित्र स्थान में जूते पहन कर नहीं जाया जाता। मेरी पत्नी डरी हुई थी कि मैं इस बात पर किसी से ऐसा-वैसा न कह बैठूँ। लेकिन जिस देश में बापू को पिछ्ले बासठ साल में जगह-जगह अपमानित करने की कोशिश की जा रही हो….. कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर, कभी माओवाद-नक्सलवाद के नाम पर कभी उदारीकरण के नाम पर…. वहाँ मेरा ऐसा करने का अर्थ भी क्या होता ?