15-30 जून अंक में ‘ये समस्यायें सुनने वाले’ के जरिये लेखक ने जगह-जगह उग आए तथाकथित नेताओं (जिन्हें लेखक ने लगुआ-भगुवा कहा) की अच्छी खबर ली है। आम चुनाव नजदीक हैं तो ऐसे छद्म नेताओं ने भी जनता के साथ नजदीकियाँ गाँठ ली हैं। हताश-परेशान जनता इनकी छाँह तले थोड़ा सुकून (कोरे आश्वासन) पाकर धन्य-धन्य हो रही है। बिजली और टेलीफोन खम्भों, हरे भरे पेड़ों के शाखों पर टँगे इनके कट आउट न केवल शहर के सौन्दर्य को मटियामेट कर रहे हैं बल्कि उनसे गुजरने वालों के लिये जब-तब समस्या खड़ी कर देते हैं। व्यंग्य के बहाने ‘जनगणना’ की सटीक खिंचाई की गई है। प्रगणक हो चाहे अम्मा, दोनों चेहरे आम भारतीय जनमानस के ही हैं। गणना का तनाव दोनों के चेहरे पर दिखना सामान्य बात है। गणना से पशुओं का, जनता का भला होते भले ही दिख जाये पर देश का कितना भला होता है यह विचारणीय है। बुद्धिजीवियों के निकम्मेपन पर प्रहार करता सम्पादकीयधारदार है। लोकतंत्र में धार्मिक उन्माद अथवा जातिगत वैमनस्य को फैलाने वाली ताकतों को बुद्धिजीवी संगठित होकर कमजोर कर सकते हैं पर इधर सन्नाटा छाया हुआ है कि करे कौन ?
गिरदा के व्यक्तित्व पर नैनीताल समाचार में जो छपा/छप रहा है, उससे हमें उनके बारे में जानने का अवसर मिल रहा है। क्या एक व्यक्ति कलाकार, आन्दोलनकारी और रंगकर्मी हो सकता है। इतनी विशेषतायें बिरले लोगों में ही होती हैं।
खत्तेवासियों का दर्द इन्द्रेश मैखुरी के लेखसे उजागर हुआ। अब तो दूध की कम उपलब्धता ने इनके काम को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ये लोग समाज की मुख्यधारा से ही जुड़कर अपना हक-हकूक सम्मान पा सकते हैं जिसकी जंग अब छेड़ दी गई है।
गंगा सिंह रावत,रामपुर रोड, हल्द्वानी