दिनांक 24 अप्रैल को धर्मशाला तल्लीताल में महिला समाख्या द्वारा जिला संसाधन समूह के साथ विभिन्न मुद्दों को लेकर बैठक आयोजित की गयी। रामनगर से आयी कार्यकर्ताओं ने बताया कि शासन/प्रशासन का रवैया वन ग्राम एवं खत्तों के प्रति असहयोग का ही दिखायी देता है। वर्तमान में वन ग्रामवासियों को वहाँ से हटाने की साजिशें भी चल रही हैं।
केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही मनरेगा योजना के बारे में बताया गया कि योजना को शुरू हुए तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक जॉब कार्ड नहीं बने हैं। जो बने भी हैं, वे ग्राम समुदाय को उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें या तो ग्राम विकास अधिकारी अपने पास रख लेता है या ग्राम प्रधान। तीन वर्ष में लोगों को केवल 10-15 दिन का काम मिला है। जहाँ पर लोगों ने काम किया है, वहाँ पर भी काम के दिन एवं मजदूरी भुगतान को उनके जॉब कार्ड में नहीं दर्शाया गया है। रामनगर के थारी गाँव में नाबालिग बच्चों के नाम से मजदूरी भुगतान हुआ है। रामगढ़ में एक परिवार के दो जॉब कार्ड का मामला सामने आया है, जिसमें एक परिवार के दो या तीन लोगों ने एक साथ काम किया है और उन्हें भुगतान भी हुआ है। कहीं-कहीं सरकारी नौकरी में कार्यरत व्यक्ति के नाम से भी मजदूरी भुगतान हुआ है। प्रशासन सूचित किये जाने पर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाता। सूचना का अधिकार के तहत सूचनायें माँगने पर अधूरी और गलत सूचनायें दी जाती हैं। प्रशासनिक अधिकारी वैसे तो हमेशा पंचायत प्रतिनिधियों पर हावी रहते हैं, मगर मनरेगा की बात आते ही कार्यवाहक संस्था पंचायत को बताते हुए समस्त दोष उनके ऊपर डाल देते हैं। इससे समुदाय और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच खाई बन रही है। ज्यादातर पंचायत प्रतिनिधि योजना से अनभिज्ञ हैं। मनरेगा के तहत जो एस्टीमेट आता है उसमें भी प्रतिशत बँधा हुआ है। 20 प्रतिशत प्रशासनिक अधिकारियों के पास जाता है और 10 प्रतिशत जे.ई. के पास। 40 प्रतिशत सामग्री में लगता है एवं शेष धनराशि मजदूरी व्यय होती है। कम मजदूरी होने से काम में गुणवत्ता नहीं होती। ग्राम प्रधान असमंजस में हैं। योजना के तहत सोशल ऑडिट अति महत्वपूर्ण है, पर इसके बारे में ग्रामीण समुदाय को जानकारी ही नहीं है।
विकासखण्ड रामगढ़ एवं ओखलकाण्डा में लगातार वन पंचायतों के साथ काम किया जा रहा है। बिल्डरों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। उनके द्वारा वन पंचायतों में अवैध कब्जा, खनन एवं कटान हो रहा है और जल स्रोतों पर भी कब्जा किया जा रहा है। कहीं-कहीं पर 10-15 वर्षों से सरपंच का चुनाव नहीं हो पाया था। लोग वन पंचायतों के प्रति उदासीन होने लगे थे। इन दिक्कतों को लेकर प्रशासनिक कर्मचारियों का रवैया भी संतोषप्रद नहीं है। अवैध खनन या कटान की जानकारी वन विभाग को दी जाती है। वह उसे प्रशासन का मुद्दा मानने लग जाते हैं और प्रशासन की टाल-मटोल करता नजर आता है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए वन पंचायत के प्रतिनिधियों के साथ काम किया गया। चुनावों को लेकर ग्राम समुदाय से बातचीत की गई। सूचना के अधिकार के तहत वन पंचायतों के सीमांकन, नक्शा, मनरेगा के तहत् किये जा रहे कार्यों को लेकर जानकारी एकत्र की गयी।
पंचायतों को लेकर जिला संसाधन समूह के साथ अनुभव साझा किये गये। पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायत सबसे महत्वपूर्ण इकाई होने के बावजूद यह केवल नाम मात्र की रह गयी है। कोई काम व्यवस्थित तरीके से नहीं हो रहा है। ग्राम पंचायत अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है और उनका प्रयोग वह प्रशासन के इशारों पर करती है। खुली बैठकों में कोरम पूरा नहीं होता लेकिन ब्लॉक स्तर पर जो कार्यवाही होती है उसमें गाँव के अधिकांश लोगों के हस्ताक्षर होते हैं और कोरम पूरा दिखा दिया जाता है। लेकिन ग्रामीण समुदाय इन कमियों के लिए आवाज उठाये उन्हे अनेक धमकियाँ दी जाती हैं। पंचायत के अंतर्गत बनी समितियों की जानकारी तो बहुत कम लोगों को होती है। गरीब लोगों के लिए आने वाली योजनाओं में इतनी औपचारिकताएँ होती हैं कि वास्तविक रूप से केवल वही उसका लाभ ले पाते हैं जिनकी पहुँच ऊपर तक होती है।
सूचना के अधिकार के तहत वन पंचायत, रोजगार गारंटी, दैवीय आपदा के तहत अटल आवास एवं विभिन्न योजनाओं से सम्बन्धित जानकारियाँ माँगी गयीं। परन्तु गलत व अपूर्ण जानकारियां दी गयीं। ब्लॉक अधिकारियों द्वारा धमका कर जानकारी लेने के लिए हतोत्साहित किया गया। इस बातचीत के बाद तय किया गया कि सूचना के अधिकार का व्यापक उपयोग हो। जिला और राष्ट्रीय स्तर पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान हो।
जिला कार्यक्रम समन्वयक डॉ. बसन्ती पाठक द्वारा कहा गया कि माह मई में पुनः इन मुद्दों को लेकर जिले स्तर पर बैठकर विचार-विमर्श किया जायेगा। इस बैठक में जिला संसाधन समूह सदस्य नैनीताल समाचार सम्पादक राजीव लोचन साह जी, प्रदीप लोहनी एडवोकेट, इन्दु पाठक, डॉ. उमा भट्ट, मैत्री संगठन से कमल नेगी, कौशल्या साह, विमला असवाल, दीपा शर्मा, सत्या मिश्रा, लता परमार, डॉ. गिरिजा पाण्डे, सैणियों के संगठन से चम्पा उपाध्याय, रामनगर से मुनीष अग्रवाल (सम्पादक, नागरिक) के अतिरिक्त महिला समाख्या के कार्यकर्ता शामिल थे।